दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )

मितवा

गीत

शिवजी पाण्डेय 'रसराज'

7/20/20251 min read

1.

मितवा

उभ चुभ मन कइसे, लिही साँस मितवा ।।

दुनिया दारी गरवाँ, फाँस मितवा ।।

नेह-नाता झूठ लागे, झूठे कुल-खूँट लागे ।

करिं केकरा पर अब, बिसवास मितवा ।।

सुखवा के साथी सभे, दुखवा में मुँह मोड़े

छनहीं छने करे उपहास मितवा ।।

अइसन बहुरूपिया कि, रूप बदले बार बार

होखहूँ न देला, आभास मितवा ।।

ठग हs ठगेला सबके, छोड़े नाहीं केहुए के

गली - गली एकरे, निवास मितवा ।।

कुछऊ ना सूझे मोरा, घर-अंगना दुअरा

लगे 'रसराज' सगरे, उदास मितवा ।।

2.

जमाना

खेती बारी बेचि- खोंचि के, जाके शहरे बसि गइलन ।

जबसे गइलन भईया हमरो, लवटि के घरवा ना अइलन ।।

ना तिकवेलें कबो भुलइलो, गउवाँ आपन बा की ना ।

चाचा-चाची भाई-भतीजा, माई -बाबू बा की ना ।

रिस्ता नाता सब छूटि गइले, करनी धरनी खा गइलन ।।

पढ़ल लिखल के मतलब का ह, गउवें छोड़ि के चलि जाईं

संगी-साथी नियरा-ओहटा, देखते ओके जलि जाईं

ढेर कमइला के कुंठा में, सब कुछ आपन गवाँ गइलन ।।

रोवे माई पोता -पोती, कइसे हमके चिन्हिहें

दादी कहि-कहि गोदिया आके, कवना घड़ी बइठिहें

कहे 'रसराज 'जमाना बदलल, रीति रिवाज़ भुला गइलन ।।

शिवजी पाण्डेय 'रसराज'

मैरीटार, बलिया