दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )

किछु निछुट्टा नवा साल प

कविता

डॉ एम डी सिंह

2/22/20261 min read

किछु निछुट्टा नवा साल प

नवका साल रहे निम्मन चिक्कन जिनगी बनल रहे खुशहाल ।

जिउ पउंड़त रहे गहिरे छीछिल अस दनदन टूटै सगरी जाल ।।

जवनै जिउ चाहे मनई पावै आगा मेढ़ रहे ना खाल ।

सरपट दउड़ लगावत रहे जिनगी पछुआइल रहे काल ।।

उहो पतीला तोहरे हऽ बाबू जेमें गलति आजु बा दाल ।

जिन पूछा हे मन केकर दिन, केकर महीना, केकर ह साल ।।

जरल बूतल उधिआइल बनिके धुआं - पताई पछिलका साल ।

कइल जतन जाव आवा सभे अस, बने नौका गुदरी क लाल ।।

निछुट्टा- स्वतंत्र

पतीला - बटुली, भगौना

(ई साल होखै सभकर चहकोर)

डॉ एम डी सिंह

गाज़ीपुर