दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )
केहू ना मानेला
लघुकथा
राजेश भोजपुरिया
12/28/20251 min read


लघुकथा
केहू ना मानेला
---------------------
एक बेर एगो शहर में बहुत बड़़हन व्यापारी रहत रहन, उनकर नाम रामप्रवेश रहे । भरल पुरल परिवार रहे जवना में उनकर पत्नी, बेटा - पतोह आ पोता लोग रहे । रामप्रवेश जी से परिवार के सभे लोग खूब नेह - स्नेह राखत रहे । परिवार बहुत हँसी - खुशी से रहत रहे । घर मे कवनो तरह के कमी ना रहे ।
एक बेर रामप्रवेश जी किहा उनकर घरेलू पुरोहित ( पण्डित ) के आगमन भइल । पण्डित जी के खूब सेवा - सत्कार भइल । सेवा - सत्कार से पण्डित जी बहुत खुश भइले । बइठका में पण्डित जी आ रामप्रवेश के बातचीत होत रहे । पण्डित जी कहले कि - राउर परिवार त रउरा के बहुत मानेला बुझाता, राउर सेवा सत्कार भी नीमन लागल । बाकिर हम कइसे मान ली कि राउर परिवार रउआ के मानेला ?
रामप्रवेश कहले कि - हमार परिवार हमरा के सचहुँ बहुत मानेला ।
पण्डित जी कहले कि हम कइसे मान लीं ?
राउर परिवार रउआ के मानेला की ना ई पता करे खातिर एगो नाटक करे के परी ।
रउआ मरे के नाटक करब बाकिर हम देख लेब ।
दोसरा दिना भोरही रामप्रवेश जी पानी पियला के बहाने उठले आ झूठो के जमीन पर गिर गइले आ मरे के नाटक कइले । पूरा परिवार ई सब देख के रोये - बिलखे लागल । तब तक ले पण्डित जी पहुँच गइले आ कहे लगले कि ई अनहोनी कइसे हो गइल ? पण्डित जी के त मालूम रहे कि ई नाटक होता । पण्डित जी रामप्रवेश के परिवार से कहले कि रामप्रवेश जी के शरीर मे फेर से जान आ जाई । हमरा भीरी एगो जड़ी - बूटी बा, परिवार के जे लोग खाई उ मर जाई आ रामप्रवेश जी जिंदा हो जईहे, उनका शरीर में जान आ जाई । पण्डित जी एगो जड़ी निकाल के उनका मेहरारू भीरी गइले कि रउआ खा लिही । मेहरारू कहली कि हम ना खाइब, हमार जान प्यारा बा । फेर पण्डित जी उनका लइका भीरी गइले की तू खाल ! लइकवा भी खाये से इनकार कर देलस । फेर उनकर पतोह के कहल गइल कि तू खाल ! उहो तइयार ना भइली । तब पण्डित जी उनकर पोता भीरी गइले आ कहले कि तू जड़ी खाल तब बाबा के जान बाँच जाई । रामप्रवेश के पोता कहलस कि - ए पण्डित जी रउआ खालीं, रउरा आगे पीछे त केहू नइखे.. !
एतना कइला के बाद रामप्रवेश से पण्डित जी कहले कि अब नाटक छोड़ी आ उठ के खड़ा हो जाई । रउआ देख लेनी नू, रउआ के केहू ना मानेला परिवार में । सभे केहू के राउर पइसे से प्यार बा । जब रउआ खातिर जान देवे के बात आइल त घर के केहू तइयार ना भइल एह नाटक से साफ पता लाग गइल कि रउआ खातिर केहू आपन त्याग नइखे कर सकत । रउआ कहत रही कि हमार परिवार हमरा के बहुत मानेला ।
राजेश भोजपुरिया
