दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )
आंखीं देखल, कान से सुनल
( सत्य घटना )
सुनील कुमार यादव
3/15/20261 min read


आंखीं देखल, कान से सुनल ( सत्य घटना )
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* जगह - बलिया न्यायालय परिसर |
* तारीख - 04 दिसम्बर, 2024 |
* समय - लगभग 02:00 बजे | लंच के समय |
* घटना - मुवक्किल आ वकील के बातचीत | दरोगा जी के रौब | आरोपी के लटकल मासूम चेहरा |
( आरोपी आ मासूम ? हमके त पहिला नजर में मासूम ही लागल | पूरा पढ़ीं । हो सकेला कि रउवों हमरा बात से सहमत हो जाइब | )
* मुवक्किल - एगो छोट बच्ची, उमिर तकरीबन 10 - 12 साल |
* वकील - अधेड़ उमिर ( शरीर देखला से 45+ के लागत रहलन | )
* आरोपी - 15 - 16 बरिस के एगो नाबालिग लइका |
* वकील साहब - सुन हेने !
* मुवक्किल - ( वकील साहब के लगे आ के.. ) बताई साहेब !
* वकील - मन परsता नू कि जज साहेब के सोझा का कहे के बा ?
* मुवक्किल - हां, मन परsता | जवन रउवां कहनी ह, हम कहि देब |
* वकील - बताउ त, का कहबे ?
* मुवक्किल - इहे कहब, कि राजू चाचा ( सम्भवतः आरोपी के इहे नाम रहुवे | ) हमरा के जमीनी प गिरा दिहले ह आ हमरा के एने ओने छुए लगले ह |
( कुछ देर रूक के | )
वकील साहब के बोलला से पहिले ही दुबारा मुवक्किल - बाकीर ऊ ( आरोपी राजू ) त राही में भेटाइल रहुवन त कुछू ना कहुवन | खाली कहुवन कि ऐने का करे आइल बाड़े ! बलुक हमरा के डटबो करूवन कि जल्दी घरे जो |
* वकील ( खिसिया के ) - ढेर बोलबू त अबे तहरो के बंद करवा देब | जेतना कहल जाता, ओतने करs |
अचानक,
दरोगा जी ( उमिर लगभग 50 बरिस ) हरकत में आ गउवन आ मुवक्किल के दादी ( उमिर लगभग 65 बरिस ) की ओर शेर नियन दहाड़त झपटुवन औरी...
* दरोगा जी - अरे ! बुढ़िया | बता दे ए छोकड़ी के कि जेतना कहल जाव ओतने बोलो | ना त अबे एकर कुल करम कर देब |
( मुवक्किल डेरा के अपना दादी के गोदी में बइठ गइल | )
* दादी - ना साहेब ! जवन रउवा कहब ई तवने कही | रउवां चिन्ता मत करी |
( औरी ओकरा बाद दादी मुवक्किल के डांटत आ पुचकारत एगो अइसन अपराध के कहानी गढ़े खातिर मुवक्किल के मना लेली जवन शायद घटिते नइखे भइल |
* हम - कानून के नवकी देवी के आंखी से पट्टी त हटा दिहल गइल बा बाकिर आंखी के रोशनी अब तक नइखे आइल | हाथ से तलवार हटा के पुस्तक पकड़ा दिहल गइल बा | ताकि अब औरी प्रेम से गला काटल जा सके |
साड़ी का रंग सफेद क दिहल बा ताकि न्याय के अर्थी निकलला प मातम मनावल जा सके |
हाथ में तराजू यथावत बा | ताकि रउवां समझीं कि न्याय मिले के प्रक्रिया एही तराजू नियन यथावत रही मतलब ई कि न्याय अभियो ना मिली |
जज साहब के कोर्ट रूम में आगमन ।
दूनों पक्ष के वकील साहब लो न्याय के संगे अन्याय करे खातिर कुछ जज साहब से कहल लो ।
जज साहब के भी शायद घरे जाए खातिर देरी होत रहुवे । ना माने 3 बज गइल रहुवे । त उहों के ओह आरोपी के अपराधी घोषित करत एक साल खातिर जमानत प रोक लगा दिहुवन ।
घटना दिमाग में घूम रहल बिया | बेर - बेर ऊ लइका के चेहरा आंखीं के सोझा आ जा रहल बा | नींद नइखे आवत | बेर - बेर ओह आरोपी लइका के भोकार पार के चिकरल आ कहल कि बुचिया ई का कइले ! हम तोर का बिगड़ले रहनी ह ! मन पड़ जाता आ हम बेचैन हो जातानी ।
बाकी शायद वकील साब, दरोगा जी आ जज साहब आजु चैन के नीन सूती लो | तीनों जाना एगो केस के ठिकाना लगावे खातिर दिन भर कड़ा मेहनत जे कइले रहुवे लो |
सुनील कुमार यादव
प्रबंध सम्पादक, दीया बाती
प्रबंधक
फ़ीनिक्स इंटरनेशनल स्कूल
बलिया
