दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )
सतुआन परब : सांस्कृतिक, सामाजिक विश्लेषण
परब विशेष
डॉ. जयप्रकाश तिवारी
4/14/20261 min read


सतुआन परब : सांस्कृतिक, सामाजिक विश्लेषण
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सतुआन परब मुख्यत : बिहार, उत्तर प्रदेश खास क के पूर्वांचल, झारखंड आ असम के एगो प्रमुख लोकपर्व ह । ई गरमी के शुरुआत के समय, होली आ चइत नवरात के बाद मनावल जाए वाला महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आ सामाजिक परब ह । एह परब के आम जनता आ किसान के परब भी कहल जाला । किसान लोग अपना नया फसल ( जौ, चना आदि रबी ) के पहिला उपज के भुज के सातू बना के भगवान के भोग लगावेला आ बढ़िया फसल खातिर कृतज्ञता के रूप में अनाज अर्पित करेला ।
आध्यात्मिक आ सांस्कृतिक महत्व :
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भारत में मनावल जाए वाला हर परब के आपन धार्मिक, आध्यात्मिक आ सांस्कृतिक महत्व होला । वैदिक काल से किसान लोग अपना नया फसल के सूर्य देव के समर्पित करत आइल बा । किसान वर्ग के मान्यता बा कि सूर्य देव ऋतुअन के स्वामी हउवें । उनकर किरपा से अलग - अलग मौसम में तरह - तरह के फसल उगेला आ फलेला - फूलेला ।
अनाज के अलग - अलग रूप में कृतज्ञता आ खुशी के भाव से भगवान के समर्पित करे के परंपरा भारत में बहुत पुरान बा । चेतना आ संवेदना के विकास के संगे - संगे ई परंपरा भी ओतने पुरान बा जतना पुरान हमनी के सांस्कृतिक आ आध्यात्मिक चेतना बा ।
अब प्रश्न उठ सकेला कि सतुआन परब के परंपरा कतना पुरान बा ? जइसन ऊपर बतावल गइल बा, ई ओतने पुरान बा जतना हमनी के सांस्कृतिक चेतना । वैदिक ग्रंथ हमनी के सांस्कृतिक चेतना, बुद्धि आ विवेक के मार्गदर्शक मानल जालें, आ ओह में ऋग्वेद के सबसे पहिला स्थान बा । ऋग्वेद में भी सतुआ ( सुक्तू ) के उल्लेख मिलेला ।
“सत्तू” शब्द संस्कृत के “सुक्तू” शब्द से निकलल मानल जाला, जेकर अर्थ भुजाइल अन्न ह, खास करके जौ ( यव ) के भुजाइल दाना । ई जौ यज्ञ में हविष्य के रूप में भी इस्तेमाल होत रहल बा । बाद में जौ के साथ चना भुजा के एगो निश्चित अनुपात में मिला के सतुआ बनावल जाए लागल ।
ऋग्वेद में ई सत्तू ( सकति ) के उल्लेख इन्द्र देव के भोज्य पदार्थ के रूप में भी मिलेला - "यज्ञं नक्तं हविषा सूक्तना ते” (ऋग्वेद 10.115.4 ) ।
एह तरह महाभारत आ अन्य पौराणिक ग्रंथन में भी कई जगह ऋषि - मुनियन द्वारा सतुआ के सात्विक आ शुद्ध भोजन के रूप में सेवन आ दान करे के उल्लेख मिलेला ।
खगोलीय महत्व :
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बाकी भारतीय परबन के तरह एह परब के भी आपन खगोलीय महत्व बा । ई मेष संक्रांति के दिन मनावल जाला, जब सूर्य देव मीन राशि से मेष राशि में प्रवेश करेलन । ई परब आमतौर पर वैशाख महीना के शुरुआत में ( 14 भा 15 अप्रैल के ) मनावल जाला ।
एह दिन सतुआ के साथ आम के पेड़ पर लागल नया - नया अमिया के चटनी खाए के परंपरा बा । सतुआन से खरमास के चलते रुकल मांगलिक काम फिर से शुरू हो जाला ।
सतुआ किसानन के सदाबहार भोजन मानल जाला । कम खर्च में स्वादिष्ट आ बहुत पौष्टिक होखे के वजह से ई स्वास्थ्य के लिहाज से भी बहुत फायदेमंद बा । सतुआ से बनल कई गो देहाती व्यंजन जइसे - बाटी - चोखा, सतुआ के पराठा, ( मकुनी, लिट्टी, फुटेहरी ) आदि पूरा उत्तर भारत में बहुत लोकप्रिय बाड़ें । आजकल सतुआ से बनल व्यंजन बड़ - बड़ शादी - बियाह आ समारोह में भी परोसल जाए लागल बा ।
धार्मिक महत्व :
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सतुआन परब के दिन किसान लोग भदवा के संगे - संगे समाज के शिक्षित करे वाला ब्राह्मण आ पुरोहित वर्ग के भी याद रखेला । एह दिन माटी भा पीतर के मटका में सतुआ आ गरमी से बचाव खातिर हाथ के पंखा भेंट कइल जाला । कई लोग बिजली वाला पंखा भी दान करेला ।
ई परंपरा लोकहित, गुरुजन - सम्मान आ कृतज्ञता के भावना के प्रतीक ह । आज समय बदल गइल बा, व्यवस्था भी बदल गइल बा, लेकिन श्रेष्ठता आ ज्ञान के प्रति आभार के भावना आज भी कवनो ना कवनो रूप में जिंदा बा । एह तरह ई परब लोक - शिक्षा के काम भी करेला आ परिवार में संस्कार आ संवेदनशीलता बढ़ावेला ।
ऊपर बतावल गइल बा कि पुरान समय में ऋषि मुनि सतुआ के सेवन करत रहलें । आजकल कुछ जगह पर सतुआन में सतुआ के जगह सिंघाड़ा के आटा के इस्तेमाल भी होखे लागल बा । अब सवाल उठेला कि सतुआ के जगह सिंघाड़ा के आटा कइसे आ काहें इस्तेमाल होखे लागल ?
चेतना के विकास के साथ फल के अन्न से अधिक शुद्ध मानल जाए लागल । एह वजह से व्रत में अन्न के जगह फलाहार के परंपरा बढ़ गइल । जब सिंघाड़ा के सुखा के ओकर आटा बनावे के तरीका सामने आइल, तब भुजाइल अन्न के आटा के जगह कई जगह सिंघाड़ा के आटा इस्तेमाल होखे लागल । हालांकि व्रत के अलावा सतुआ के उपयोग कम ना भइल, बल्कि आज भी बहुत लोकप्रिय बा ।
सत्तू आ सिंघाड़ा :
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सिंघाड़ा के आटा आ सतुआ दुनों ही पौष्टिक बाड़ें, बाकिर दुनों के स्रोत अलग - अलग बा । सिंघाड़ा के आटा पानी में उगे वाला सिंघाड़ा फल के सुखा के बनावल जाला आ आमतौर पर व्रत में खाइल जाला ।
दूसरा ओर सतुआ भुजाइल चना भा जौ के पीसल आटा ह, जवन रोजमर्रा के भोजन में इस्तेमाल होला । सिंघाड़ा के तासीर ठंडा मानल जाला, जवन गरमी में राहत देला । सतुआ भी शरीर के ठंडक देला, बाकिर ई खास तौर पर प्रोटीन से भरपूर भोजन ह । सिंघाड़ा के आटा में कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, पोटैशियम आ आयरन जादे मिलेला, जे पाचन खातिर अच्छा बा । सतुआ में प्रोटीन, फाइबर आ कई तरह के खनिज तत्व भरपूर मात्रा में होला, जे शरीर के ताकत आ मांसपेशी खातिर फायदेमंद बा ।
एह से अगर व्रत खातिर हल्का आ ठंडक देवे वाला आहार चाहीं त सिंघाड़ा बेहतर बा । आ अगर प्रोटीन से भरपूर भोजन चाहीं त सतुआ बेहतर विकल्प बा ।
अब ई दावा से कहल जा सकेला कि सतुआन परब अपना आप में एगो पूरा लंबा परंपरा आ इतिहास, ज्ञान, विज्ञान, धर्म, खगोल सबके समेटले बा । बड़ा शर्म के बात बा कि हमनी के नया पीढ़ि एह के महत्व और उपयोगिता के समझे के कोशिश नइखे करत आ पाश्चात्य संस्कृति की ओर निहारत बा । अइसन परिस्थिति में हमनी के आपन परब जोर - शोर से मनावे के चाहीं औरी नया पीढ़ी के पूरा बात बिस्तार से बतावे के चाहीं । आईं हम सभ एह बात के निश्चय करीं जा कि आपन मए परब, त्यौहार धूम धाम से मनवाल जाई और अपना बच्चन के भी एकरा महत्व के समझावल जाई ।
डॉ. जयप्रकाश तिवारी
भरसर, बलिया, उत्तर प्रदेश
