दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )

सब कुछ बदल गइल

कहानी

संतोष दीक्षित

12/28/20251 min read

सब कुछ बदल गइल

भिनहीं - भिनहीं उठके सबसे पहिले बैल आ गाय क पगहा खोल के नाद पर बान्हल तब लोटा में पानी लेके फराखित / दिशा मैदान होखे सरेही में चल जाव सब केहू फेरू लौट‌ के हाथ मांजे खातिर माटी रहे ओसे हाथ मांज के नीम पर से लाठी से आ चाहे चढ़िके नीब क दतुअन तुराव दतुवन कइला क बाद तुरंत चार अंजुरी पानी पीके खरमेटाव हो जाव ।

ओकरी बाद सबसे पहिले गोबर वाली खांची उठा के गोबर उठावल जाव गोबरो क एगो अलगे सुगंध रहे ओकरी बाद खरहर उठे आ सारी ( गोशाला ) झराव । ओकरी बाद लेहना कटाव फेरू तबले केहू चाचा भैया आवे त चार गारी लेबो करे कि अबहीं ले पता ना का करत रहल ह कुल लइका स्कूले जाए लगलस आ ए बाबु साहेब क अबही ले लेहने कटाता ।

डरने छोरी बांधत झोरा काखीं में सइहारत दौरत स्कूले पंहुची जां । ओइजा प्रार्थना में लागे खुसुर फुसुर होखे कि का ए भाई भूटिया पंडिजी क सूरदास जी क जीवनी याद हो गइल बा आ करियवा मास्टर साहब क सवाल हो गइल बा । ओकरी बाद क्लास में आपन - आपन बोरा बिछा के बैठी जा लाइन सीधा करावे क जिम्मेदारी क्लास मनिस्टर क रहे । आरे भाई ओह बेरा क उ कलक्टरे रहल । जिन जाना पर मन बिगरि जाव उनका के त क्लास टीचर से धोवाइए देसु ।

बाकी कबो - कबो एइसनों बहादुर से भेंट हो जाव कि मिनिस्टर साहेब के धो धा के ठीक क देव बहादुर, आ फेरु आठ नौ दिन ले स्कूले छोड़ि देव आ फेरु जब उ आवे त मिनिस्टर साहेब ओकर पकिया चेला बनि जास आ एइसन बहादुर बड़ा कारीगर होखे स जवना बेरा और लरिकन की लगे दस पैसा आ बीस पैसा ना रहे ओह बेरा उ पांच - पांच रूपिया लेके आवस । इ एइसन बहादुर लरिका रहलस कि इन्हनी की डर से गोंहूं आ चना सरसों क पयेर चाहे जेतना लोग अगोरे इ आपन युक्ति लगा के ओतना क इंतजाम क लेंवस आ उ अब मिनिस्टर (मानीटर) की संगे मिलि के आम अवाम की उपर जुर्म शुरु क देवस । अब त एह पार्टी की संगे पैसा क बल दबंगई क बल आ बुद्धि क बल तीनों एक संगे मिल गइल अब आपन दशा पढ़वइया लो देखे लोग ।

इ त रहल ह पराइमरी ले क काथा । एकरी बाद पांच पास क टी सी लेके आ मिडिल स्कूल में नांव लिखावे खातिर दोसरा गांवें जाये के परे । काहेकि आजौ की नियर निगिचा - निगिचा मिडल स्कूल ना रहे। नांव लिखावला क बाद किताब खोजाव आ जेकारा के किताब मिल जाव कहीं उ त जगि जीत लेव । आ जेकारा ना मिले ओकरी घर क लोग खोभसी के मुवा देबे । एह ससुरा के खयिला आ सुतला से आ सरेही माकला से फ़ुरसत मिली तब न किताबी खोजी । इ का पढ़ी । अब उ लरिका मुंह लटका के आ बुरबक नियर ताके लागे । आ जेकरा किताब मिल जाव उ त बुझाव कि जग जीत ले ले बा । ओह पावल किताब के लेके आ आटा क लेई बना के लेके बैठ जाव आ ओह किताबिन क मरम्मत क क के दफ्ती क गाता लगा - लगा के चक - चक क देबे में जुट जावस ।

फेर स्कूले जाये क बेरा अपनी -अपनी गोल की घर से संगी साथी क संगे मसूती में झोरा में रूमाल में रोटी आ अचार ले - ले के गाना गावत सूरदास आ मीरा क पद गावत पहुंच जावस ।

दुपहरिया में खाये के छुट्टी की बेरा आपन - आपन गोल बना के बइठी जावस आ जेकरी रूमाल में परवठा आ भुजिया रहे ओकर त लुटा जाव । मस्ती में आपन सूखल पाकल खाके फेर ओला - पाती, चिका - कबड्डी क मजेदार खेल होखे । आ फेरू घंटी बाजला पर मुंह हाथ धो धा के पढ़ाई होखे । आ फेर छुट्टी भइला पर घरे आके झोरा बोरा दलानी में फेंक फांकी के खेले निकल जाइजा । आ जे धरा गइल उ त मने - मने अपना के गरिआवत सानी पानी आ गोबर में भिड़ जाव ।

कुछ भी रहे लेकिन बाड़ा मस्ती रहे । ओह बेरा की मस्ती के इयादी क के मन खाली - खाली हो जाता । एह बेरा की लरिकन क भौतिक सुख आ मुरझाइल चेहरा देखि के बड़ा मोहो लागेला बाकी का करो केहू आजु ।

बेरा बदल गइल समय बदल गइल बाकी त सब कुछ ठीके बा ।

फेरू आगे क वृतांत अब अगिला बेर तवले खातिर आप सबके राम राम ।

संतोष दीक्षित

चांडी