दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )
बीत जाए घड़ी ना कहीं प्रीत के
गीत
डॉ० रघुनाथ उपाध्याय 'शलभ'
12/20/20251 min read


बीत जाए घड़ी ना कहीं प्रीत के
_________
एगो दियना तु नेह के जरावत रह,
रोशनी ठांवे - ठांवे पसर जाए द ।
कांट - कुश से भरल हर डगर में सखी
आजु चंदन के खुशबू बिखर जाए द ।।
बाँटे मजहब ना दिल के दिल से कहीं ।
सूखे संगम ना अब धरा पर कहीं ।
घोरे कोई जहर ना मन में कभी,
आजु धरती पर अमरित टघर जाए द ।।
टूट जाए लड़ी ना कहीं गीत के ।
बीत जाए घड़ी ना कहीं प्रीत के ।
प्रीत के रीत हरदम निभावत रह,
हर दामन खुशी से तू भर जाए द ।।
पात मुरझा ना जाए कहीं डार के ।
नोंक चुभने ना पाए कहीं खार के ।
बहार बनिके पतझड़ मिटावत रह,
हर कली, हर सुमन के संवर जाए द ।।
मिटे रोशनी ना कबहूँ एक पल के लिए ।
केहू तरसे ना कबहूँ जल के लिए।
नेह के नीर से प्यास बुझावत रह
चान के आजु धरा पर उतर जाए द ।
कबहूँ आए ना आँसू केहू के नैन में ।
खलल पड़े ना कबहूँ केहू के चैन में ।
बाँसुरी प्रेम के तू बजावत रह ,
हर लम्हा खुशी से गुजर जाए द ।
डॉ० रघुनाथ उपाध्याय 'शलभ'
