दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )

मन के आस जनि टूटे पावे

कविता

डॉ जनार्दन चतुर्वेदी 'कश्यप'

12/14/20251 min read

मन के आस जनि टूटे पावे

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भांति - भांति के लोग इहां बा

भांति - भांति के भोग इहां बा

केहू बइठल काटे चानी

केहू के बा चुअत पलानी

जल के बीचे फंसे मछरिया

जहां बकुलवा ध्यान लगावे

मन के आस...................।

कहीं सिकारी हठ से बाटे

कहीं पुजारी मठ के चाटे

सिकारी घात में बइठेला

पुजारी घात से पइठेला

दूनों के बा एक डहरिया

फंसल सिकार न छूटे पावे

मन के आस...................।

कुछ के हाथे चहकत माला

कुछ के हाथे झलकत छाला

चेटे अमीरवा चहकेला

पेटे गरीबवा डहकेला

घूमे दूनों बीच बजरिया

मुंह के कवर न लूटे पावे

मन के आस .................।

केहू खातिर जग मेला बा

ई केहू बदे झमेला बा

केहू खूने के चूसत बा

केहू खूने बिनु मूअतबा

आवे कतनो कठिन बयरिया

चलत सांस जनि घूटे पावे

मन के आस................. ।

कतने पानी - पानी कइले

कतने बेपानी हो गइले

केहू चूसत खून आन के

केहू मांगत भीखि जान के

लपकत दूधारी तलवरिया

'कश्यप' खलिसे लाज बचावे

मन के आस...................।

डॉ जनार्दन चतुर्वेदी 'कश्यप'

बलिया (उ.प्र.)

9935108535

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