दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )
ऊसर के फूल
समीक्षा
विष्णुदेव तिवारी
7/30/20251 min read


ऊसर के फूल
समीक्षा
अपना प्रमुख आलोचना पुस्तक 'भोजपुरी कथा साहित्य के विकास' में डॉ० विवेकी राय विक्रमा प्रसाद के उपन्यास 'भोर मुसकाइल' के भोजपुरी के पहिल यथार्थवादी उपन्यास कहत बाड़े । बाकिर, ऊ इहो कहत बाड़े कि एह में उपन्यासकार समस्या के प्रेमचंद नियर समाधानो देबे लागत बा जे आजु के साहित्य में कवनो मतलब के नइखे रह गइल । भोजपुरी के अन्य उपन्यासन के चरचा करत, अपना एही किताब में आगे बढ़ला प, डॉ राय नरेन्द्र शास्त्री के 'ऊसर के फूल' के बारे में लिखते बाड़े, "भोजपुरी कथा-साहित्य का विकास में बलिया के नरेन्द्र शास्त्री के उपन्यास 'ऊसर के फूल'(76) महत्वपूर्ण स्थान बनवले बा काहे कि तमाम आदर्शवादी आ आदर्शोन्मुख यथार्थवादी कृतियन के बीचे इहे एगो ठोस यथार्थवादी कृति लउकत बा। मतलब साफ बा कि भोजपुरीके पहिला यथार्थवादी उपन्यास 'ऊसर के फूल' (ही) ह, 'भोर मुसुकाइल' ना ।
पं गणेश चौबे अपना किताब 'भोजपुरी के प्रकाशित ग्रंथ' में 1976 तक कई गो उपन्यासन के नाँव लेले बाड़े । भोजपुरी के पहिल उपन्यास रामनाथ पाण्डेय के 'बिंदिया' ह, जवन 1956 में छपल रहे। आज भोजपुरी उपन्यास साहित्य अपना के मात्रा आ गुणवत्ता दुनू लेहाजे समृद्ध मान रहल बा त एकरा पीछे 'ऊसर के फूल' जइसन नेऽइ के पाथरन के पोख्ता आधार के महत्व बहुत बा ।
दरअसल यथार्थ आ आदर्श में कथानक ना, ओकरा निबाहे के लूर अर्थात ट्रीटमेंट के भूमिका निर्णायक होखेले । उपन्यासकार 'ऊसर के फूल' में खाली एगो प्रस्तोता के रूप में सोझा आवत बा,प्रवक्ता के रूप में ना। तीन गाँव, मुड़ियारी, खरौनी आ बाँसडीह के प्रायः दर्जन भर चरित्र भल चाहे अनभल के रूप में सामने आवत बाड़े आ आपन छाप छोड़त बाड़े । इहाँ तक कि गौण से गौण चरित्र भी आपन सार्थकता साबित करता बाड़े, जइसे मंदिर के पुजारी जी । रघुनाथ के मेहरारू पार्वती जब उनका से पूछत बाड़ी कि एह संसार में आदमी के का करे के चाहीं बाबा ? तब उनकर जवाब भारतीय जीवन के चिर परिचित दर्शन होत बा। इहे भारत के आदर्श ह आ इहे जिनगी के यथार्थो ह। पुजारी जी कहत बाड़े, "एह संसार में केहू केहूके ना ह। आपन करमे साथ देला। देहि ना रहे, करम रहि जाला। मौसम बदलेला । साल गुजरि जाला। इतिहास नया पुरान होत रहेला । बाकिर, जेकर करम नीक बा, साँच बा, सेवा वाला बा, उहे अमर बा।"
तीन गाँव के जटिल कथा के एगो बरिआर कथानक में बान्ह के उपन्यासकार अंततः ई सनेस देबे में सफल रहत बा कि संसार में करमे प्रधान ह आ जे जइसन करी ओइसने पाई। उपन्यास में बेसी समय तक रहे वाला बाँसडीह गाँव के शमशेर सिंह आखिर में अपना मेहरारू के हत्यारा होके सजा भोगे खातिर अभिशप्त होत बा। शमशेर के चरित्र ओह युवा के प्रतिनिधित्व करत बा जे गलत से गलत राह चलके जिनगी के मउज लूटल चाहत बा - एगो अइसन चरित्र, जेकरा पासे अच्छा खासा जमीन बा, सुंदर आ प्रेम करेवाली मेहरारू बिया, मयगर आ गुनगर बहिन बिया ऊ शिवराम जइसन मूढ़, गैर कानूनी काम करे वाला आदमी के प्रलोभन में फँस के, अपना के पाप के ओह अधम तल में पहुँचा देत बा जहाँ से उबर पावल असंभव बा । शमशेर के बहिन सेवती मुड़ियारी गाँव के रामचंद्र सिंह से बियहल गइल बाड़ी बाकिर दुर्भाग्य इनको डंग नइखे छोड़त । ससुरे - नइहरे कतहूँ चैन ना, सुख ना। देयादिन लोग के खोभसन, जरनापा सहत ऊ ससुरा में सब सहत बाड़ी कि उनकर मरद कहला में बा आ आशा बा कि उनकरा बाँझ कोख में फर लागी, बाकिर सब सोचलका तँवा जात बा। नि:संतान सेवती के मरद अंत में दोसर बियाह क लेत बा आ उनकरा एगो दोसरा गाँव में, अपरिचित लोगन के बीच नोकर बन के, जिनगी खेवे खातिर मजबूर होखे परत बा । सेवती के प्रति सहानुभूति रखियो के पाठक उनका कमजोर चरित्र से प्रभावित नइखे होत ।
'ऊसर के फूल' संयुक्त परिवार के विघटन के करुण-कथा ह, जहाँ सेवती अस दुखियारी आपन सब धन समर्पित कइयो के खूँख के खूँख रह जात बाड़ी । ना परिवारे बचत बा, ना संसारे मिलता बा ।
'ऊसर के फूल' के दूसरा संस्करण 2025 में छपल। एह में शास्त्री जी के पुत्री अर्चना श्रीवास्तव के योगदान विशेष बा। एह उपन्यास के महत्व के रेखियावत ऊ अपना संपादकीय में लिखत बाड़ी, "एह उपन्यास के बारे में हम अतने कहब कि ई एगो ठोस यथार्थवादी कृति बा जवना में लेखक कतहीं भाषण नइखे करत, क्रोध, क्षोभ नइखे उगिलत । चुपचाप ऊ आजु के जीवन के असलियत खोल देता बा कि पूँजीवादी अर्थ-व्यवस्था ही गाँव के सीधा-सरल मनई के मौत के कारण बा ।"
अपना मंतव्य 'ग्राम्य संवेदना के अनमोल उपन्यास' में भगवती प्रसाद द्विवेदी एह उपन्यास के एगो दमदार आदर्शोन्मुख यथार्थवादी उपन्यास कहत बाड़े। द्विवेदी जी के विचार से एह उपन्यास के एगो पात्र राजेन्द्र, जे कहानी लिखता बा,नरेन्द्र शास्त्रिए के आपन रूप ह। डॉ० विवेकी राय राजेन्द्र में अमृत लाल नागर के उपन्यास 'अमृत और विष' के कथाकार अरविंद शंकर के प्रतिरूप देखत बाड़े ।
पूँजीवादी अर्थ व्यवस्था गाँवन के चेहरा आ चरित्र दूनों बदल दिहलस । अइसना में चरित्र के स्खलन सामान्य बात हो गइल । 'ऊसर के फूल' के अधिकांश पुरुष-पात्र एह स्खलन के जद में आवत बाड़े। राजेन्द्र एह जद में नइखन आवत । मालती के चेहरा चेचक के कारने कुरूप हो जात बा तबो ऊ उनका से बियाह करे खातिर नकरत नइखन । ऊ अपना के कुछ कमजोर भले पावत होखसु, ऊ अपना निश्चय से गिरत नइखन ।
'ऊसर के फूल' एगो चरित्र प्रधान उपन्यास ह जेमें कुछ चरित्र अपना करनी से समाज में प्रेरक के भूमिका निभावत बाड़े । कुछ नारी चरित्र त अइसन बाड़े जिनका में नारी-विमर्श के बीजांकुर निरेखल जा सकता बा, जइसे जिअनी के चरित्र, जइसे पानवाली भउजी के चरित्र ।
खरौनी गाँव के शिवराम के बहिन जिअनी नइहरे में जिनगी काट रहल बिया। उनका आ उनका मरद सहदेव में कुछ खटपट चल रहल बा। सहदेव जिअनी के लिआवे अपना ससुरारी आइल बाड़े बाकिर जिअनी उनका साथे नइखे जात । ऊ उनके सुनावत अपना बाबू लपेटन से कहत बिया कि तू बीच में जनि पर । ई जाके दोसर कइ लेसु ! हमरा से इनके ना पटी। सहदेव जात - जात लपेटन से कहत जात बाड़े, "अब से हमार दोस मत दीह ।"
शमशेर सिंह ओघरी लपेटन का घरहीं रहलन। दारू वाला काम चालू रहे। ऊ बोतल में दारू भरि - भरि माटी के गड़हा में डालत रहलन । बाद में जिअनी ओकरा के गोबर से लीप के बराबर कऽ दी।
जिअनी के सुनराई शमशेर के मन खराब कइले आवत बा। ओकर बात सुन के उनकर हियाव बढ़ जात बा। एकांता पाके ऊ जिअनी के गाटा पकड़ लेत बाड़े आ कहत बाड़े कि ओकरा खातिर ऊ आपन घर-दुआर सब छोड़ दीहें। अब तऽ जिअनी के खीस पहाड़ लाँघि गइल । ऊ आँख लाले - लाले कइले शमशेर पर चढ़ि बइठल। झट से गाटा छोड़ा के उनका गाल पर दू तमाचा लगा दिहलस आ उनका के धिरिकारत कहलस, "हमरा भतरा से नीमन बाड़ ? मुँह त सूअर नीयर बा। ई मति बुझिह कि हमसे लड़ि के गइल बात त हम ओके छोड़ देबि । ऊ हमार मरद ह। ओके दस बात हम कहबि, आ ऊ हमके जवन बुझाई तवन कही । तू के हउवऽ हमार हाथ पकड़े वाला ? तोहरा धन में आगि लगा देबि । आजु से बोललऽ त करिखही हाँड़ी से कपारे फोरि देबि । कुक्कुर कहीं का ।"
जिअनी के चरित्र में प्रेमचंद के कहानी 'घासवाली' के मुलिया के चरित्र लखार होत बा जे अपना चारित्रिक दृढ़ता से जमींदार चैन सिंह के छरपट छोड़ा देले रहे।
'ऊसर के फूल' के पानवाली (जोन्हिया) भी कमाल के चरित्र बा। एकरो जीवन पुरुष समाज के द्वारा पाप के गठरी बना दिहला जात बा। बाकिर, ई टूटत नइखे आ एगो हमउमिरिया विजातीय से बिआह कके सबके अचरज में डाल देत बिया। प्रेमचंद के स्टाइल से प्रभावित एह उपन्यास में रघुनाथ आ शिवराम के हृदय परिवर्तन के उदाहरण भी मौजूद बा ।
विष्णुदेव तिवारी
गांव - तिवारीपुर, दहिवर,
जिला - बक्सर (बिहार)
पिन - 802116
