दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )
मकर संक्रांति
निबंध
देवकुमार सिंह
2/15/20261 min read


मकर संक्रांति
मकर संक्रांति, खिचड़ी के पर्व पूरा भारत में कवनो ना कवनो नाम से मनावल जाला । पंजाब, हरियाणा में लोहणी पर्व आ दक्षिणी भारत में पोंगल पर्व के रूप में ई पर्व मनावल जाला । भगवान सूर्य जब कर्क रेखा से मकर रेखा प संक्रमण करे ले त ओ भौगोलिक स्थिति के मकर संक्रांति कहल जाला । एह पर्व के वैदिक काल से ही बड़ा धूमधाम से मनावे के परम्परा हमनी के देश में बा ।
एह दिन बालक, बूढ़, नौजवान सभे नहाला, गंगा नदी या जवन नदी नजदीक होखे ओ में डुबकी मार मार के, देह मलमल के, कई महीना के मईल छोड़ावल जाला । नहाके अपना पितर लोग के जल से तिलांजलि दिहल जाला, दान, पुण्य कईल जाला आ घरे आके हवन, होम करा के पंडी जी, बाबाजी, गरीब, भूखा लोग के प्रेम से दही, चिवड़ा, गुड़, तिल के लड्डू, तिलवा खिआवल जाला आ चले भर उनका गमछा में बान्हि के भोजन दक्षिणा दीआला । एकरा बाद पूरा परिवार के संगे कुश के आसनी प बैठ के, पलथी मार के सिकम भर दही चिवड़ा के भोग लगावल जाला । गांव में एगो कहावत प्रसिद्ध बा,"दही चिवड़ा बारह कोस लुच्चुई अठारह कोस।" अब ऊ कहावत, अधिकांश लोग के पेट के मरीज बन गईला से भूला गईल बा । अब केहू पुड़ी नईखे खाईल चाहत । काज परोज जईसे बलिया आ आसपास के जिला में एगो आईटम लिट्टी चोखा के रहेला ओ ही तरह छपरा, दरभंगा, पूरा बिहार में दही चिवड़ा के एगो आईटम जरूर रहेला । ई सुपाच्य भी है, पौष्टिक भी आ तनी गरिष्ठ भी ह, खाईला प ढेर देर ले भूख रोकेला ।
नब्बे के दशक के पहिले, संक्रांति पर्व के दस दिन पहिलही से चाय के दुकान पर दूध के चाय ना मिली, नींबू के ही चाय मिली । पूछला पर दुकानदार कही कि,"संक्रांति पर्व के चलते अब दुकान पर दूधहा भाई लोग दूध नईखे देत, का करी जा, नींबू के चाय पीहीं ।"
ऊ जमाना बीत गईल, अब सिंथेटिक युग में कहीं दूध, दही के कमी नईखे । एक दिन शाम वाली पैसेंजर ट्रेन से बनारस जात रहनी, हमार चाय पीए के बाउर लुतुफ पकड़ा गईल रहे । प्लेटफॉर्म नंबर तीन प एगो चाय बेचत रहे, एक कप चाय पीअनी । आतना बढ़िया लागल कि सोचनी, ई जरूर भैंस के दूध सामने दुहवा के ले आवत होई । फेर एक कप पीए के मन कईल । दुकानदार एक तसल्ली पानी खौलवलस आ अपना बगली से एगो पुचपुचिया लेखा टयूब निकाल के दू बूंद डाल देलस आ चाय पत्ती, चीनी डाल के चाय तैयार कर देलस । ई देख के मन उल्टी लेखा करे लागल । ओ ही दिन से बाहर चाय पीअल छोड़ देनी ।
मकर संक्रांति से सूर्य भगवान उत्तरायण हो जाले । श्रीमद् भागवत गीता में भी लिखल बा कि एह समय में शरीर छोड़ला प जीवात्मा के पुनर्जन्म ना होला, ओकर मोक्ष हो जाला, ऊ परम ब्रह्म में मिल जाला, ओकर आवागमन से छुटकारा हो जाला । भीष्म पितामह के इच्छा मृत्यु के वरदान मिलल रहे । महाभारत युद्ध सूर्य के दक्षिणायन काल में भईल रहे । महाभारत युद्ध में बुरी तरह घायल भईला के बाद बाण शैय्या पर सुतल सुतल सूर्य के उत्तरायण होखेे के इंतजार करत रहले । महाभारत युद्ध समाप्त हो गईल त अकेले मुअल लाशन के बीच में, एकदम सुनसान, कुकुर, सियार, गिद्ध, चील लाश के छीनाझपटी करस, ओ भयंकर वातावरण में भीष्म पितामह मकर संक्रांति, खिचड़ी पर्व, सूर्य के उत्तरायण होखेे के इंतजार करत भगवान श्री कृष्ण के स्मरण करत रहले । मकर संक्रांति के दिन श्रीकृष्ण जी पांडव लोगन के संगे अईले तब ऊ आपन तन छोड़ले । एतना महत्व बा एह पर्व के । एह दिन से खरमास समाप्त हो जाला आ सब शुभ कार्य प्रारंभ हो जाला ।
मकर संक्रांति के दिन से लड़का, जवान आ बूढ़ लोग भी आकाश में पतंग उड़ावे लागेला । पतंगबाजी बहुत पहिले से एह दिन से जोर पकड़ ले ला । हमनी के त खरीफ के फसल कट गईला पर से पतंग, तिलंगी उड़ावल शुरू कर देत रहनी हा जा, मकई, ज्वार, बाजरा के खूंटी भी गड़ जाई । मुगल काल में एह पतंगबाजी के प्रचार प्रसार ढेर हो गईल, ई शाही शौक हो गईल ।
मकर संक्रांति के पर्व मनावे खातिर ब्याहुती बेटी, बहिन, फुआ के घर साड़ी, दामाद के धोती, तिलवा, चिवड़ा, गुड़, तिल के लड्डू, गजक गुड़ के बनल कांवर में भर भर के आदमी जन से पहुंचावे के परम्परा रहल हा । अब ई परम्परा धूमिल पड़ गईल बा ।
तीर्थराज प्रयाग में माघ मेला के आयोजन भी मकर संक्रांति पर्व के अवसर पर ही होला । छः बरस प अर्द्ध कुंभी आ बारह बरस प महाकुंभ लागेला । हरिद्वार, नासिक आ उज्जैन में भी अर्धकुंभी आ महाकुंभ लागेला । ई सब मेला मकर संक्रांति के महत्व ही दरसावत बा ।
मकर संक्रांति पर्व धूमधाम से मनाई सभे, दही चिवड़ा गुड़ मिला के बहुते प्रेम से खायीं सभे आ खिलायीं सभे । एह समय जाड़ा के पारा धीरे धीरे ऊपर उठे लागेला, मौसम बसंत ऋतु के बाग में टहलते टहलते आगे बढ़े लागेला, जाड़ा भागे लागेला । संक्रांति पर्व जब - जब आवेला हमरा पट्टीदारी में के एगो दादा जी के बात ईयाद आ जाला । ऊ साल में एके दिन संक्रांति पर्व पर ही नहात रहले ह । कुंआ, ( भोजपुरी में हमनी के इनार भी कहेनी जा ) के जगत यानी चबूतरा प बैठ के सरसों तेल गतर गतर मलिहें आ भुनभुनात रहीहें,"ई साली खिचड़िया आईले रहले, नहाही के पड़ेला ।"
मकर संक्रांति पर्व के दिन बाबा गोरखनाथ मंदिर में सबसे पहिले खिचड़ी चढ़ईहें । कई ट्रक चावल दाल के चढ़ावा मंदिर में मिलत रहल हा, अभियो ई परम्परा बा, बहुते भीड़ होला ।
मकर संक्रांति पर्व के एगो नाम खिचड़ी भी ह, दिन में दही चिवड़ा आ रात में खिचड़ी के भोग लगावे के परम्परा बा । तीन चार किसीम के दाल, चावल, अदरख, लहसुन, हरा मिर्च, आलू, टमाटर, मूली डाल के आ शुद्ध घी से छेवाँक के खिचड़ी एतना स्वादिष्ट बनेला कि लोग सिकम भर चढ़ा जाला ।
जय मकर संक्रांति, जय खिचड़ी, जय उत्तरायण पर्व ।
देवकुमार सिंह, पूर्व प्रधानाचार्य,
मां कात्यायनी कॉलोनी, परिखरा, तीखमपुर, बलिया, उत्तरप्रदेश
