दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )
तिलकहरू
ललित निबंध
डॉ० भगवती प्रसाद द्विवेदी
7/8/20251 min read


ललित निबंध
तिलकहरू
शादी-बियाह के लगन शुरू होते तिलकहरू लोग मंडराए लागेला । का गांव, का कस्बा आ का शहर ! जेकरा-जेकरा घरे शादी-बियाह जोग नवही रहेलन, उहवां तिलकहरू के इंतजार होखे लागेला । जवना घर में गूर होई, उहवां त चिउंटा लगबे करिहन स । कहल जाला वर-कन्या अनेक जग माहीं !
इहो कहाला कि वर आ कनिया के जोड़ी ऊपरे से बनिके आवेला । बाकिर केहू-ना-केहू मिलावे वाला त चाहीं । ओइसे एगो लोकोक्तिओ कहाला-राम मिलवलन जोड़ी, एगो आन्हर, एगो कोढ़ी !
जब बियाह जोग लइका का दुआर पर कवनो तिलकहरू आवेला, त अइसन लागेला जइसे कवनो कंगाल के भागि खुलि गइल होखे आ लाटरी के टिकट पर इनाम मिले वाला होखे । तिलकहरू के आगम से अइसन जनाला जइसे कवनो किसान के फसिल के उचित मोल लगावे वाला महाजन आ गइल होखे । ओइसे तिलकहरू आ नसीब के कवनो ठेकान ना होला कि कब आके टपकि परे आ बाट जोहत बबुआ के माथे मउरि चढ़ि जाउ, हाड़े हरदी लागि जाउ !
तिलकहरू जब बेटहा के दुआर पर जाला त ओकर भेसभूषा देखते बनेला । भलहीं घर में भूंजी भांग ना होखे, बाकिर ठाट-बाट बनाके ऊ लइका देखे जाई । कहलो जाला कि भेखे भीख मिलेला, ए से भाड़ा के गाड़ी होखे भा किराया के कपड़ा-लत्ता, कवनो हाल में बेटहा के दिल जीतल ओकर मकसद होला । काम परेला त गदहो के बाप कहहीं के परेला । इहां त बेटहा से किछु सांच आ किछु झूठ बोलिके आपन बेटी देबे के बा,यकनियादान करे के बा । जंग आ परेम में सभे किछु जायज होला नू ?
बाकिर तिलकहरू लइका खोजे अकेले ना जाला । ओकरा संगें एगो बिचवानो होला, जवना के अगुवा कहल जाला । अगुवा नांव के जीव लइकीवाला आ लइकावाला-दूनों से कवनो-ना-कवनो किसिम से जुड़ल होला । दूनों पच्छ के अंदरूनी हालात से ऊ बखूबी वाकिफ होला । खूबी आ खामी-दूनों के चीन्हि के ऊ मोलभाव करेला । दरअसल अगुवा अइसन तरजूई होला, जवना के एगो पलड़ा पर बेटिहा आ दोसरा प बेटहा जोखाला । अगुवे दूनों पलड़ा के संतुलित करे में अगहर भूमिका निबाहेला । हालांकि आगा चलिके दूनों पच्छ रिश्ता में आइल कवनो झोल खातिर अगुवे के दोषी ठहरावेला आ आखिरकार ओकर हाल सांप-छुछूंदर के हो जाला-ना घोंटते बनेला, ना उगिलते । मियां-बीवी राजी, त का करिहें काजी !
जब हीत-नात नीमन मिलि जाला त ओकर श्रेय तिलकहरू लोग खुद के देला आ जदी कनिया के ससुरा में सांसत भा दुख-तकलीफ झेले के परेला त अगुवा के कोसे, गारी-फजीहत देबे-करे के अंतहीन सिलसिला शुरू हो जाला । ओने बेटहो हर फरमाइस पूरा ना भइला पर अगुवे के दोषी ठहरावेला । तिलक का दिनहीं गीत गावेवाली मेहरारुन के सुर फूटेला-
सोना के जेवर करार कियो रे अगुवा बैमान,
पीतर के जेवर चढ़ा दियो रे अगुवा बैमान !
ठग लियो लड़का हमारा रे अगुवा बैमान !
तिलक चढ़ावे खातिर पहुंचल तिलकहरुओ के कहां छोड़ल जाला ! अइसन लागेला जइसे ऊ बेबोलवले अचके धमकि परे वाला मेहमान होखेम । गीतगवनी लोग फरमावेला-
अइसन आन्हीं धुक्कड़ में
तिलकहरू साला आयो रे !
तिलक चढ़ावे गइल लरिकी पच्छ के मए लोग तिलकहरू कहाला आ तिलक का दिने ओह लोग के खूब खातिरदारी होला । कहां उठाईं, कहां बइठाईं ! जलखई से लेके खानपान ले बढ़ि-चढ़ि के आवभगत होला । हीत-नात आ गांव-जवार के लोगो खातिरदारी में इचिको कोताही ना बरते । तड़क-भड़क आ झूठ-सांच देखाके बेटिहा पच्छ से अधिका से अधिका रस निचोड़े के दियानत जे रहेला ! दुधारि गाय के दूगो लातो भला !
पहिले जब तिलकहरू लोग तिलक चढ़ावे पहुंचे त नगद आ दहेज के तय रकम ओही दिने चढ़ावल जात रहे । कई बेर लइकी के बाप वादा कइल रकम से कम रकम के जोगाड़ बइठा पावत रहे आ ओइसना हाल में कमे तिलक चढ़ा देत रहे, तबो बीच-बचाव कऽ के ममिला सलटि जात रहे आ दूनों के गणमान्य लोग के समुझावल-बुझावल बात बेटहा मानि जात रहे । किछु देरी ले रंग में भंग भलहीं होत रहे, बाकिर आखिरकार हंसी-खुशी से तिलकहरू लोग के विदाई होत रहे । अंत भला तऽ सब भला !
बाकिर जब से तिलक-दहेज के खिलाफ सख्त कानून बनल, तिलकहरू लोग के मुसीबत अउर बढ़ि गइल आ बेटहा के अउर आसानी हो गइल । अब लइका-लइकी के बियाह तय होत कहीं कि मुकम्मल तय तिलक-दहेज के रकम अगवढ़े गिना लिहल जाता । चेक-ड्राफ्ट का जगहा एकदम नगद । तूं डाढ़-डाढ़, त हम पात-पात ! जदी अइसे ना, त लइकिएवाला
होटल बुक करे, बैंड-बाजा, गहना-गुरिया, जनवासा, सजावट, केटरिंग, स्वागत-सतकार, कपड़ा-लत्ता से लेके आवागमन, नाश्ता-भोजन सहित पंडित-पवनी के खरच-बरच ले, ए से जेड-तमाम इंतजाम करे । वर पच्छ ठाट से बरियात लेके जाई, पिकनिक मनाई, ना हाथ मइल ना गोड़ मइल, बस रोआब झारत रही । बेटीवाला लरिकी जनमाके जब अपराध (!) कइले बा, त ओकर खामियाजा के भोगी ? हालांकि बेटी-बेटा सभका बा, बाकिर बेटा के बाप ई बात भुला जाला कि ऊहो कबो बेटी के बियाह के बखत सांसत झेलले रहे आ ए से ऊ बेटीवाला के पीरा के एहसास करो । उलुटे ऊ बदला लिहल चाहेला आ जतना खरच कइले रहे, ओसे कई-कई गुना वसूलेला । मोका मोका के बात ह । कबो गाड़ी नाव पर, त कबो नाव गाड़ी पर !
आजुकाल्ह जब नेह-नाता बैपार हो गइल बा, त वर-कनिया के रिश्ता जोड़हूं खातिर किसिम-किसिम के बैपार खूब फरत-फूलत बा । शगुन के विचार करे वाला कम्प्यूटरीकृत जोतिसी से लेके मैरेज ब्यूरो नियर दलाल, मैरेज हाॅल, मंडप, केटरर वगैरह जवन किछु चाहीं, घर बइठल हाजिर बा । बस, पइसा फेंकऽ, तमासा देखऽ !
अब तिलकहरू के भला का जरूरत बा ।
लइका-लइकी 'आइ लव यू' के राग उचरले,
डेटिंग कइले आ चट मंगनी पट शादी हो गइल । हर्रे लागल ना फिटिकिरी आ रंगो चोखा हो गइल । बाकिर अइसन कई गो बियाह बियाधि बनि जाता आ चार दिन के चाननी साबित होता । लइकी के मनमाफिक चाह जब पूरा नइखे होत, त तनी-तनी बात के लेके ममिला पुलिस थाना आ कचहरी में चलि जात बा आ लइका का संगें ओकर बाप-महतारी, समूचा परिवार गहूं का संगें घुन लेखा पिसात बा । जिनिगी नरक बनि जात बा आ एक-दोसरा से पिंड छोड़ावे खातिर खूब मोलभाव होत बा । तबे बियाह के मजा ओह मथुरा के पेड़ा नियर आवता, जेकरा के खइलो प पछतावा आ ना खइलो प पछतावा ।
आजु के नेह-नाता के बैपारी पारम्परिक बियाह आ तिलकहरू के मरम का बुझिहें ! गांव में आजुओ तिलकहरू के महातम बा । जेकर बबुआ पढ़ि-लिखिके बढ़िया रोजी-रोजगार में लागल बाड़न, उन्हुका इहां तिलकहरुन के तांता लागल बा आ जेकर लइका बेरोजगार बा, ओकर उमिर ढललो पर तिलकहरू के नजर ओने नइखे जात ।
आजुओ तिलकहरू बेटहा किहां जाके नीमन-नीमन मिठाई चाभऽ तारन, लइका के राशि के नांव लेके पंडीजी से लरिका-लरिकी के गनना मिलवावत बाड़न, जानल चाहत बाड़न कि कतना गुन गनना बनत बा, गोत्र आ नाड़ी मिलत त नइखे ? कई बेर गनना त छत्तीसो गुन मिलता, बाकिर मन ना मिलला से निरासा हाथे लागत बा । आखिर कब ले शादी-बियाह में माल-गोरू लेखा कीने-बेचे के आ एक-दोसरा के ठगे के सिलसिला चलत रही आ वर-कनिया कोट-कचहरी के चक्कर में अपना-अपना जिनिगी के सोनहुला समय-सपना बरबाद करत रहिहन ? समझौतावादी नजरिया अपना के एक-दोसरा के समुझे आ बिसवास जीति के सुखमय जिनिगी जीए के सबक तिलकहरुओ देलन, अगुवो देलन आ कोटो-कचहरी के मध्यस्थो देलन, बाकिर वरे-कनिया एह दिसाईं गठजोड़ाव के अटल आ अटूट बना सकेलन । बहरहाल, फेरु कतने जवान नर-नारी के शगुन चरचरा रहल बा, तिलकहरू लोग के धूम मचल बा,
सगाई, तिलक, बरियात, बैंड बाजा आ शहनाई के मीठ सुर में माहौल खुशनुमा हो उठल बा । रउओं एह सरसता में डुबकी लगाईं आ गीत-संगीत के आनंद लेत नेग देबे-लेबे में शामिल होत मुबारकबाद आ शुभकामना दिहीं-लिहीं ।
भगवती प्रसाद द्विवेदी
सर्जना, सृजनशील कालोनी,
बिस्कुट फैक्ट्री रोड, निकट मगध आईटीआई,
नासरीगंज, दानापुर, पटना - 801503 (बिहार)
सचल दूरभाष- 9304693031
[ दीया बाती के समहुतांक ( जुलाई, 2025 ) के अंक में प्रकाशित रचना । ]
