दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )

बाबू जी के पगरी

कविता

श्वेता पाण्डेय 'खुशबू'

7/16/20251 min read

बाबू जी के पगरी

बाबू जी ! ई राउर पगरी

कांहें एतना भारी हो गइल ?

दबा-कुचा के एकरा नीचे

केतने बेटी मारल गइल |

नाव बढ़इहें बिटिया हमार

मान हमार बढ़इहें ई ।

पढ़ी-लिख के अफसर जे बनिहें,

घर-बार आ देश चलइहें ई ।

शान बढ़इहें हमार ई

पगरी के भी मान बढ़ी ।

आन के तोहरा सौं ले बापू

बिटिया तोहार बड़ भइल ।

दबा-कुचा के एकरा नीचे

केतने बेटी मारल गइल |

खूब खुशी से डोली में तू

दुलारी आपन बिदा कईल ।

संघे दे दिहलऽ पगरी

ओहसे ना बिसभोर कईल ।

घूमतारे जे छुटा सांड़ बन

उनकर पुख्ता जाँच बा ।

लेकिन चउकठ के भीतर बाबुल

का कहीं केतना आँच बा ?

बात, लात आ घात बाबूजी

ई सब कुछ ऊ सह जाली ।

जो कुछू करेके ऊ चाहें

पगरी के याद फिर आ जाला ।

ढ़ोवते रह गइली पगरी तोहार

इहवां रहली भा उहां गइली ।

दबा-कुचा के एकरा नीचे

केतने बेटी मारल गइली |

तोहरा घर के इज्जत के

ऊ बाजारू बतलावे लें ।

आस, पियास, विश्वास, सांस पर

आपन धौंस जमावेलें ।

चउकठ की बहरा बेटी तोहार

पढ़ल-लिखल, समझदार अव्वल ।

जे गोड़ धरे डेहरी के भीतर

गंवार, निक्कमा, जाहिल भइल ।

दबा-कुचा के एकरा नीचे

केतने बेटी मारल गइल |

काहें ना कहल बिटिया हमार

पगरी तोहसे तू पहिले बाड़ू ।

ई त ह ताकत तोहार

कमजोरी काहें मानताड़ू ?

जे हाथ उठाई कवनो दुशासन

ओहदिन चीर तोहार बन जाई ईऽ ।

जो आगे आई कवनो घाती

ओकरा के फन्दा फिर पहिनाइ ईऽ ।

बस एतने कही द बाबूजी

ई खाली पगरी ह बोझ नाहीं ।

मान, शान, सम्मान सही बा

लेकिन बेटियो मिलेले रोज नाहीं ।

बल देद बेटी के बनऽ सहारा

नवका बिहान ऊ ले आई ।

तोहार मान त बढ़बे करी

ऊ आपन सम्मान बचा पाई ।

श्वेता पाण्डेय 'खुशबू'

अधिवक्ता, कवयित्री

कानूनी सलाहकार

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