दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )
चारि गो कुंडलियां
कुंडलियां
अनिल ओझा नीरद
3/15/20261 min read


चारि गो कुंडलियां
१)
प्रेम से भक्ति-भाव जो,ईश्वर होहिं अधीन।
सुखी रहे जे रमल बा,कहे ई लोग प्रवीन।।
कहे ई लोग प्रवीन,रह गतिशील हमेशा।
सकल श्रृष्टि गतिमान,दे रहलि सतत सनेसा।।
नीरद के कहनाम,समरपन कर नेह से।
ईश्वर के त भूखि मिटेला, सदा प्रेम से।।
२)
मुरुछा में बा जी रहल, अधवा मनुज समाज।
आत्मा तक गिरवी रखल, लउकत मानव आज।।
लउकत मानव आज,भुला कुल्हि भाईचारा।
निज उन्नति के ठसक, बहावत उल्टा धारा।।
नीरद के कहनाम,हर जगह लगी का मुरुचा।
रही कारवां साथ,जो ना कस छूटी मुरुछा।।
३)
अनुभव बस भगवान के, कइ पावे ना लोग।
बोलि के ओन्हे बतावे के,ना बा कवनो योग।।
ना बा कवनो योग,ना ओकर बरनन होई।
जे संउसे ब्रह्माण्ड, शब्द में कइसे जोई।।
नीरद के कहनाम, कहां बा लीखल संभव।
बाहर कहंवा खोजऽ,भीतर कर तूं अनुभव।।
४)
पालन विधि पूर्वक करे, अगर प्रकृति के लोग।
त अभाव,दुख,कष्ट के,बने ना कबो कुयोग।।
बने ना कबो कुयोग,इ ह अइसन व्यवस्था।
जे लीही पहिचान,सुखी ऊ हरेक अवस्था।।
नीरद के कहनाम,एही से ऋतु संचालन।
मानेला हर जीव,आदिमी करे ना पालन।।
अनिल ओझा नीरद
नंदीबागान, कोलकाता
