दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )
शिक्षा : सम्पूर्ण जीवन व्यवस्था के आधार
जीवन के मूल आ मजबूत आधार शिक्षा ह
डॉ० ब्रज भूषण मिश्र
7/8/20251 min read


शिक्षा सम्पूर्ण जीवन व्यवस्था के आधार
जीवन के मूल आ मजबूत आधार शिक्षे ह । बिना शिक्षा मनई के जीवन बेमतलब आ दिशाहीन हो जाला । कवनों काज-परोजन के ठीक-ठाक ढंग से पूरा करे आ सफल करे में, सही दिशा में उतजोग करे के पड़ेला । सही दिशा का होई ऊ हमनी के बुद्धि-विवेक पर निर्भर करेला । बुद्धि-विवेक खातिर अपना अंत:करण में ज्ञान संचित होखे के चाहीं । आ ज्ञान हमनी का शिक्षा से मिलेला । शिक्षा व्यापक रूप से मानव समाज के विकास आ प्रगति के कारक ह । ई एगो अइसन प्रक्रिया ह, जवना से ज्ञान, सूचना आ कौशल मिलेला । आ ई एगो सतत प्रक्रिया ह, जवन एक से दोसरा, दोसरा से तिसरा आ अइसहीं आगे दियात चलेला । ई शिक्षा हमनी का नैसर्गिक रूप से, अपना माता -पिता-गुरुजन से, समाज से आ अपना अनुभव से मिलेला । शिक्षा के जरिये हमनी कवनो काज के सही रूप में, सही ढंग से कर सकिले; बलुक गलत तरीका आ गलत रूप से करे में बॉंचियो सकिले । सही ढंग से शिक्षित बेकती अपना आचरण आ व्यवहार से, अपना संस्कारित जीवन से आपन जीवन त सही ढंग से संचालित करबे करेला, बलुक घर, परिवार, समाज, देश सबके उन्नति, बढंती में आपन बड़हन भूमिका निबाहेला । ई एगो अदृश्य वस्तु ह, जवना के दान दिहल जा सकत बा, बाकिर एकरा के चोरावल नइखे जा सकत ।
अइसे त शिक्षा आ विद्या के बीच विद्वान लोग ॳतर मनले बा, बाकिर एह में बहुत कुछ समानता बा । कहल बा कि बिद्या दिहला से बढ़ेला । विद्या प्राप्त करके बहुत कुछ पावल जा सकेला । बड़ा प्रसिद्ध सूक्ति बा -- "विद्या ददाति विनयं, विनयात् याति पात्रताम् । पात्रत्वाम् धनमप्राप्ति, धनात धर्मं तत: सुखम् ।" अर्थात, विद्या से विनय मिलेला, विनय से पात्रता मिलेला, पात्रता से धन प्राप्त होला आ धन से धर्म मिलेला, जवना से सब सुख प्राप्त कइल जा सकेला ।
बड़हन अर्थ में विकसित जीवन आ छोटहन अर्थ में कवनो निश्चित प्रणाली के अंतर्गत जीवन के तैयारिये शिक्षा ह । शिक्षा के बात आवेला त हमनी का विद्यालय, महाविद्यालय, गुरुकुल देखाई पड़े लागेला । शिक्षण संस्थान सब के महत्व तब बढ़ जाला, जब ऊ अपना समाज के विकास में अहम भूमिका निबाहेला । भारत के प्राचीन शिक्षा पद्धति में एही से गुरुकुल सब के सबसे बेसी प्रतिष्ठा रहे । गुरुकुल में विद्यार्थी लोग का अक्षर ज्ञान के संगे-संगे परम्परा के जीवंत राखे, ओकरा के अउर निखारे आ समाज के सुरक्षा के शिक्षा दिहल जात रहे । हमनी के संस्कृति में शिक्षा के उद्देश्य शिक्षार्थी के ज्ञान विज्ञान से पूर्ण कइला से कहीं अधिका चरित्र आ भाव संवेदना के परिष्कार कइल रहे । जीवन के सफलता के खाली अर्थ के उपार्जन से देखले ठीक ना मानल जात रहे । सही से अपना प्रतिभा आ क्षमता के विकासे जीवन के सफलता के कसउटी होखे के चाहीं । जब प्रतिभा आ क्षमता बढ़ी त उहे आजु ना त बिहान जीवन में सफलता के नया-नया राह खोल सकत बा । ओकर भाव संवेदना ओकरा जीवन के दिशा आ धारा तय कर सकत बा ।
बाकिर ई जरूरी नइखे कि शिक्षा संस्थान में पढ़ल लोग सुशिक्षित होखबे करी । सुशिक्षित उहे होई जे प्राप्त शिक्षा के आत्मसात करे, जीवन में उतारे आ ओही पर चल के आपन जीवन सुधारे आ जीवन व्यवस्थित करे । जीये खातिर त सब प्राणी जियबे करेला, बाकिर जीवन के कलात्मक, सुंदर आ सुखमय बना के एह तरह जीये कि दोसरो लोग के ओकरा से प्रेरणा मिले, सीख मिले, जीवन कला जान सके । जीवन कला से मतलब ई बा कि ऊ जीवन पद्धति, जवना से मनई निरोगी रहे, सच्चाई, सुनरपन आ सुघर व्यवस्था से जीवन बितावे । ओकर बोली बानी मीठ आ सरस होखे, ओकर रहन-सहन, पहिरावा-ओढ़ावा देखनउक-शोभनउक होखे आ चरित्र सात्विक होखे । शिक्षा बेकती के व्यक्तिगत आ सामाजिक दुनों पक्ष के उन्नति खातिर मनोवैज्ञानिक नजरियो से पूरा अनुकूल बा । जीवन के हर एक अनुभव जे जीवन के एक एक क्षेत्र में मिलेला, ओकरा से शिक्षा मिलेला । एह प्रकार से देखल जाए त लइकनो से भी माता-पिता गुरु शिक्षा पावेला । पालतू मवेशियो आ जानवरो से शिक्षा पावल जा सकत बा । हमनी का जवन कुछ कहिले, सोचिले, सुनिले, करिले आ अनुभव करिले, ओह सबसे कवनो ना कवनो शिक्षा मिलेला । उचित अनुचित के निर्णय करे में बनेला । एह से खाली शिक्षक द्वारा मिलल आ किताबन में पढ़ के जानल बात शिक्षा ना ह । बड़हन अर्थ में सोचल-विचारल जाय त मनई के पूरा जीवने शिक्षा ह आ शिक्षे जीवन ह। जवने कुछ व्यवहार हमनी के ज्ञान के परिधि के बिस्तार देवेला, हमनी के भितरिया दृष्टि के गहिर-चाकर करेला, हमनी के प्रतिक्रिया के परिष्कार करेला, हमनी के भावना आ क्रिया के जगावेला चाहे कवनो ना कवनो रूप में प्रभावित करेला, विभाजित करेला, ऊ हमनी के सिखइबो करेला ।
शिक्षा वास्तव में अपना व्यापक अर्थ में ओकरा से बेसी काम करेला । एकरा भितरी उहो सब प्रभाव आ जाला जे ओह सब वस्तु के द्वारा मानवीय चरित्र आ शक्ति के प्रभावित करेला । एकर सीधा प्रयोजन कुछ दोसरे होखेला, मतलब कि मनई नियम पूर्वक, शासन के रूप से, औद्योगिक कला से, सामाजिक जीवन के रीति से, इहॉं तक ले कि ऊ अपना इच्छा से आ पूरा रूप में जलवायु, भूमि आ स्थानीय परिस्थितियन के प्राकृतिक प्रभावो से प्रभावित होखेला । शिक्षा ऊ संस्कार ह, जे प्रत्येक पीढ़ी जान बूझ के अपना वारिसन के एह से सॅउपेला कि ऊ ओकर रछेया करे के लायक बने आ जतना कुछ एह क्षेत्र में उपलब्धि हासिल भइल बा, ओकर स्तर ऊॅंचा करे ।
एह प्रकार से ई कहल जा सकेला कि शिक्षा संपूर्ण जीवन व्यवस्था के आधार होला । एह बात के बिन्दुवार अइसे जानल जा सकत बा :-
शिक्षा से बेकती के सर्वांगीण विकास होखेला । ई बेकती के सभ्य, परिष्कृत, सुसंस्कृत आ सुशिक्षित बनावेला ।
शिक्षा से बेकती का ज्ञान, अनुभव कौशल आ साफ आ स्वस्थ दृष्टिकोण मिलेला ।
शिक्षा से केहू का सही आ गलत के अंतर के समझ विकसित होला ।
शिक्षा से बेकती के मन, शरीर आ आत्मा विकसित होखेला ।
शिक्षा से बेकती में देश प्रेम आ तेयाग के भावना आवेला ।
शिक्षा से समाज में समृद्धि, विकास आ वैज्ञानिक उन्नति होखेला ।
शिक्षा से समाज तकनीकी, आर्थिक आ सामाजिक रूप से सशक्त बनेला ।
शिक्षा से समाज का भावी पीढ़ी खातिर ऊॅंच आदर्श, आकांक्षा, विश्वास आ परम्परा के सॅउपल जा सकेला ।
शिक्षा से व्यक्ति समाज अउर राष्ट्र के विकास के खातिर समर्पित होला।
शिक्षा बेकती के आत्म निर्भर बनावेला, सही नीति, मूल्य आ संस्कृति के ज्ञान देवेला ।
शिक्षा से ओह गुण सब के विकास होला जवना से केहू समाज में सफल होला आ ऊ गुण बाड़ें सबुद्धिमत्ता, सहजता, विचारशीलता, संघटनशीलता आ संगठन क्षमता ।
आखिरकार ई कहल जा सकत बा कि शिक्षा बेकती आ समाज का विकास के मजबूत आधार ह । ई कवनो बेकती के जीवन में चुनौती के सामना करे आ अपना आकांक्षा के पूरा करे में ज्ञान, कौशल, आ मूल्य से सशक्त बनावेले । शिक्षार्थी खातिर शिक्षा बौद्धिक विकास, आलोचनात्मक सोच, रचनात्मकता आ समस्या के समाधान के क्षमता बेकती में बढ़ावेवाला एगो साधन ह शिक्षा । ई आत्मविश्वास के बढ़ावे वाला आ नैतिक मूल्य के बढ़ावे वाला भी साधन ह ।
डॉ. बृज भूषण मिश्र
अध्यक्ष अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन
सचल दूरभाष- 9905030520
[ दीया बाती के समहुतांक ( जुलाई, 2025 ) के अंक में प्रकाशित रचना । ]
