दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )

माई के जीव

कहानी

रामसागर सिंह

12/7/20251 min read

माई के जीव.

साँझहि से आजु उ बहुत खुश रहली... हँ बहुत खुश ! फटाफट हबर - हबर रसोई घर के काम निबटा के, सबके खिया पिया के नौ बजे ले उ अपना खटिया पर ओठंग गइली ! बाकिर उनके आँखिन में नींद कहाँ ? उ बड़ी बेचैनी से घड़ी के बारे बजावे के इंतज़ार करते रहली ! माई के जीव.. बेरी - बेरी खटिया पर उठ के बइठस, बाकिर बारे ना बजल देख के फेरु खटिया पर ओठंग जास ! उ मने मन इहे सोचस... इ घड़ियो नतिया आजु बहुत धीरे चलत बा, ना जाने कब बारे बजी !

आखिर उहो घरी आ गइल ! उ झटपट मोबाइल उठा के अपना करेजा के टुकड़ा के नमर खोजे लगली ! बेचैनी अउर घबराहट एतना कि केहु हमरा से पहिले बबुआ के जनमदिन के बधाई ना दे देवे ! आज बबुआ पूरा पचीस साल के हो गइले !

मोबाइल में नमर डायल करते ओने घंटी बाजल... ट्रिन ट्रिन... ट्रिन ट्रिन... ट्रिन ट्रिन..! बाकिर केहु ना उठावल! उ फेरु से नमर डायल कइली.. ट्रिन ट्रिन... ट्रिन ट्रिन.. ट्रिन ट्रिन ! फेरु केहु ना उठावल !

लागत बा बबुआ सुतल बाटे, दिन भर काम क के हारल थाकल जोर से उंघाई आ गइल होई ! इहे सोच के फेरु एक बेर उहे नमर डायल कइली ! संगहि एह भरोसा के संगे कि मोबाइल के घंटी सुन के बाबू के उंघाई टूट जाई !

घंटी फेरु से बाजे लागल.. ट्रिन ट्रिन... ट्रिन ट्रिन... !

अबकी ओने तीसरा घंटी बाजे के पहिले रिंग बंद हो गइल ! असल में अबकी ओने से फोन काट दियाइल रहे ! लागत बा बबुआ अब जाग गइल बा... माई के जीव ! उ एक बार फेरु फोन लगइली.. रिंग बाजल.. रिंग बाजते ओने से फोन रिसीव भइल !

हेलौ...!

"हँ बाबू, हम तोहार माई बोलत बानी"

"हँ हँ... जानत बानी ! तुहुं का अधरतिया के निन खराब कइले बाड़ु ! तहरो कवनो बात बुझाला ना ?

एह बेरा फोन कर के दिमाग चटले बाड़ु !

" आरे बाबू..! सोचनी हं कि तोहरा जनमदिन के पहिले बधाई.... "

"आरे बधाई.. बधाई... बधाई..! आरे तुं बधाई ना दिहतु त इहां बधाई देवे वाला लोग नइखे ? एही बधाई देवे खातिर तु हमार रात के निन खराब कइले बाड़ु ! हँ एगो बात... भुलाइलो कबहूँ हमरा जरी राती बिराती फोन जनि करिह ! इ आपन बधाई अपने लगे राख.. आउर फोन कट..!

ओने से आवाज आइल बंद हो गइल ! ओने से फोन काट दिहल रहे ! उ फोन ना.... लागल कि कवनो तिलंगी आपने डोर से कट गइल होखे, कवनो चिरई आपन खोंता छोड़ के आसमान के ही आपन घर समझ लिहले होखे ! कवनो फतिंगा जरत दीया के आपन संसार समझ लिहले होखे !

उनकर गोड़ हाथ थहराये लागल ! जइसे कि देह में कहीं कवनो बुत्ता ना बाँचल होखे ! जइसे केहु पहाड़ पर से नीचे ढ़ाह देले होखे ! सांचहु उनके आजु केहू पहाड़ पर से ढ़ाह देले रहे !

रामसागर सिंह

सिवान, बिहार

8156077577