दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )

समय

कविता

आरती पाण्डेय

12/15/20251 min read

समय

समय कब एक जइसन रहल बा ।

आजु के हालात काल्ह से एकदम अलग बा ।

काल्हू के हालात आज जइसन थोड़े रहल ।

आ का पता काल्ह का होई, कईसन होई !

जवन कुछ भी निक भल बा, आज ले बा

काल्ह बाउर हो जाए त कौने अचरज !

जे केहू आपन सगा बा, आज ले बा ।

काल्ह बैरी हो जाए त कौने अचरज !

जेतना भी हंसी खुशी बा, आज ले बा ।

काल्ह ग़म में बदल जाए त कौने अचरज !

जवन कुछ भी रूप - रंगत बा, आज ले बा ।

काल्ह इ सुघर जवानी ढल जाए त कौने अचरज !

फिर

जवन कुछ भी दुख बिपत बा, आज ले बा

काल्ह सब ठीक हो जाई, इ काहे ना मानी ।

जवन कुछ भी शोक, रुदन बा, आज ले बा ।

काल्ह जिनगी हसत मुस्कात होई, इ काहे ना मानी ।

जे केहू भी तिरस्कार - दुत्कार करत बा,आज ले करत बा ।

काल्ह उहे गले लगाई , इ काहे ना मानी ।

जेतना भी कठिन परीक्षा आ संघर्ष बा, आज ले बा ।

काल्ह सब सफल हो जाई, इ काहे ना मानी ।

सुख के दिन चार बा त दुख के दिन भी चार ही बा ।

ग़र सुख के दिन पलट जाई त दुख के दिन भी पलट जाई ।

तब चिंता कवना बात के, फिकिर काहे !

बेफिक्र होके जिहिं पूरा आस विश्वास से

समय करवट लिहि अपना हिसाब से ।

आरती पाण्डेय

शोधार्थी

जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय

बलिया, उत्तर प्रदेश