दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )
पतवार
कहानी
डॉ. गजाधर शर्मा ‘गंगेश’
7/8/20251 min read


‘पतवार’
अमावस कऽ काली रात अधियाये में अब तनकिये कसर रहि गइल रहे । बिना चनरमा के तरई एतना टहकार लागत रहली स कि जइसे आसमान अनगिनत आंख खोलि के एकटकी नजर से धरती पर केवनो खास होनी होत देख रहल होखे ।
नगेसर के बइठका क बाहरी ओसारी में गीत-गवनई अपना पूरा निखार पर रहे । गावे वाला लोग आपन सुर-ताल मिलावे में आ सुनवइया लोग सुने में मगन रहलन । ऐही बीचे चुपके से बिरजू उठल आ कुछ देर के बाद आके गवनई बीचे में जब रोकवा दीहलस त सब केहू सवालिया नजर से ओके देखे लागल । बिरजू सबके अपना पीछे-पीछे बिना केवनो आवाज कइले आवे के कहलस । सब केहू ओकरा बतवलानुसार उत्सुकता से चल पड़ल । केहू के ई ना पता रहे कि आखिर ऊ सबके लिया के कहां जा रहल बा !बलदेव चौधरी के घर के पिछवारे सबके रोकि के खाली पांच आदमी के अपना साथे लेके आगे बढ़ गइल । श्रीनाथ सिंह क छावनी वाला उत्तरी-पूर्वी छोर पर बनल कोठरी क पास ले जाके पांचो लोगन के पांव दबा के दरवाजा से सटि के कान अड़ाइ के भीतर से आवे वाली आवाज सुने के कहलस । कान देके सुनला पर इ साफ-साफ बुझा गइल कि ओह कोठरी में रमेसरा बनिया के अलावा एगो औरतो बिया, जेकरा साथे ऊं सांय-फुस बतिया रहल बा ।
दूसरा गांव क रहे वाला रमेसरा कुछे दिन पहिले आके इहां दुकान कइले रहे । रंगीला मिजाज क भइला क नाते जेवन कवनो अइसन ओइसन औरत ओकरा दुकान पर सउदा खरीदे जात रहली स, उन्हन से हंसी-मजाक करे आ चारा डालि के अपना जाल में फंसावे से तनिको बाज ना आवत रहे । ओकर ई हरकत गांव क आम मनइन के नागवार लागत रहे । कुछ लोग त ओकरा के रोक-टोक के भलमानुस अस रहे के कई बार चेतावनी भी दे चुकल रहलन । बाकिर ऊ काहे के मानो । कुल कहल-सुनल ओकरा खातिर केवनो माने ना रखत रहे । केवनो बात एह कान से सुनि के ओह कान से निकाल देबे में ऊ आपन बड़वारगी समुझत रहे । कहावत कहल जाले कि पाप क घड़ा जब नखसिख भरि जाला त एक न एक दिन फूटबे करेला । ओह दिन ओके सिखावे के बढ़िया मोका गांव क लोगन के मिल गइल रहे । सबकर मंसा इहे रहे कि सगरो गांव क आगे रमेसरा के नंगा कइके ओकर रहनि सुधरवावे क अब एसे बढ़िया मोका फेर कबो ना मिली ।
‘ठक-ठक-ठक….’ बिरजू सिकड़ी पकड़ि के कई बार दरवाजा क पल्ला पर पटकलस । बाकिर भीतर से केवनो आवाज ना आइल । जेवन सांय-फुस सुनाई पड़तो रहल उहो थम गइल ।
‘ठक-ठक-ठक…..’ बिरजू अबकी जोर-जोर से देर तक लगातार दरवाजा पर सिकड़ी पीटते रहि गइल तब जाके भीतर से रमेसरा क आवाज सुनाई पड़ल ।
“के ह ?”
“हम हईं बिरजू ।”
“एह रात के केवन काम पड़ गइल ह ?”
“एक बंडल बीड़ी आ सलाई चाहत बा ।”
“ना ह । ओरा गइल बा ।”
“अरे भाई! इखरल-बिखरल दूइयो-चारि गो मिल जाई त काम चलि जाई ।”
“बेरि-बेरि कहत बानी कि एको ना ह, तबो कपार खइले बाड़ ।”
“कवनो बात ना बा । बीड़ी नइखे त सुरुतिए दे द । चाचा ओही से काम चला लिहें ।”
“साफ-साफ सुन ल । अब एह रात में केवाड़ ना खुली । जेवन चीज चाही सबेरे आ के ले लिह ।”
बाकिर बिरजू क ज़िद क आगे रमेसरा क एक ना चलल । जब देखलस कि लाख बहाना बनवला क बादो ऊ ना मानी त हार-गुन के देर तक हीलाहवाली कइला के बाद ओइसे आंख मलत दरवाजा खोललस जइसे बहुत गहरी नींद से सो के उठल होखे । दरवाजा खुलते बिरजू क संगे जे-जे आइल रहे ऊं सब अंदर घुस के दुकान में टॉर्च बारि के तलाशी लेबे लागल । रमेसरा पसीना-पसीना होके धुआंसा चेहरा लेले डरत-सहमत दबल जुबान से पूछलस-
“दरोगा-सिपाही अस ई कइसन दुकान क तलाशी लेत बाड़ जा ?”
“तोरा संगे एह दुकान में एगो औरतो रहल ह न ?”
“औरत ? ई के कहत बा ?”
“केहू कहत ना बा । हमनी क ओह औरत क आवाज अपना काने से कुछ देर पहिले खुदे सुनली हं जा ।”
“अगर रहित त कहां चलि जाइत ? एह दुकान में निकले-पइठे वाला एगो एह दरवाजा के सिवा दोसर केवनो खिड़कियो त नइखे जेसे होके बाहर निकल जाइत ।”
“नाहीं, ऐमें औरत जरूर होखे के चाहीं ।”
“तोहन लोग नाहक सक पलले बाड़ जा । अइसन झूठ अछरंग केहू पर ना लगावे के चाही ।” ई बात जेवहीं पूरी भइल तेवहीं बिरजू बोल पड़ल,
“अरे, हऊ का ह ?”
टॉरच क रोसनी में बिरजू क संगे-संगे साथ क पांचो आदमी देखल कि उत्तर-पछिम क कोना में नीचे ऊपर बड़ा जोगाड़ क साथे कलाकारी क के कई गो कलेंडर लगावल रहे । उन्हन क आड़ में से एकदम नीचे औरत क पांव का अंगुरी दिखाई पड़त रहली स । सब केहू एक साथ बोल पड़ल,
“ई त औरत क गोड़ क अंगुरी हई स ।”
ई बात अबहीं पूरो ना भइल रहे कि कैलेंडर हीले लगलन स । बिरुजुआ झपटि के कलेंडरन के नोचि के फेंकि दिहलस । कलेंडरन के हटते आंचल में मुंह छिपवले एगो औरत दिखलाई पड़ल । डर आ लोकलाज क मारे ओकर तन-मन थर-थर कांपत रहे । बिरजू आंचर क छोर पकड़ि के ठिंठिरावत ले आके बहरा गली में झोंकि दिहलस । सोरगुल सुनि के चौधरी क घर क पिछुवारे जेवन लोग खड़ा रहलन ऊ लोग त आइए गइलन । ओकरा बाद टोल-पड़ोस फेरु गांव भर क बहुते लोग जुट गइलन । पहिले त पंचलत्ती बोलि के रमेसरा के सब केहू मारल । मार खा-खाके जब ऊ पसरि गइल तब सबकर धियान ओह औरत क ओर गइल । लोग टॉरच बारि के देखलन त पता चलल कि ऊ त रामनरायन उर्फ रामा-बो ह । ऊ रामा जे लगभग साल भर पहिले बनि रहल परधान जी क हवेली क तीसरा तल्ला पर से एक दिन गिर के अइसन घायल भइलन कि एक दिन जानो से हाथ धोवेके परल ।
भीड़ रामा-बो के ‘छिनार’, ‘हरजाई’ क अलावा न जाने का-का कहत चहुंतरफा गाली पर गाली देत जात रहे आ ऊ बेचारी आंसू क घूंट पी के सब कुछ मौन होके सुनत रहल । ओही बीच गांव क पूजमान दीनदयाल पंडित सबके डांट-दबेर के आ चुप करा के रामा-बो के घर जाए के कहलन । एकर केहू बिरोध करे क हिम्मत ना जुटा पवलस । दूसरी ओर भीड़ रमेसरा के मारत-पीटत जमीन पर थूकवावत-चटवावत रहे । पंडित जी सबके हटा के ओसे कहलन, “देख रमेसरा ! जब से तूं एह गांव में आइल हउए तबसे हमनी क देखत आ सुनत आ रहल हईं जा कि तोर चाल-ढाल ठीक नईखे । ओमें सुधार ले आवे खातिर कई बेर कई लोगन से चेतावनी दियवावल भी गइल बाकिर तूं ओके गंभीरता से अचिको ना लिहले । अब तक जेवन कइले तेवन कइले । अब तोर एही में भलाई बा कि एही राती ई गांव छोड़ि के चलि जो । आज क बाद जो कबो इहां दिखाई पड़ले त मारत-मारत तोर कचूमर निकाल के गड़हा खोनि के ओही में भठि दीहल जइबे । किस्सा कहल जाला कि ‘बकस बिलार मुर्गा बांड़े होके रहिहन ।’ पंडित जी क आदेस मिलते ऊ दर-दुकान क मोह-ममता छोड़ि के ओही राते भाग खड़ा भइल ।
ओने राम-बो भीड़ से छुटकारा पा के घर क ओर चलली त उनकर आत्मा उनके खुद धिक्कारत रहे । लज्जा क मारे इहे उनका मन में आवत रहे कि,‘कतो जाके डूबि-धंसि जाईं ।’ रास्ता में कुआं पड़ल । रामा-बो ओकरा जगत पर जाके अबहीं छलांग लगा के ओमें कुदले चाहत रहली तबले ओही घरी उनके अइसन बुझाइल कि दूनों लइका उनके ‘माई रे !’ कहि के पुकार रहल होखन स । जेहन में ई विचार अवते कुआं में कूद-मरे क विचार तजि दीहली आ कुआं क जगत पर से उतरि के सीधे घरे गइली । ऊहां जाके देखली कि ताखा पर क दीया क रोसनी तेल क कमी क चलते एतना मद्धिम हो चुकल रहे कि जनात रहे रोवत होखे । रोवे भी काहें ना ! जब घर क मालकिन क अतमे रोवत रहे त ओह घर क मोही-छोही दीया काहें ना रोवे । रामा-बो दीया क टिमटिमात रोसनी में लइकन क ओर निहरली । भूखे पेट रोवत-बिलखत दूनों आंख से गंगा-जमुना अस लोर ढरकि के सूख चुकल रहे । खाली निसान लउकत रहे । पीठ में सपटल पेट पर हाथ धइले दूनों खटिया क पाटी क सहारे भूइयें बइठल-बइठल सूति गइल रहलन स । अपना लइकन क अइसन दीनदशा देखि के रामा-बो क करेजा टूक-टूक होके आंसू बनि के बिखर गइल । कुहुकत करेज लिहले झिलिंगा होके कुआं बनि चुकल झिलिंगा पर गुदरी अइसन लेवा बिछा के बारी-बारी से दूनों के उठा के सुता दिहली आ अपने बगल वाली बंसखट पर निखहरे लेट गइली । तन-मन एतना उखड़ चुकल रहे कि ओह रात उनका आंखिन से नींद रूठ के सात समुंदर पार जा चुकल रहे । बितल दिनन क खठ-मीठ वाकया धुंधला चलचित्र नीयर यादन क परदा पर आ-आ के लउके लागल ।
'मायके में जब अबहीं छोट रहली त माई-बाबू क पुरहर दुलार-प्यार मिलत रहे । सखी-सहेलियन क संगे गोटी, बिछिया, लुका-छिपी, चोर-सिपाही आ पुतरी-पुतरा क बियाह अस खेल में केतना आनंद आवत रहे । ओही बीचे एक साल गांव में महामारी आइल । जेवना क चपेट में अइला से माई-बाबू सरग सिधार गइलन । ओह लोगन क अभाव में जवन घर-आंगन बेसुमार सुख मुहइया करावत रहे, अब उहे काटे-धावे लागल । भाई-भउजाई के अब ऊ भारी लागे लगली । जेवना क नतीजा ई भइल कि अगले साल हाथ पीला कइके अल्हरे उमिर में ऊ ससुरा भेज दिहल गइली जहां सास-ससुर ना रहलन । उहवों बिआह भइला क कुछे दिन बाद जेठ-जेठानी क अलगिया दिहला से जिनिगी में कुछ सूनापन त जरूर आ गइल रहे । बाकी ओह दौरान पति क एतना प्यार मिलल कि कुल्हि सूनापन मेटि के भरपूर खुसहाली में ढलि गइल । जेवन कोर-कसर रहि गइल रहे, ऊ गदेला-गदेलिन क किलकारी से छू मंतर हो गइल ।
घर परिवार क खुसहाली पर गरहन त तब लागल जब अचानक पतिदेव जी गंभीर बीमारी क सिकार हो गइलन । महीना भर तक झेलावे वाली बेमारी घर क माली हालत एकदम चरमरा दिहलस । दवा-बिरो जोगाड़ खातिर पास-पड़ोस क केवनो घर अइसन ना बचल रहे जहां से हथफेर ना मंगले होंखसु । ओह सेवा-सुसुरसा क ही नतीजा रहे कि ऊ भला-चंगा हो गइलन । बाकिर अबहीं कमजोरी दूर ना भइल रहे । ओकरा चलते बैद जी क सलाह रहे कि कम से कम एक पखवारा तक उनके पुरहर आराम करेके चाही । बाकिर घर का माली हालत उनका से देखल ना गइल । लाख मना कइला क बादो बिना खइले-पीयले ऊ परधान जी केहें मेहनत-मजूरी करे चलि गइलन ।
नीमन से इयाद बा कि ओह दिन उनका गइला क बाद ऊ कुआं पर पानी भरि के जइसहीं उठावल चहली ओइसहीं हाथ से गगरी छूटि के अइसन गिरल कि फुटि के खंड-खंड हो गइल । ओही घरी घर क पटनी पर न जाने कब क चढ़ल बिलार क रोवला क मनहूस आवाजो सुनाई पड़ल । अचानक बायां अंग फड़के लागल । एह सब असगुनन क एके साथे संकेत पा के मन-ही-मन ऊ बुरी तरह कांपे लगली ।
बेर ढरत रहे । ओही घरी एगो मचोलना पर कुछ लोग पतिदेव के छत-बिछत अवस्था में ले अइलन जा आ बतवलन जा कि तीसरा तल्ला से बोझ लिहलहीं ढमिला के जमीन पर आ गिरलन ह । इ सुनि के आ देखि के कुछ छन खातिर त सन्न रहि गइली । लागे जइसे कठवा मारि गइल होखे । समझे में ना आवे कि उनका इलाज खातिर का करसु । उनकर चेतना त तब वापस आइल जब कुछ लोग समझवलन । करेजा पोढ़ क के आंसू पोंछत दवा-दारू आ सेवा-सुसुरुसा करें में लग गइली । दवा-बिरो आ घरेलू खर्च क चलते एक-एक कइके गहना-गुरिया आ बर्तन गिरवी रखात चलि गइल । बाकिर पतिदेव क हालत दिन पर दिन सुधरला क जगह अउरी बिगड़ते चलि गइल । अंत में उहो दिन देखे के परल जहिया पतिदेव का प्रान-पंखेरू उड़ि के उनुका से हरमेसा खातिर दूर बहुत दूर चलि गइल । रो-धो के केहू तरे परायणे में काम-किरिया वितवली । उनके बिना आगे क जिनिगी एकदम धुआं-धुआं लउके लागल ।
हिम्मत क के संकोच के टाटी के धीरे-धीरे टारि के घर-बासन, मेहनत-मजूरी, कटिया-बिनिया क के केहू तेरे जिनिगी बितावे लगली । ओह दरम्यान उनके एहसास भइल कि भरल जवानी क बोझ लेके एह दुनिया -जहान में चलल केतना कठिन बा । काम देवे वालन आ संगे काम करे वालन क ललचाइल नजर आ झकझोर देबे वाली बोली-ठिठोली उनुका बरदास से बाहर रहे । बाकिर दूर क सोचि के सुनत-सहत दिन क एक-एक छन बितावे लगली । बाकिर साल-खांड़ बितत-बितत अचानक अइसन ठठपाल पड़ल कि कहीं काम मिले क कवनो ठेकाना ना रह गइल । एकरा चलते खान-खर्च क काम चलावल एकदम मुसकिल हो गइल । लाम-नियरा केवनो घर-परिवार अइसन ना छूटल रहे जहां से उधार भ हथफेर मिले क आस होखे । आपन त आपन भूख से तलपत लइकन के रोवत-बिलखत देखि के मन ही मन छपिटइला क सिवा ओके दूर करे के केवनो चारा भी त ना नजर आवत रहे ।
ढेर दिन कहां भइल । आजे क त बात ह । मन ही मन सकुचात अइन दुपहरिया में रमेसरा केहें गइली । ओकरा दोकान में एक ओर बइठि के गांहकन के छंट जाए क इंतजार करे लगली । जब कुल गांहक छंटि गइलन त आपन अरज-गरज सुनावत हथजोरी करत कहली,
“ए भइया ! आजकल कहीं मेहनत-मजूरी करेके ना मिलला से हाथ बड़ा सकेत बा । घर में एको दाना ना रहला क चलते कई दिन से उपासे बिता रहल बानीं जा । खाली पानी पी-पी के ।”
“तब हम का करीं ?”
“कुछ आटा-चावल उधार दे देत त बहुत किरिपा होइत ।”
“इहवां खैरात बंटत बा का कि जबे देख तबे मुंह बवले चलि आवेलू ।
अबहीं पहिलहीं क बकाया बा । हम त जानीं कि ओही के चुकावे आइल बाड़ू । अब हम उधार तबले ना देइब जबले पहिले क चुका ना देबू ।”
रमेसरा फूटही थरिया नीयर झनकि के कहलस ।
“हमार भइया न, अइसन मत कर । नीक दिन अइला पर तोहार पाई-पाई चुकता क देइब ।”
“कह दीहलीं न कि ना देइब ।”
“ना देब त हमार दूनों लइका तड़पि-तड़पि के मर जइहें ।”
“उन्हन के आ तोहके जियावे-खियावे क हमहीं ठेका लेले बानी का ?”
“ठेका नाहीं । हम बिपत्त क मारल छिछियात फिरत बानी । आज हमरो जना रहितन त ई दिन देखे के ना न परित ।”
“हं त, एक बात साफ-साफ सुन ल । अब जब तक केवनो चीज बन्हक ना रखबू तब तक हम उधार ना दे सकीलां ।”
“अब हमारा पास बचले का बा कि बंधक रखीं ।”
“तोहरा पास त ऊ चीज बा कि ओकरा बल पर कुछऊ हासिल क सकत बाड़ू ।” रमेसरा कुटिल मुसुकान बिखेरत कहलस ।
“ऊं कवन चीज ?”
“गदरल जवानी ।”
“मतलब ?”
“आज क रात हमरा तन-मन क पियास बुझा द । तब उधार का, एही तरे चार-छ किलो रासन दे देइब ।” रमेसरा उनका फाटल लुगरी क बीच से झांकत अंगिया पर नजर गड़ा के कहलस ।
एह घटिया सउदा के नामंजूर क के ऊ ओह घरी चुपचाप उठली आ घरे चलि अइली । उहां लइकन क उहे रोवत-बिलखत चेहरा देखि के उनके अपना पेट क भूख मेटि गइल । ढाढ़स बंधावत, अंचरा से लइकन क संगे-संगे अपनों आंसू पोंछत-पोंछत ऊ मोहठि चुकल रहली । बाकिर करसु त का करसु माई क ममता जो ठहरल । घरी-दू घरी रात जात-जात उनुका धीरज क बांध टूटि गइल । ऊ खुद के ना रोक पवली । उनुका अनुसार रात के जब सूता पर गइल त लइकन के घर में लरुवात छोड़ि के बाहर से दरवाजा क सिंकड़ी चढ़ा के चल पड़ली रमेसरा केहें । नगेसर क दुआर पर ओह समय गवनई खूब जमकल रहे । ओह वखत उनके एह बात क डर सतावत रहे कि उनके जात के केहू देख न ले । राम क नाम लेके जइसहीं आगे बढ़ली ओइसहीं सुरीला सुर में गवइया लोगन क मुंह से छेड़ल गइल गीत क ई बोल उनका कान से आके टकराइल कि,
‘गोरी आधी-आधी रतिया के कहां जालू हो ?
चढ़ली उमरिया के ग़दर जवानी,
मदमातल अंगिया क धारदार पानी,
लेके मोहनी मूरतिया तूं कहां जालू हो ?
गीत क बोल सुनि के अइसन बुझाइल कि जानबूझ के उनहीं के देख के ऊ गीत छेड़ल गइल होई । पांव थथमि के जहां क तहां ठहर गइल । पलट के गावे वाला लोगन क ओर कनखी नजर से निहरली । जब ई विसवास हो गइल कि ऊ गीत उनके देखि के ना छेड़ल गइल बा तब आगे बढ़ली । उनके का पता रहे कि मुअना बिरजू उनके जात देखि के पीछा क रहल बा । रमेसरा क दुआरी पर पहुंच के धीरे-धीरे केवाड़ी पर थपकी देबे लगली । भीतर से रमेसरा क आवाज आइल, “के ह ?”
“...” ऊं चुप रहली, कुछ ना बोलली ।
“हम पूछत हईं कि के ह ? का चाही ? कहते रमेसरा केवाड़ी खोललस । सामने उनके खड़ा देखि के अंदर खींच के केवड़ी बंद क दीहलस आ पूछलस,
“आखिर थक-हारि के अवहीं के परल ह न ?”
“मजबूरी जेवन न करावे ।”
“मतलब ?”
“इहे कि बाल-बच्चन क भूख मेटावे क मजबूरी ना रहित त आपन इज्जत क निलामी करे खातिर हम एह रात के इहां अइबे काहें के करतीं ।”
“मजबूरी खाली तोहरे ना हमरो बा । गवना क साले भर बाद मेहरारू मर गइल । रहित त तन-मन क भूख मेटावे बदे लोकलाज ताख पर रखि के तोहरा अस औरतन क मुंह मारे क जोखिम उठइबे काहें करतीं ।”
“त देखत का बाड़ ? ल आज तोहरा हाथे आपन इज्जत निलाम करे खातिर तइयार बानी ।” ई बात कहला क साथे जइसहीं अपना तन क चीर उतारल चहली ओइसहीं एकाएक धियान भंग हो गइल ।’ एसे कि दरवाजा क सिंकड़ी पीटे क आवाज सचहूं क आके उनका कान से बार-बार टकराये लागल । आंख खोलि के देखली तब उनके मालूम पड़ल कि सबेर हो गइल बा । अलसाइल कदमन से जाके दरवाजा खोलली त देखली कि दयादी क पद में लागे वाले देवर राम नरायन क माई आंटा, दाल, चावल आ आलू से भरल डलिया लेके खड़ा बाड़ी । उनके अचरज भरल नजर से देखि के हकलात जुबान से बोल पड़ली-
“अरे अइया ! आप ? आईं बइठीं ।” कहत भीतर ले आके खटिया पर आसन देके अपने भूइयां बइठि गइली ।
“बहू ! तोहरा पर रात में का बितल ह, ओके हमहूं नीके तरह सुन चुकल बानीं । ई बतावे के जरूरत नइखे कि गरीबी आ भूख क मार केतना असहनीय होला ।”
अइया क मुंह से ढाढ़स बंधावे वाला अइसन सहानुभूति भरल बचन सुनि के उनका मन के जइसहीं तसल्ली मिलल ओइसहीं ऊ आपा खोके अहक-अहक के रोवे लगली ।
“चुप रह बहू ! होनी के केहू टार ना सकेला ? एसे कि सब कुछ विधिना क हाथ में जो बा । ई सोच-विचार कइला क बाद ही ई कहावत कहल गइल ह कि सबहीं नचावत राम गोसाईं । कहे क मतलब ई बा कि अब तक जेवन भइल ओके दरकिनार क के नया सिरे से जिनिगी जिए क बारे में गंभीरता से विचार कर ।”
“नया सिरे से ?”
“हं ।”
“रउवां कहे क मकसद का बा, ओके हम समझलीं ना ।”
“बताइब । बाकिर अबहीं ना, बाद में । पहिले हई जेवन रासन-पताई ले आइल बानी ओके लइकन के बनाव-खियाव । एसे कि एह वखत ई सबसे जरूरी जे बा । बात-विचार त आगहूं-पीछे हो सकेला ।” डलिया उनका हाथ में थमावत कहली ।
अइया क हाथ से डलिया लेके ऊ चूल्हा धरवली आ दाल-चावल बइठा के चोखा खातिर अइला में आलू डाल दिहली । ओकरा बाद आंटा गूंथे बइठला क साथे बोलली,
“अइया ! अब बताईं नया सिरे से जिनिगी जिए क बारे में का कहत रहली हं ।”
“कहल ई चाहत रहली हं कि जवानी से बोझिल जिनिगी क नाव बिना पतवार क पार-घाट लगावल आसान ना ह । कदम-कदम पर तरह-तरह क भंवरजाल आ आन्ही-तूफान क खतरा बनल रहेला । अपना इन्द्रजाल में फंसा के नोचे-खाये वालन के बस मोका मिलेके चाही ।”
“कहत का बानी । ई कठकरेज समाज एतना निर्दयी बा कि संकट पड़ला पर साथ दिहला क जगह मजबूरी क लाभ उठावे से तनिको बाज ना आवेला । समझे में ना आवत बा कि एकरा से बचल कइसे जाव ।’’
“एकरा से बचे क एक ही रास्ता बा कि समय रहते हर औरत नीक-जबून जइसन भी हो सुहाग क पतवार थाम्ह ले ।”
“विधवा क जिनिगी जियला से अच्छा बा कि सुकून क जिनिगी जियला खातिर बियाह क के घर बसा लेबे के चाही । इहे न ?”
“हं । जे सतवंती बनल चाही, ओकर दसा छिछियात आ दूरदुरात ओह कुतियन अस हो जाई जइसन तोहार हो रहल बा ।”
“बात त सही कहत बानी । बाकी हमरा ई नइखे बुझात कि एह दसा में हमके का करे के चाही ।”
“देख बहू ! हम ललो-चपो ना बतियाइब । एसे कि एह मतलबी समाज से हमहूं अलग ना हईं । तोहरा साथे जेवन सहानुभूति जता रहल बानी ओकरा पीछे हमरो बड़हर सुवारथ बा ।”
“ऊं कवन ?”
“सुनले चाहत बाड़ू त ल सुनि ल ।
“सुनाईं ।”
“हमार सुआरथ एह बात क बा कि अन्न-धन से भरल-पूरल रहला क बादो हमरा घर में कवनो खुसहाली ना बा । एसे कि जेवन -जगह-जायदाद बा ओके केहू हवेखे वाला जे ना बा ।”
“ऊं त देखते बानी ।”
“अइसना में तोहके एतराज न होखे त हम इहे चाहब कि बितल बात भुला के हमरा एकलौता बेटा सामनरायन से बियाह क ल । जेसे कि हमरा घर-आंगन में जेवन अभाव बा ऊ दूर हो सके आ तोहरो जिनिगी के ठेकाना मिल सके ।”
अइया क मुंह से ई बात सुनते उनका दिल-दिमाग में सामनरायण क नखसिख मूरत तैरे लागल । एक पैर से विकलांग आ रूप-रंग से साधारण बाकी पढ़े-लिखे में अव्वल हंसमुख चेहरा, मिलनसार स्वभाव वाला सामनरायन उनका खातिर केवनो अपरिचित ना रहलन । दयादी में एगो उहे त रहलन कि मोका पड़ला पर गाहे-बगाहे कामे आवत रहलन । ओही क नतीजा रहे कि ऊ जेतना उनके मानेली कहीं ओसे अधिक ऊ उनके मानेलन। अबहीं ई सोचते रहली कि अइया क आवाज फिर उनका कान से आके टकराइल ।
“बोल तोहार का विचार बा ?”
“अइया ! रउवां से अधिक हमरा हित-अहित क बारे में के सोचे वाला बा ! रउवां हमके केवनो गलत सुझाव त देइब ना ।”
“त ई मान लीं कि ई रिस्ता तोहके मंजूर बा ?”
“जी ।”
“ई भइल न बात । हमके तोहरा से एही हामी भरे क उम्मीद रहल ह । त चलत हईं । आगे ओह बियाह के कइसे निपटावल जाय, ओपर विचार कइल जाव ।” एतना कहि के अइया चलि गइली ।
अगले दिन पंडित जी बोलावल गइलन । सुभ मुहूरत देखि के कथा करवला के बाद हंसी-खुसी से बियाह सम्पन्न भइल । ओह दिन से ऊ रामा-बो से बदल के सामाबो कहाये लगली । दिन पलटते जेवन सामनरायन बरिसन से बेरोजगारी क मार सहि-सहि के निरासा क अंधकार में घुटन भरल जिनिगी जिये खातिर मजबूर रहलन, ऊ पास क शहर में विकलांग कोटा क लाभ पा के एगो ऑफिस में बाबू क नौकरी पा गइलन । नतीजा ई भइल कि कल तक दाना-दाना खातिर जेवन ऊ मजबूर रहली, उहे अब रानी बनिके दूसरे क आस पुरावे लगली । गांव-जवार क जे भी समझदार रहे सब इहे कहे कि- ‘परमातमा जइसे सामा-बो क दिन फेरलन ओही तरे सबकर फेरसु ।”
डॉ. गजाधर शर्मा ‘गंगेश’
नंदगंज, गाजीपुर
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[ दीया बाती के समहुतांक ( जुलाई, 2025 ) के अंक में प्रकाशित रचना । ]
