दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )
सांड़
कहानी
मनोकामना सिंह अजय
12/28/20251 min read


सांड़
अनिल कुछ जरूरी समान खातिर जनता बजार जात रहलें । बाजार जाय के राह में कुछ सरकारी मकान दूनों ओर रहे । सरकारी मकान सब के नियरा जसही अनिल पहुंचले त ऊ देखत बाड़े़न कि एगो करिया मोटा तगड़ा सांड ओने से एने आवत बा । ओने से एक जना ऐने आवत रहलें त उनका देख के सांड मुड़ी ना झटलस । ई देख के हिम्मत बढ़ल आ ऊ धीरे - धीरे आगे बढ़े लगलें । सांड़ के बांये ओर से आवत देख के ई दायां ओर खाड़ा हो गइलें आ सोचले कि सांड़ आगे पार हो जाव त हम ऐने आगे बढ़ब । बाकिर ई का ! सांड़ बायां ओर से इनका ओर बढ़ के चल आइल ।सांड़ के सींग लगभग एक सवा फीट से कम ना होई । सांड़ आ अनिल के बीच के दूरी खाली दू फीट रह गइल रहे ।
अनिल के दिल जोर - जोर से धड़के लागल । कंठ सूखे लागल। ऊ जहवां खाड़ा रहन उहां के मकान के गेट रहे जेह में अन्दर से सिटकनी लागल रहे । केहू अन्दर से नजरो ना आवत रहे । ऊ हिम्मत क के आपन गेरूआ रंग के गमछा से हट - हट कह के हटावे लगलें । सांड़ उनका ओर देखत रहे आ ऊ सांड़ के । पता ना काहे सांड़ आधा मिनट के बाद आगे बढ़ गइल ।
अनिल के लागल कि सांड़ कवनो दैविक शक्ति के आदेश के पालन करत होखे । अनिल के भगवान भोलेनाथ के महिमा के साक्षात दरसन हो गइल । ऊ मने - मन भोलेनाथ के गोहरावत आगे बढ़े लगलें ।
मनोकामना सिंह अजय
