दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )
नजर
ग़ज़ल
शालिनी श्रीवास्तव
3/15/20261 min read


नजर
केहू फेरलस नजर केहू नजरिया बदल गईल
बात पे बात बढ़ल अउरी बढ़ते चल गईल
जेकरा बूता प जिये मुअला के सुर सधलें रहीं
छोड़ि के संग हमार उहे जिनगी छल गईल
खेल किस्मत के रहे कि खिसियाईल रहे जिनगी
सपना देखला से पहिले अंखियां मसल गईल
दांत काटि रोटी रहलन कबो जे हित हमार
ओहि के देख हमार आज तरक्की खल गईल
चैन फेरले बा आंखि चार पईसा के पाछा
शहर में गउंवा के इयाद फेर से मचल गईल
बखत गुजरला में बखत कहां लागेला
देखते - देखत दिन... महीना...साल इहो बदल गईल
बाबू जी
ठेठाई के उमिर भर जांगर
अब, दुबराई गईलन बाबू जी
हमहन के सपना के बोझा ढोवत
झुकी गइल कंधा
देखते - देखत बुढ़ाई गईलन बाबू जी ।
चौखट प खड़ियाइल रहे, सांझ लेखा जिनगी
भीतर भरल बाटे ग्यान के चिनगी
किरिन डुबलो प दियना जराई गईलन बाबू जी
डेरात रहल जेसे, घर के हवा बतास
मनपसंद खाये से बेसी बा
उनके बतियावे के पियास
मुंहवा से अपना अकुताई गईले बाबू जी
मन के अंगनवा में, पसरल बा जून
बन्द बा, अचारे क भरुआ... छोला अ नून
रोगवा से केतने घेराई गईले बाबू जी
आंखी के बगइचा में, दुःख भरल पतझर के
सब दिन एके सोझा न होला
दिन फिरला देह जांगर के
पतई नियर पियराई गइले बाबू जी ।
शालिनी श्रीवास्तव
लखनऊ / बलिया
