दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )
हाय रे विधाता
गीत
डा० जनार्दन चतुर्वेदी 'कश्यप'
3/15/20261 min read


हाय रे विधाता
हाय रे विधाता..
का.. अइसन दिन आ गइल
कि तोहरे एगो अछयी अंस
एह संसार मे आ के
जिनिगी मे बन्हा गइल ।
हाय रे विधाता......।
तू तऽ एके आदमी बना के भेजले रहलऽ
एकरा खातिर मये साज सहेजले रहलऽ
तब्बो ई लोक लाज छोडि के
हमार तोहार के फंसरी मे अझुरा गइल ।
हाय रे.....।
जब ई तोहरा संग मे रहे
तब त..तू एकरा के
बहुते बात बतवले होखबऽ
एह संसार मे जीये के
ढंग भी सिखवले होखबऽ
तब्बो एहिजा के हावा लगते
तोहार कुल्हि बात भुला गइल ।
हाय रे.....।
सुनले बानी कि
तू पारस पाथर के रूप मे निरंकार हवऽ
अकटी ब्रह्म ओंकार हवऽ
तब्बो एकर सगरी दोस
तोहरे माथ मढ़ा गइल ।
हाय रे.....।
एकरा त..सोना बने के चाहीं
ई कोइला काहें बनि गइल
सुगन्ध भूर केवड़ा बने के चाहीं
ई मइला काहें बनि गइल
आखिर अइसन का हो गइल कि
तोहरे जनमावल तोहरे अलम ले ले
जिनिगी के पुलई ले चहुॅपि के
अचके मे भहरा गइल ।
हाय रे .....।
अब धरती केे जल जनि बाॅटऽ
......................................
परहित में जेकर जिनिगी बा
उनुके बसुधा से जनि छाॅटऽ ।
अब धरती के..................।
ई धरती पुरुखन के थाती
अनगिन नदियाॅ इनिके छाती
नाना दु:ख सहि बहल करेली
जन - जन के हर ताप हरेली
गाॅज लगा कूडा करकट के
तू इनिकर पेटा जनि पाटऽ
अब धरती के...................।
टुके - टूक करि दिहलऽ धरती
बाग बगइचा भइलन परती
सगरी जल के सोत झुराइल
ताल - तलैया कुॅआ सुखाइल
जलवे बा जिनिगी अदिमी के
बनि अगस्त इनिके जनि चाटऽ
अब धरती के...................।
ठावाॅ - ठाईं बाॅध बनवलऽ
कचरा के तू ढेर लगवलऽ
टूटल जाला सुरसरि प्रवाह
ई रेत बनल ओकर गवाह
हर जिनिगी के उजरल खोंता
जुग - जुग के नाता जनि काटऽ
अब धरती के..................।
जो अब जल के बाॅटल जाई
आ जिनिगी से छाॅटल जाई
पीटल जाई भले ढिंढोरा
प्रकृति के उठि चली सिन्होरा
जे जल के महिमा गावत बा
कम से कम उनुके जनि डाॅटऽ
अब धरती के..................।
जो इहवाॅ सुरसरि ना बहिहें
बसुधा पर जीवन ना रहिहें
सूरज के ना ताप सहाई
जरि के सजे खाक हो जाई
'कश्यप' जन जीवन के खातिर
लिखि कागज पर सगरो साटऽ
अब धरती के....
डा० जनार्दन चतुर्वेदी 'कश्यप'
भृगु आश्रम , बलिया ( उ. प्र.)
9935108535
