दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )

एह समय में

कविता

आरती पाण्डेय

7/17/20251 min read

एह समय में

अइसे देखल जाव त

एह दुनिया में का, का नईखे ।

नीक-बाउर सब बा ।

रेणु जी के बानी में कहल जाव त

ईहवां फूल भी बा, शूल भी बा ।

गुलाब बा, त कीचड़ भी बा ।

सुंदरता बा, त कुरूपता भी बा ।

दामन त कवनो भी चीज से

ना बचा सकेला आदमी ।

लेकिन कबो कबो

आंख बचावे के पड़े ला ।

अनदेखा आ कि अनसुना

करे के पड़े ला ।

काहे से कि

सब चीज देखे लागल जाव त

जिनगी जियल दूभर हो जाई ।

आज के इ दुनिया में

अपनापन आ लगाव त

रह नइखे गइल ।

रिश्ता त अइसे तार-तार हो रहल बा ।

मान जे कच्चा सुता होखे ।

छन भर में टूट रहल बा ।

नेह अउर भरोसा के मजबूत डोरी

कमजोर पड़ चुकल बा

परिवार के बांध सके में ।

इंसानियत कवनो जुमला हो गईल बा ।

जर्तुआही आ बदला के भावना में,

एक-दूसरा से आगे निकले के होड़ में

के, कब, केकरा के, कइसे

नुकसान पहुंचा दिही !

कुछु कहल ना जा सकेला ।

मार-पीट, खून-खराबा

चोरी, दगाबाजी, झूठ, फरेब

का, का देखल जाव !

बहुत कुछ देख के भी

ना देखले में ही भलाई बा ।

नाही त जिनगी से सुकून

आ इंसानियत से भरोसा

दुनो उठ जाई ।

एह समय में

देख के अनदेखा

आ सुन के अनसुना कईल ।

जरूरी लागे लागल बा |

आरती पाण्डेय

शोध छात्रा

जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय

बलिया