दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )
सबके मन में लाखों पेंच
कविता
अनिरुद्ध कुमार सिंह
12/14/20251 min read


सबके मन में लाखों पेंच
झूठ कहीं त सब कोई पूजें,
साँच कहीं त लागे ठेस ।
झूठ साँच में समय गुजारी,
पग पग देखीं बदलल भेष ।
केहू के मन साफा नइखे,
रातों दिन हो तावे क्लेश ।
हर कोई बावे अझुराइल,
सबके मन में लाखों पेंच ।।
कलयुग के काली के महिमा,
हमरें जामल पाठ पढ़ावे ।
हम मोट मीठे रह गइनी,
ई मेंही चीनी कहलावे ।
जारी रोज चलावेला ई,
बोले सब कुछ देहब बेच।
हर कोई बावे अझुराइल,
सबके मन में लाखों पेंच ।।
केहू ना मानेला कहना,
सबके चाहीं गाड़़ल गहना ।
उलटा पुलटा भाखा बोले,
भायेला ना रोटी तियना ।
हरकोई चाहे बंटवारा,
रोजे झगड़ें फेटा खेंच ।
हरकोई बावे अझुराइल,
सबके मन में लाखों पेंच ।।
टूटल बा नल रोज सुनाता,
घर के सबे लोग नापाता ।
केहू के ना चिंता बावे,
बहरा से पानी खींचाता ।
बबुआ जी से कहले मुश्किल,
बे बाते हीं पटकस रेंच ।
हरकोई बावे अझुराइल,
सबके मन में लाखों पेंच ।।
टुकुर टुकुर देखेंनी सबके,
करनी धरनी अपना मन के ।
आगा पाछा के सोंचेला,
लालच बावे सबके धनके ।
हम सिधवा सीधे रह गइनी,
का टोकी, बोलेला फ्रेंच ।
हरकोई बावे अझुराइल,
सबके मन में लाखों पेंच ।।
अनिरुद्ध कुमार सिंह
धनबाद, झारखंड
