दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )

कहवां गइल ऊ दिन

याद

अशोक वर्मा “हमदर्द”

3/15/20261 min read

कहवां गइल ऊ दिन

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ऊ ठंडा के दिन ना जाने कहाँ गईल,

जब धूप खुदे हमसे बतियावत रहे ।

ईया के बोरसी में आलू पाकत रहे,

धुँआ में लिपटाइल बचपन

खिलखिला के हँसत रहे ।

आ हमनी के गाति बाँधी के

घुमत रहनी जा ।

उखी के कड़ाह लगे

बांस के सुपली लेके खड़ा रहल,

आजो याद बा

जब मुटन काका

तनिका गुड़ देके

फुसला देत रहलन ।

ऊ गुड़ के मीठास में

हमार पसीना

आजो घुलल बुझाला ।

हाथ जरत रहे,

बाकी मन कबहूँ ना जरल,

काहे कि ओह दिनन में

मेहनत भी

खेल जइसन लागे ।

रहरी के खेत में

फूटल रहर बिनल

आजो याद आवेला,

एक - एक दाना

जइसे सपना सहेजत रहल ।

ओह पईसा के वज़न

आजो हथेली में महसूस होला,

कम रहे ऊ पईसा,

बाकिर सम्मान से

बहुत भारी रहे ।

अब ठंड त आ जाला,

मगर ऊ अपनापन ना आवे ।

हीटर बा, कंबल बा,

बाकिर इया के बोरसी के

ऊ आँच कहाँ ?

जब दलानी में पूअरा बिछत रहे,

पूरा टोला के लइका

लेवा - लेके

एके जगह जुटत रहले ।

जहिया लिट्टी बने,

ऊ दिन लिट्टी के

चोरउवल भी उत्सव रहे

कबो कोठिला में,

त कबो छप्पर पर,

त कबो छोडी में ।

ऊ सब आजो

मन के कोना में

जिंदा बा।

समय बहुत कुछ दे दिहलस,

बाकिर बहुत कुछ छीन भी लिहलस ।

आज सब कुछ पास बा,

बाकिर कुछ कमी लागेला ।

काहे कि ऊ ठंडा के दिन

सिरिफ मौसम ना रहे,

ऊ त जिनगी के

सबसे गरम एहसास रहे ।

बबलू अऊर शशिनाथ के साथ

जब बरसीम घास काट के

लियावत रहनी,

ना कवनो झिझक रहे,

ना कवनो दिखावा

बस एके चाह रहे

कि हमनी के सदा

एके साथ रही जा ।

आज हिंदू मुसलमान के

बात होता, बाकिर

हम अपना असलम के

कइसे भुला जाई,

जे एक दूसरा खातीर मरत रहे ।

बाकिर रोजी - रोटी के चक्कर में

सब अलग - अलग हो गइनी जा ।

विनायक चाचा के

एक - एक बात

आजो दिल में

वैसे के वैसे जिंदा बा…

बाकीर ना जाने उ समय

कब आई जब हमनी के

एक साथ बईठ के

पुरान बात के याद कर के

ठहाका लगाईम जा ।

अशोक वर्मा “हमदर्द”

चापदानी, कोलकाता