दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )
शिवरात्रि : भक्ति, साधना आ लोक - आस्था के महापर्व
निबंध
शशिप्रभा
2/15/20261 min read


शिवरात्रि : भक्ति, साधना आ लोक - आस्था के महापर्व
भारत के सांस्कृतिक आ धार्मिक परंपरा में महाशिवरात्रि के विशेष महत्व बा । ई पर्व भगवान शिव के समर्पित बा, जेकरा के भोलेनाथ, महादेव, नीलकंठ, शंकर, बम - बम भोले जइसन अनेकन नाम से जानल जाला । शिवरात्रि खाली एगो त्योहार ना, बलुक ई आत्मचिंतन, संयम, साधना आ भक्ति के महापर्व ह । खास क के उत्तर भारत, बिहार, पूर्वांचल आ नेपाल के तराई इलाका में ई पर्व बहुत धूमधाम से मनावल जाला ।
“शिव” के मतलब होला कल्याण आ “रात्रि” के मतलब होला अंधकार । यानी शिवरात्रि अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश क ओर जाए के प्रतीक ह । मान्यता बा कि ई रात भगवान शिव के सबसे प्रिय रात ह, एह दिन उनकर पूजा - अर्चना कइला से मनोकामना पूरा होला आ जीवन में सुख - शांति आवेला ।
धार्मिक ग्रंथन के अनुसार, महाशिवरात्रि के दिन ही भगवान शिव आ माता पार्वती के विआह भइल रहे । एही से ई दिन दांपत्य जीवन में सुख, समृद्धि आ विश्वास बढ़ावे वाला मानल जाला ।
शिवरात्रि से जुड़ल कई गो पौराणिक कथा बा । एगो प्रमुख कथा समुद्र मंथन से जुड़ल बा । जब देवता आ असुर समुद्र मंथन करत रहलें, तब हलाहल विष निकसल, जवन सृष्टि के नाश कर सकत रहल । तब भगवान शिव ओ विष के अपना कंठ में धारण कइलें, जेह से उनकर कंठ नीला पड़ गइल आ ऊ नीलकंठ कहलाए लगलें । एह महान त्याग के स्मृति में शिवरात्रि मनावल जाला ।
दूसर कथा के अनुसार, एह दिन शिवलिंग के पहिला बेर प्राकट्य भइल रहे । मान्यता बा कि भगवान शिव निराकार से साकार रूप में शिवलिंग के रूप में प्रकट भइलें । एहसे शिवलिंग पूजा के विशेष महत्व बा ।
शिवलिंग पूजा के महत्व
शिवलिंग भगवान शिव के निराकार रूप के प्रतीक ह । शिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर जल, दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल, बेलपत्र, धतूरा, भांग आ आक के फूल चढ़ावल जाला । बेलपत्र खास महत्व रखेला, काहे कि ई भगवान शिव के बहुत प्रिय मानल जाला ।
ग्रामीण इलाकन में लोग भोरे - भोरे नदी, तालाब भा कुआँ से जल ले आवेला आ “हर हर महादेव” के जयकारा लगावत शिव मंदिर में पूजा करेला ।
महाशिवरात्रि के दिन व्रत रखे के परंपरा बहुत पुरान बा । कई लोग निर्जला व्रत रखेला, त कुछ लोग फलाहार करेला । मान्यता बा कि शिवरात्रि के व्रत से मन, शरीर आ आत्मा तीनों शुद्ध होला ।
भोजपुरी अंचल में खासकर औरत शिवरात्रि के व्रत बहुत श्रद्धा से रखेली । कुंवारी कन्या लो नीमन वर पावे खातिर आ बिअहल औरत अपना पति के लंबा उमिर खातिर व्रत रखेली ।
शिवरात्रि के खास परंपरा रातभर के जगरम ह । एह रात भर लोग जाग के भगवान शिव के भजन, कीर्तन, कथा आ आरती करेला । “बम बम भोले, ॐ नमः शिवाय” के गूंज से पूरा वातावरण शिवमय हो जाला ।
कई जगह प लोक कलाकार शिव भजन, निर्गुण आ कजरी शैली में गीत गावेले । ढोलक, मंजीरा आ झांझ के साथ गावल गइल भजन से माहौल भक्तिमय हो जाला ।
ग्रामीण समाज में शिवरात्रि के किसान जीवन से भी गहरा संबंध बा । फागुन महीना में पड़ेला ई पर्व, जब रबी फसल पक के तैयार होखे लागेला । किसान भगवान शिव से अच्छा फसल, समय पर बारिश आ आपदा से रक्षा के प्रार्थना करेला ।
कई गाँव में शिवरात्रि के दिन मेला लागेला, जहवां खिलौना, मिठाई, चूड़ा, बताशा, बेलपत्र आ पूजा सामग्री के दुकान सजेले ।
शिवरात्रि खाली धार्मिक पर्व ना, बलुक सामाजिक एकता के भी प्रतीक ह । एह दिन अमीर - गरीब, ऊँच - नीच के भेद मिट जाला । सब लोग एक साथ मंदिर में पूजा करेला, प्रसाद बाँटेला आ एक - दूसरा के शिवरात्रि के शुभकामना देला ।
शिव के व्यक्तित्व में वैराग्य आ करुणा दुनों के समन्वय लउकेला । ऊ कैलाश पर भी रहेलें आ श्मशान में भी, साधु - संत के भी देवता हउवें आ गृहस्थन के भी । एहसे शिव सबके हउवें – गरीब के, अमीर के, स्त्री के, पुरुष के ।
आज के आधुनिक जीवन में भी शिवरात्रि के महत्व कम नइखे भइल । शहर में भी लोग ऑनलाइन पूजा, लाइव आरती आ डिजिटल भजन के माध्यम से भगवान शिव से जुड़ रहल बा । हालांकि, असली आनंद तबे आवेला जब श्रद्धा आ विश्वास के साथ पूजा कइल जाव ।
युवा खातिर शिवरात्रि आत्मसंयम, नशा - मुक्ति आ सकारात्मक जीवन के संदेश देला । भगवान शिव खुद तपस्या, ध्यान आ संतुलन के प्रतीक हउवें ।
अंत में कहल जा सकेला कि महाशिवरात्रि केवल एगो पर्व ना, बलुक जीवन जीए के तरीका सिखावे वाला दिन ह । ई हमनी के सिखावेला कि त्याग, तपस्या, सत्य आ करुणा से जीवन के ऊँचाई छूअल जा सकेला ।
!! ॐ साम्ब सदाशिवाय नम: !!
शशिप्रभा
बड़हलगंज, गोरखपुर
