दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )
मीठवा
कहानी
डॉ सुशीला ओझा
12/11/20251 min read


मीठवा
सबेरे कुहासा से कुछु लउकते नइखे । सगरे धुआँ - धुआँ भइल बा ।ठहरे के चीज नइखे लउकत । हाड़ कँपाए वाला जाड़ बा । ओपर से पछुवा बेआर हहाता । इ जाड़, हाड़ में भाला खनिया छेद के एह पार से ओह पार हो जाता । हाथ - गोड़ में बिच्छी मारतिया । ऐहि में चोट लाग जाता त मन कछमछा जाता । कहीं सरन नइखे । गाँछ बिरिछ सब रोअता । आ ओकरा लोर से धरती माई के आँचरा भींज जाता । ओही भोरे गाय - गोरु के नांद पर बान्हे के बा । घूर फूंके के बा । तनी डोंसवा से ऊबार होई । अपनो देहिया गरमा जाई ।
बड़की फुलवारी में गेड़़ छिलाता । जाड़ होइहें चाहे जाड़ के बाप ! गेड़वा छीले त जाहीं के बा । एहघरी घास नईखे मिलत । गेड़वा से गइया दु चलावन ढेर खईहन सन । खईहन स तबे नु दूध होई।
रे.....हे...मी...ठ...वा ! उठ ना ! गेड़ के ना जइबे ? तोरा निसा लागल बा ? उठ ना त मुँह में से ललका पानी गिरावे लागेम । गंड़ासी निकाल । बहर जल्दी । खाए के भर छिपा खइब स आ गेड़ ना ले अइब सन ।
रे..हे...मा...ई...! लेधड़ी के पेठा दिहे । गेड़ के बोझा बड़ी भारी हो जाला । अकेले ना उठी । पतलो ले आवे के बा त सालकिल से पेठा दिहे । ओहि भोर में बिगना उठ जाता । हमहुँ चलेम..। रे ! ते कहाँ जइबे ? हम ऊँख ले आएम..। जो पुअरा में लुको, बड़ी जाड़ बा !
बिगना के माई, रमरतिया के लइका ना होत रहे । त ओह टोला के एगो बाभनिन बतवली कि लइका होइ त बहारन पर बिग दिह सन त उ लइका अखे - अमर हो जाई ! बिगना, मटरूआ के नाती ह । मटरूआ बो, सब दिना अपना बेटियन के एगो - दू गो लइका आपना लगे राखेले । नाती के नाम पर लोग कुछु - कुछु दे देला । आ चोराए - गरिआए के त घोंटिए में पिआवल जाला । रे ! भर छीपा खातरु सन..! धउर सन..गेड़ ले आवे .. बड़की फुलवारी में छिलाता । रोज भोरे - भोरे इहे काथा होखे । अगलो - बगल के गाँव के लोग के आंख एही गेड़ पर बा । आँख मिसत, झुंड में गडा़सी पीटत, डगरी में के गाछ बिरिछ पर गड़ासी चलावत, अपना नोहवा के रंगते - रंगते फुलवारी कावर जातरी सन । हंसी - ठिठोरी, दउरा - दउरी, बजना - बजनी से जड़वा डेरा जाला । आ गेड़ छिलत - छिलत जाड़वा भाग जाला !
गेड़ छिलाता, ओहिमें सान - मटकी चलता । किसुनवा , जोन्हिया से सट के गेड़ छिलता । ओहिमें बजना - बजनी । एगो दोसरे लीला होता ! गेड़ छिलत में ऊँख चोरावे के अलगे इलिम होला । जे में कि सांपो मरा जास आ लठिओ ना टूटे । एतना बाड़का पलिवार के परवसती खाली कमइले से ना नू होला ? जे मुँह चीरले बा उहे नू पेटो भरेला ! एकरा के चोरी ना कहल जाला, इ त जलम के अधार बा ।
ऊँख छिलत, बजना - बजनी करत काली माई आवता लोग ! ओकनी से केहु जीती ? गारी देवे में, चोरावे में, लबरियावे में ? सब गुन के आगर बाड़ी सन । मटरूआ बो, किरिन निहारतिया । अभी ले गेड़ ना आइल । ई कहवाँ रह गइली सन.."महतरिया" कुली ? "हमरा बापवा के मउगी" ? "भउजी लोगिन, हमरा भइयवा के मेहरारू.." ? काहंवा रह गइलु स रे ? आव सन, तोनी के मुँह से आज लालका पानी गिरावतानी । मीठवा के गेड़ अभी मुड़िए पर बा । मटरूआ बहु ओकर झोंटा खींच के छानी में बान्ह के आ दूनू हाथ थुनी में बान्ह के, गेड़ में के चोरावल ऊँखी से लागल मरमत करे । बेसवा सन ! तोनी के जवानी के हावा लागल बा ? ऊंखिए- ऊंखिए एतना मरलस । लोग बाग आ के छोड़इलस । बुझाए कि अब मीठवा ना बची !
मटरूआ बो के आठ गो बेटी बाड़ी सन । दुगो बेटी पर से बेटा भइल त लोग कहल कोठी उलटवा ले । बड़ा नीमन बेटा - बेटी के सारधा पुर गइल बा । मटरूआ बो, लागल गरियावे - "रे कवन हामार खरची चलावता रे..? पलिवार देख के सिहातरे सन.. । तेतना बनिहारी भागवान के देले होखब तेतना मिलबे नू करी । आठ गो बेटी बाड़ी सन त आठ गो बेटा जलमा के ए नगर के देखा देब । रे काहाँ बाड़ु स रे ? भर छिपा खालु सन आ हइ धुरूपवा बो के गरियावे में तोनी के जीभिया में कंसर हो गइल बा ? गरियाव स ना रे सौतिनिया ! सब गोड़ी मिल के धुरूप काकी के गारी से तोपे तोप क देली सन।
घास गढ़त में, लकड़ी काटत में, भईंस चरावत में, बिपती के बड़ा मजा आवेला । सब छवारिक सन से मटका मटकी होत रहेला । ओहि में आजुकाल के मोभाइल त अउरी नाया - नाया राहता देखावता । भईंस खोल के, बकरी खोल के, दोसरा के खेत में बेला के अपने मोभाइलवासल बाड़ी सन । चोकटा के सारी गहूँ भंईस आ बकरी मिलके चर गइले सन । चोकटा बो, रोवत कलपत मटरूआ बो के ओरहन देवे आइल ।
सब गोड़ा एकवट गइले सन । हम किरिया खातानी ! हामार माल खेत में ना गइल ह । उ त सरेह में चरत रहल । हम दुबर बानी ओहिसे हमरा के झूठे ओरहन दे तारे सन । सब गोड़ा एकाठा हो के चोकटा बो के मारे लगलेन सन । अकेले चोकटा बो, आ एकनी के महतारी बेटी मिलके नव गरह, ओकर हडी - गुडी बाराबर क देली सन ।
बेचारी चोकटा बो रोवतो रहे आ संघे - संघे कथो कहत रहे । कथवा के कहला में लोरवा सूख जात रहे ।
मटरूआ के बेटी चोरी आ सीनाजोरी में फस कालास बाडी़ सन ! कहीं से केरा के घवद काट के, कहीं आम - लीची तूर के एकछन में अलोपित क दिहन सन ! जेतना बगइचा वाला के घर में आम ना होई, ओकरा से बेसी एकनी के घर में जमकल रहेला ! सब अहुनाई - पहुनाई पेठावल जाला ।
केहु ओरहन दी त कहिहन स - " हे बउधी भगउती ! हामरा के झुठे अकलंक लगावतारे सन । एकनी के घर में भुखइले अइह आ अघइले जईह ।"
सरकार एतना मदद करतिया लेकिन पढे - लिखे से कौनो नाता नइखे । पढ़े में पइसो त लागता , आ इ रोजगार त रोज के बा । पढ़ के भमिरा होके का होई ? बाभन लोग कींहा कोक - सास्तर पढ़ के उपास पड़ता लोग । हमनी के गँवारे बानी सन तबो घर में सगरी चीज भरल बा ।
भोरहीं में, अभी अन्हारे रहेला तबे मटरूआ बो नादा पर भंईस बान्हेले । आ भंईसिया - गइया से कहेले - ऐ धीरा....! धीरा...! पहिले त इ बात हमरा बुझइबे ना करे, बाकिर अब बुझाला कि धी...रा..माने - धीरे । मलवा - गोरूआ के धीरा मने अहथिर रहे के कहेले । साएद भंईसिया - गोरूआ मटरूआ बो के बात सुनके अहथिर हो जाले सन । अपने घुरा तर बइठल रहेले आ हांक लगावत रहे ले - रे....ले...ध...ड़ी ! छांटी डाल । हरमेसा हंकड़ते रहेले । काली माई के रुप में धरती पर जलम लेले बिया । हरमेसा गरजत रही आ ओकरा से केहु पूछ दी - ए मीठवा के मतारी ! का हाल - चाल बा ? ओकर कंठे निमुन हो जाला । कोंहरे लागेले । मुंह से बोलिए ना निकलेला । गने - गने कही - "ए मी...ठ...वा... ! रे एक लोटा पानी दे"। पानी पी तब ओकरा कंठ में पारान आई । तब जा के बताई - "का कहीं ए काकी ! ओ टोला के एगो बाभनीन हामरा के डाइन कहि देले बाड़ी । अन ओर ताकले नइखे जात" । जइसे काकी उंहा से हटिहन तइसे लोटा - गिलास में चाह उझिलाए लागी । "रे.. मी...ठ...वा..! हामरा के खालिस दूध में चाह बनइहे । तोनी के सुअर के खोभार बाड़ू सन, आपन अलगे बनइह सन"।
"मीठवा" करिया बिया, ओहि से ओकर नाम करिया मीठा धराइल.."करिया मीठा बारे, पाई ना बिकाई घरे जाई"। करिया मीठा कहते कहते ओकर छोटहीं से दुलार के नाम मीठवा हो गइल । "लेधड़ी" पाँच बरिस ले चलबे ना कइलस त लेधड़ी नाम धरा गइल । "बिपतिया" बड़ा बिपत में भइल रहे.. मटरूआ बो के टी.बी हो गइल रहे । ऐहि से ओकर नाम बिपतिया रखाइल ।
ओहि तरे अन्हिया, तुफनिया, बिगना, फेंकनी, ढेलवा..जस गुन तस नाम ! ढेलवा बउनी रहे, अन्हिया आन्ही में, आ तुफनिया के बेर जेठ के बड़की आन्ही तुफान आइल रहे । असपताले जात बेरा पेड़े में रेस्का पर तुफनिया के जलम भइल ।
आठ गो बेटा गांव - नगर के देखावे खातिर मटरूआ बो " पुरइनिया के भगौती" के लगे केतना बेर नचले बिया, केतना बेर बकले बिया । माने नगर के आठ गो बेटा जलमा के ना देखा सकलस । भागवान ओकर मिनती ना सुनलन । गांव नगर के लोग ओकर आठ गो बेटा देखे खतिरा आजुवो ओतने पेंड़ा जोहता । भगवान के लगे केकर चलेला !
डॉ सुशीला ओझा
