दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )

सरग - नरक

कहानी

डॉ सुशीला ओझा

2/15/20261 min read

सरग - नरक

एगो त दुबर - पातर, कूबर निकलल, करिया - काबर, बाँस खनिया भोथर बोली..। कौनो लाग लपेट ना..। खाली पइसा ओकर भगवान रहलें । ओही में दिन रात लागल रहत रहे । कौनो बिधि पइसा आए के चाहीं । पइसा अइसन चीज ह कि ओकरा आगे.. लोक, सास्तर, घर - पलिवार, समाज, सब बेकार लउके लागेला । माने दिन भर, हे सिवाला से हो सिवाला.. सीतला माई के गोहरावत रहे ! मानुस जनम लेके.. मानुस के मन... मानुस के धरम , करतब से ओकरा कवनो मतलब ना रहे । माई बेर - बेर चेतावे - पहिले 'क' अछर पढ़ल जाला.. ओकर माने होला करतब... तब "ख" अछर आवेला.. कि अब खा । जब करतब ना करी केहू त खाई का‌?

खाली माई.. महादेव के पूजत रहे कुसुमी... ! एकरे से भागवान खुस होइहें त छपर फार के दिहें । ओकरा सास - ससुर के खईला बिना अँतड़ी अईंठात रही.. । बाकिर पूजा त पूजा ह । पूजा पर से उठते - उठते त सब मंतर भुला जाला । सास - ससुर के कोठरी में माछी भिनकत रही, बसना के मारे घर में केहु ढुके ना । केहु तरे खयका फेंक के चल आई ।मल - मूत से कोठरी बसात रही । मने ओकरा अपना पूजा से कहिओ फुरसत ना रही । दुआरी प नीम के पाता टांग दी कि बुढ़वा - बुढ़िया के बेमारी - सेमारी ना पाटे । बड़ा फुहर - फसाक बा लोग । बिछौने पर कचाहिन क देता लोग, कहे के ना चाहीं ? आ जब बुढ़वा - बुढ़िया बोलईहन स त पूजा के बहाना क के निकल जाई । कबो उ लोग के हाथ अईंठ दी, कबो चटाचट मारे लागी.. । बुढ़वा - बुढ़िया कपसल रहिहन सन ।केहु के, लगे ना जाए दी । कबो केहु गलती से चल जाई ... त बुढ़वा - बुढ़िया कलप - कलप के छव - छव पाती रोइहन सन । किरिया धरइहन सन... कुसुमी से मत कहिह लोग ना त हमनी के मारे लागी !

एगो त सउसे देह में खाली हडिए बा, बाड़ा चोट लागेला । फालिस मारल देह में बचहूं के कवनो असरा नईखे । हमनी के बडा़ गजन करेले । चाभी लेके... सब गहना - गुरिया, रोपेया - पइसा ले ले बिया । कबो मन करेला कुछु खाए के त केकरा से कहीं ? तरकारी में नून - मरीचा हुर देले..। भुजा खनिया भात..चईली खनिया रोटी, खाईल ना जाला । नून - मरिचा मुँह में जाएला त तीनों तिरलोक लउके लागेला । दाँत हलही नईखे ..भूजा खनिया भात, ना घोटाला... । रोटिया चईली खनिया... काल्ला छिला जाला । हेतना दूध खातिर त बभनी बिया जाला । इ सब रोजगार हमनी के मुआवे खतिरा होता । का जाने दईब कहाँ सुतल बाड़े ? जिनगी पहाड़ हो गईल बा । जिनिगिये में सब सह लेवे के बा, सरग - नरक सब ईहें बा । बुढ़ऊ के पनरे हजार पिनसिल मिलेला । कौना काम के उ पिनसिल ?...जब जाँगर ना रहे त भागवान उठा लेते...नरक में परल बानी सन... । खइला - खइला बिनु परान अइंठाता... । एगो आदमियों रखवा के सेवा - टहल करवा दिहितन सन । बिछौना बदल देते सन...नसे नस बन क देले बाड़ेन सन । हाकिमों खोराकी ना रोकेला...। पिनसिल के दिने ...पीठि पर बोझ के ले जाले सन...आ पिनसिल अपना हाथ में ले के मालिक हो जाले सन आ बुढ़वा - बुढ़िया के काल कोठरी में डाल देले सन...!

अइसन काल कोठरी में बानी सन कि एगो चिरईयो खातिर मनवा छछात रहेला... फोनवो पर कुछू बतियावल मने बा...। हमरे पइसा से फोन में पइसा भराला । हमरा से फोन छीन लेले बाड़े सन । बुढ़उ, दूध मंगाएलें.. उहो पियल मसकिल बा । एगो त कुछु पचाए के सकति कम हो गइल बा । ओपर से मरछिया दूधो के चोरी लगावेले... । आधा किलो दूध मंगाएले...ओकरा के सिकहर पर टाँगेले... बुढ़वा - बुढ़िया चोरा लिहन सन...। दूध पीअला से अजर - अमर हो जइहन सन... ।रूनी...आम ..जामुन..फेनसा सब हमनी के लगवले बानी सन...बाकिर..एगो मुँह में ना परेला...। कुसुमी त दोसरा जघे के हिय..। अपने जमालका जब....मुदई खनिया हो गइल बा त केकरा के दोख दी..? बेद...सासतर..सब झूठ उचरता..!

हमनी बुढा़ - बुढ़ी के अलगे क देले बाड़न सन । कहेले सन - बाप रे बाप..! हई बुढ़वा - बुढ़िया के देख, लोल में लोल सटा के बतिआवत बाड़े सन । सारी घर भरभट कर देले सन । जिनगी भर का कइले बा लोग ..? खाली बेटी के घर भरले बा लोग...। कीरा नु पड़ी तहन लोग के देह में...। हे तरे बुढ़वा - बुढ़िया के अन्हारा कोठरी में बन्द कईले बाड़े सन । जहँवा ना सूरुज के किरिन लउकेला ना हवा - बेयार आएला । सगरी पहरा गड़ले बाड़ेन सन..!

कुसुमी काम के डरे पूजा करे ले । सिलाई करेले, ऊहो मसीनवा बुढ़वा - बुढ़िया के पईसे से किनाईल बा । बाप - महतारी त गांगा होला । लइका सन केतनो गलती करीहन सन तबो हिरदया में ओकरा खातिर कवनो मइल ना रहेला...। कहीं रह सन, नीमन से रह सन.. लेकिन एक बात मनवा में घूमत रहेला । गांगा घाटे जा के एक बेर घाट के मन से पूज के नहाए के पड़ी..। गांगा माई से पुछे के बा कि कवन गलती भइल बा कि इ दिन देखे के परता ? तब जाके कहीं हमनी के सब गलती गांगा माई धोइहन..। कौनो पूजा पाठ , कुछ कहीं नइखे..। सबसे बड़का असीरबाद त माई के अंचरा में बा...! एक बेर ओ अंचरा में मुँह पोछ के...असिरबाद लेवे के परी...। अपना के पछताप के आगि में जरावे के परी । आदमी ह त, गलती होखबे करेला...। ओ गलती के माने के परी...आ संकलप लेवे के परी कि अब दोहरा के अइसन गलती ना होई । केकई माता ले आपन गलती, राम के समना सकरले बाड़ी...!

आदमी के बिकास के गाड़ी जब जाम हो जाला... त ओमे आदर - सेवा के तेल लगाके... पहिआ आगे बढ़ावे के चाहीं । पहिआ साथे - साथे दउरेला । ओकरा के चलावे .. खतिरा एगो छोट चुकी कांटी होला...। उहे पहिया के चलावेला । बाकिर कंटिया लुकाईल रहेला... त लोग ओकरा के देखबे ना करेला...!

सबके साथे लेके चलला से बिकास दउरेला... एहिसे कहल जाला - "सबकर साथ सबकर बिकास...।" आगे पर बढ़े खतिरा सबकर सहजोग...आदर...परेम ..बिसवास..के जरूरत पड़ेला । तब जाके जिनगी डगरेला...। कहल जाला -"अकेल चाना भड़वो ना फोरेला।" अकेल रही त भुजहीं में जर जाई ।

एह पर अकेले में ते ठांढा देमाग से सोचिहे, कुसुमी ...! तेहु एक दिन बूढ़ होखबे....हमनी के त पिनसिल मिलता त इ हाल बा...! तोरा त पिनसिलो ना मिली...। बुढ़ारी कौना गढ़ई में गिरी के जानता..?

डॉ सुशीला ओझा

पूर्व विभागाध्यक्ष

महेश्वरनाथ महामाया महिला महाविद्यालय

बगहा, बिहार