दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )
सेहुँड़ आ कदंब
कहानी
विष्णुदेव तिवारी
2/15/20261 min read


सेहुँड़ आ कदंब
ऊ हमरा बहुते नीक लागत रहली ।
एक दिन सब हिचक आ डर टार के हम उनुका सामने खाड़ हो गइलीं । पहिले चारू ओर तिकइ लेले रहीं । केहू नगीच - पास ना रहे । ऊ ऊपर खाड़ रहली आ हम एकदम से नीचे – अंतिम सीढ़ी से एक सीढ़ी ऊपर ।
– तहार नाँव कालिंदी ह नूंँ ?... हम जानत बानीं ।
ऊ हमरा के आँख गँड़ोर के देखली । हमार हियाव काँप गइल । हमरा लागल उहो तनिकी - सा काँप गइल रहली तबो निठुरी मुँहे कहली, ‘तोहरा से मतलब ? हम कलिंदिये हईं… त का भइल ?’
– हम ई कहल चाहत रहुईं कि…
– कहीं…ऽ…
– तूँ बहुते सुन्नर बाड़ू !
– अच्छा ! ऐसे का ?
हम कुछ आगे कहितीं तले केमेस्ट्री वाला प्रोफेसर साहेब ओनिये आवत लउकुवन । ‘अब ई का करे एने अइले हा ?’ हमनी के दूनों आदमी उनका के एके साथ देखुईं जा । हमार मन पितपिता के रह गइल ।
– अच्छा…!’ ऊ आँख गड़ोरले कहली – ‘एह दुनिया में बहुत चीज सुंदर बा । का करब ? कालेज में पढ़े आइल बानीं, पढ़ीं । आज थैंक्यू बा । आगे से हमार राह रोके आ हमार तारीफ करे के कोशिश मत करबि । बुझलीं ?
हमार बोलती बन आ ऊ फुरगुद्दी अस चहकत एने - ओने– कंपाउंड के बहरी जा !
निश्च्छल मन के सुतंत्र अरमानन के का कबो अँकवारी में बान्हल जा सकल बा ?
प्रो० पी चंद्र जब एकदम नगीचा आ गइले त हमरा होश भइल । हम अभिवादन कइलीं । ऊ आशीर्वाद दिहले । हम अपने जगहा खाड़ रहीं आ ऊ सीढ़ी चढ़े लगले । अबे कुछे सीढ़ी चढ़ल रहले कि रुक गइले आ पीछे घूम के पुछले, ‘पुस्तक मेला घूमे ना गइलऽ हा का, अभि ?’
– ना, सर ।
– का विचार बा ?
– मन डेराता, गुरुदेव !
– काहें ?-- प्रोफेसर साहेब हँस दिहले ।
– पटना में डेंगू वाला मच्छर… !
– ओ !’-- प्रोफेसर साहेब मुस्कुरइले ।
हमरा ओह मुस्कुराहट के भाव ना जनाइल, जइसे ओठ - कपाट खोले में दुख बरत होखे, ‘एहिजो डेंगू वाला कम नइखन स जी ।’ हम चुपे रहीं । लइका - लइकी सीढ़ी से आवत - जात रहे लोग । ‘सब ठीक बा, बाकिर डर ठीक नइखे ।’-- कहत प्रोफेसर साहेब आगे बढ़ गइले ।
हमार मन दोचित होखल आवत रहे । बुझाते ना रहे कि का करीं आ केने जाईं ! कालिंदी हमरा के नीक से जानऽतारी आ अइसन बतकही ?
कालेज के उतरवारा गेट से सीधे लगभग २०० मीटर आगे बढ़त गइला पर एगो ढलान अस मिलेला । ओहिजे दहिने ओर, जहाँ से एगो राह शहर का ओर जाले, एगो चखान रख के शिवलिंग अस बना दिहल गइल बा । बगल में कुछ अनचलुआ पइसा, ऊपर सेनुर के टीका, सेकरा ऊपर कुछ जंगली फूल आ गूर में सउनाइल अछत । कबो - कबो ओह पर कांड करे वाला खजुअहवा कुक्कुरो लउक जाला ।
फस्ट इयर के एगो लीजर घंटी में एक दिन घूमत - घामत ओनिये चल गइल रहीं त बेंजू मिलल रहे । कथई रंग के जींस आ गरदन में सरकवाँसी लगवले पतरका मफलर । ऊ पढ़ेवाला लइका रहे ना, कुछ रंगदारो रहे आ परिवार से धनियों बुझाइ । बाद में, जब कालेज में पुरान - चिरान हो गइल आदमी त जानल कि ऊ सेकेंड इयर के स्टूडेंट ह । लइकिन से पीछे वाला बेंच पर बइठ जाइ आ उहन लोग के उदबास लगावे । टीचरो लोग ओकरा से उबिया गइल रहे तबो डरने कुछ कहे के हियाव ना रहे । एक दिन अँगरेजी वाला सर कुछ समुझावल चहले त तर्जनी देखावत कहलस – चुपचाप पढ़ावऽ आ रस्ता नापऽ । ढेर स्मार्ट बनबऽ त कपारो रँगत देर ना लागी ।’
फेर केकर मूँड़ी दूगो रहे जे आगे कुछ बोले !
गंगा जइसे पयकड़ लागल गोड़े गँवे - गँवे चलत रहली । फरवरी के ठंड में उनका हँफनी छूट - छूट जात रहे । मरघट के राख, शहर के अइलत आ दूर देश से छाती पर बइठल फैक्टिरियन के मवाद से ऊ बेमरिता हो गइल रही तबो उनका चलत जाये के रहे । ई नियति रहे कि समुंदर से कइल गइल उनुकर करार निभावे के बात – कहल नइखे जा सकत । कालेज घाट पर फजिरे - साँझ लोग नहात होई । दूपहर में त कमे आवक - जावक रहत रहे । दू गो नन्हीं - नन्हीं लइका, जवन अपना माई आ बड़ बहिन सँगे आइल रहऽ स, करिया - करिया ओठ कइले काँपत रहले स । माई आ बहिनियो उहनी के बेर - बेर बरजऽ स कि ऊ पानी में छपाका नत मारऽ स बाकिर बबुअवा नटरपन नाध दऽ स । थोरिके देर बाद माई दूगो तसला में गोतल कपड़ा सीढ़ी पर पटक के फींचे लागल रहे आ बहिनया दाँत किटकिटावत भाइयन के सूखल कपड़ा पेन्हावे लागल रहे ।
हम ओहिजा से हट गइलीं । माई के ध्यान आइल । आज ओकर तबीयत ढेरे खराब बुझात रहुए । पिताजी से पुछले रहुईं कि कालेजे जाईं कि ना ? ऊ कुछ बोलले ना । मूड़ी गड़ले - गड़ले थाहि - थाहि के कहले रहले – जा बाकिर हाल्दिये आ जइहऽ । कुछ कहल नइखे जा सकत कि कब उलटन हो जाई !’-- पिताजी जब ढेर दरद में बात करेले त अइसहीं करेले – एकदम नऽइ के जेसे उनका ओठ के काँपल आ आँख के सरवल केहू दोसर मत देखे । हमहूँ आँख बचवले - बचवले इहे कहलीं – बस गइलीं आ अइलीं ।’ का कहितीं कि एगो लइकी से बतियावे जात बानीं ?
पिताजी के बात सुन के अपना करनी प घिन बरल रहे । लागल जइसे दरे प थहराइ के बइठ जाइबि । आँखिन के आगे लुत्ती उड़े लागल रही स आ हमरा रोआइ बर गइल । मरुअइले कालेज का ओर भागल रहीं । ‘कहीं माई के कुछ हो जाई त का होई ?’-- अपना बदमाशी प बेर - बेर खीस बरे । बेर - बेर माई के सब बतिया मन परे । तबो कालेजे चलिये गइलीं । कई दिन से ओने झाँकियो पारे ना गइल रहीं । सोचलीं कुछ मन बदल जाई ।
माई के बोल - चाल एक हप्ता से बन रहे । खाइल - पीयल पनरहियन से । पत दू दिन प देंह छेदाइ आ ग्लूकोज चढ़ावल जाई ।
ओकरा बेड सोर हो गइल रहे ।
तिसरका दिने अमरित रस आकाश सोख लेलस । हम भकुअइला अस कबो आँख मलत पिताजी के देखीं त कबो भुइँया सुतावल माई के । गया बो चाची जब ओकर गोड़ रंग के ठाड़ भइली त हम देखलीं – माई के गोड़ के रंग जतना टहकार रहे ओतने पिताजी के ढेंढ़र के रंग– एकदम टेस लाल ।
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माई के किरिया बितला के बाद जब कालेज गइलीं त बहुत कुछ, जवन पहिले बहुते नीक लागत रहे, बहुते जबून लागे लागल रहे । गंगा के कछार पर लहर अबहियों ओही तरह ढाही मारत रहऽ स । ओही तरह आदित के जोत, दहत जात अधजरल, बे - परद लाश के छोपत, मुँह लुकवावत टकसत जात रहे । ओही तरह प्लास्टिक के चिमुकी के बीच से उजबुजाइल मछरी सुबहित साँस लेबे खातिर कबो हवा में, कबो पानी में भटकल चलऽ स ।
माई मन परे त हम्हूँ उबिया जाईं आ चुपचाप क्लास छोड़ के घाट देने चल दीं । घाट के सीढ़ियन प अकेले बइठे के मन करे ।
ओह दिन घाट ढेर शांत रहे । कम्मो रानी गंँवे - गँवे आवत लउकुई । पहिले त हम कुछ जनबे ना करुईं । ऊ त सुरुज भगवान कपार के पीछे रहले एह से उनकर परछाहीं एकदम हमरा आगे पानी में बनल त हम चिहुँक गइलीं आ अकबकाइले पाछा तिकवलीं त उनुकर दर्शन भइल । हमरा लागल ऊ उदास बाड़ी । बाकिर अकेले ?
– हम रोज तोहरा के देखत बानीं । कबो - कबो क्लास के बीचहूँ क्लास से निकल जा तारऽ । ओने हप्तन गायबे रहलऽ हा ।’-- ऊ कहली । उनकर आँख झुकल रहे आ ऊ दहिना हाथ के मामा अँगुरी ओठ के नीचे रख के कुछ सोचे अस ककुलावत रहली । हम कुछ बोललीं ना, खाली आंँख उठा के उनका ओर देखलीं । ऊ फेर कहली – हमार मम्मी तोहरा मम्मी संगे पढ़लि ह । दूनों जानी एके संगे मैट्रिक पास कइल लोग । फेर हमरा मम्मी के बियाह हो गइल । तोहार मम्मी बीए तक पढ़ली आ…’ऊ कुछ आउरियो कहिती बाकिर अपना देने आवत लइकियन के जरोह देख के चुपा गइल रही । हम उहनी में से कुछ लइकिन के जानत रहीं, कुछ के ना जानत रहीं । उहनी में से एगो आवते उनका के झपिला के कहलस – एहिजा तिरवाहीं बइठल तीर चलावत बाड़ू आ हमनी के सउँसे चरित्तरबन चउगठत गोड़ मुरुका लिहलीं जा ! एकर डाँड़ के दी, बोल ?’
ऊ लइकी कालिंदी से अइसे बोलत रहे जइसे हम ओहिजा रहबे ना कइलीं । फेर सब मिल के उनका के चांँटो - माटो ध लिहली स कि ऊ उजबुजा गइली आ ओह लइकी के जोर से चिउँटी काटत गँव से कहली – ना चुप रहबू ? देखत नइखू कि के बा ! तबे से अलला रहल बाड़ू !’
ना त ओह लइकी प नाहीं कवनों अउर पर एह बात के असर परल । असरे का परे के रहे जब सब सोझहीं होत रहे ! एगो लइकी हमरा ओर देख के फेर उनका ओर देख के आ फेर अँखिये से सिवानी बान्हत उनका से पुछलस – हँ जी, प्रेम दिवानी जी, अब बताईं – ममिला कुछ आगे बढ़ल ? अबे कवन चैप्टर खुलल रहुए ?’
फेर सब कोलगेट के प्रचार करत हँस परली स । हम सकदम में परल रहीं । एक मन करे कि गँव से टसक जाईं । दोसर मन करे कि चुपचाप बइठल रहीं । इहनिये लोग टसके त टसकीं । हमरा जान में जान तब आइल जब कम्मो, सबके संगे जाये के तइयारी में, हमरा सामने एगो संगी अस आके खाड़ हो गइली । तनिकी झुक के तनिक हड़बड़िये में कहली – मम्मी सब कहत रहुई कि कइसे बियाह भइल रउआ मम्मी के… फेर तबीयत खराब भइल… फेर पढ़ाई छुटल आ छुटल त छुटले रह गइल आ अब त… संसारे छुट गइल ।’ उनका मुँह प उदासी छाँह अस पसर गइल रहे । हम अबे आहे - जाह में परल रहीं तले ऊ जात - जात फेर मुड़ के कहत गइली – हम जात बानीं बाकिर मन तोहरे किहाँ रह जात बा । मम्मी तोहरा के बोलवले बिया । कहियो ले चलब ।’
कम्मो के मम्मी हमरा माई से सुंदर त ना रहली बाकिर चतुर लगली । हमार माई बहुत कुछ सबसे ना कहे । कुछ त केहू से ना कहत रहे । कम्मो के मम्मी त जइसे सबसे सब कुछ कहे खातिर तइयार रहला अस जनासु । हम उनका किहाँ रामनवमी के छुट्टी में गइल रहीं । मंदिर पर के माइक नया - नया खोजल गइल शब्दन के लटगेना से भगत लोगन के मन खुश करे में जीवे - जँगरे लागल रहे । पुजारी जी झूम - झूम के भजन - कीर्तन करत रहले । उनकर हथजोरी भगवान से ना, भगवान के बनावे के दावा करेवाली सत्ता से रहे, जेकरा हाथ में लोक आ तंत्र दूनों रहेला बाकिर ऊ सबके लोक ना माने । तंत्र ओकर दास होला । ओकरा पाले अइसन ताकत रहेला कि ऊ इतिहास के अपना मुट्ठी में बान्ह के ओकर खलरा ओदार कर सके । ऊ बड़ा ध्यानी होला बाकिर ओकर ध्यान देश खातिर जीये - मरे वाला जमात पर ना, अपना के सिंहासन पर बइठावे वाला मत के बिसात पर होला ।
– खुश रहऽ, बबुआ ।’-- हमरा गोड़ लगला के जबाब में कम्मो के मम्मी कहले रही । हम तनी बेसिए सावधान रहीं । माई के कहलका हमरा नीक से याद रहे – ‘जब कवनो मेहरारू, अपना लइका के बरोबर उमिर वाला आदमी से, आछो - आछो करे लागे त ओहिजा एक छन ना ठहरे के चाहीं ।’ एही बीचे कम्मो के पापा आ गइल रहले आ आवते गोड़ - हाथ धोके जे घर में लुकइले त हमरा उहाँ से लवटे तक बहरिअइले ना । एने हम हालदेने लवटे के फेरा में रहीं आ ओने कम्मो के मम्मी हमार क्लास लेबे लागल रही ।
उनकर पहिला सवाल रहे – ‘आवत काहें ना रहनीं हँ, ए बबुआ जी, जब जानते रहनीं हाँ कि हम राउर मउसी लागब ?’
हम चुप रहलीं । एह प्रश्न के जबाब देबे के कवनो मतलब ना रहे । मउसी होखला भर से कहीं आइल - गइल संभव हो जाला का ? आ उहो कइसन मउसी ? हमार माई के गाँव आ उनकर गाँव एके जगहा ह । त का भइल ?
हमरा कम्मो से मतलब रहे । उहो एह से कि ऊ हमरा नीक लागसु । सुघर मुँह पर निश्च्छल भोलापन जइसे गेना के फूल प चाननी उगल होखे । बाकिर, हमरा अब अनकसावन बरत रहे । हमरा जनउए जइसे ओह घर के सब लोग अइसन लीला करत होखे जेमे खऽलो आदमी भल के सोभाव ओढ़ लेला । हम घरे आवे खातिर कसमसात रहलीं ।
एही बीचे चाह आइल । कम्मो ले आइल रही । जब चाह के कप उनका हाथ से हमरा हाथ में आइल त लागल उनकरा मन के एगो बँवर हमरा मन के बान्ह लेले होखे । हमार मन एगो सँकलप लेत - लेत रुक गइल – ई हाथ हम्हीं थाम्हब । तले ओठघाँवल केवाड़ी ठेलत सनाक् से एगो आदमी एकदम हमरा सामने आके खाड़ हो गइल । दनाक् से कम्मो के मम्मी से पुछलस – अइले हा ?
कम्मो के मम्मी पहिले हमरा देने फेर ओह आदमी का ओर देखत कहली – अबे ना।
– एकदम आइल होइहें । हम उनका के घरे आवत देखुईं ।
– नइखीं आइल जी । केनियो बजार में रुक गइल होइब । हम झूठ बोलबि ?
– रउआ कुछुओ कर सकत बानीं ।’-- ओह आदमी के मुँह पर व्यंग के एगो पातर मुसुकी सट के, फेर उखड़ के, हवा में उधिया गइल – ‘मऽडरो ! हम जानत नइखीं का ?’
कम्मो के गरदन झुक गइल रहे । हमरा दुख बरल । हमरा ई ना बुझात रहे कि ई आदमी एह तरे काहें बोलत बा ? आ ई खोजत केकरा के बा ? आ कम्मो के मम्मी ई काहें कहली हा कि ऊ अबे बजरिये में होइहें ?
– हम आज बिना भेंट कइले टकसब ना । तीन चिचिरी खींच के कहत बानीं ।’ – ऊ आदमी कानी अँगुरी से डांँड़ पारत अस कहलस ।
तले कम्मो के मम्मी अपना के संभार चुकल रही – ‘तऽ ठीक बा बहरी पलानी में बइठीं आ दुआर अगोरीं ।’
– ऊ त हमरो बुझाता कि दुआर अगोरीं कि आँगन ! ओही घरी ना बुझाइल रहे जब रउआ के समान दिहुईं ।
– त का हो गइल ? समान के बदले जान ना नूँ लेब ?
– जान ना पइसा लेब ।
– ठीक बा । जब होई तब दिआई । करज नइखे नूँ खइले
आदमी ? उधार - पाइँच के ना लेला - देला जी !
– ठीके बा ! दू महीना के करारे दू साल हो गइल नूँ उधार - पाइँच !
हम गँव से कम्मो के मम्मी के गोड़ छुअलीं आ घर खातिर सरपटिया नाध देलीं । गुलाबी जाड़ लागत रहे । पिताजी टोपी पहिन के कतहूँ जाये के कहत रहले । एहिजा बिना टोपिये पहिनले कपार में आग फूँक देले रहे । माई के मुअला के बाद हमरा बुझात रहे पितोजी देंहिये ढोवत बाड़े ।
कमेस्ट्री वालू सर के दूगो लइकी बाड़ी स । सर के ट्यूशन खूब चलत रहे । बिहिया तक के लइका फस्ट पसिंजर पकड़ऽस आ एक घंटा पढ़ के कवनो गाड़ी से लवट जा स । डाउन में त सुपरोफास्ट पसिंजर बन जाली । ओहू में बात पढ़े वाला लइकन के रहे ! बिहार में पढ़े वाला लइका त अँखफोर होते नेता हो जाले स ।
सर के लइकी बड़ा तेज रहली स – खाली पढ़हीं में ना, हर तरह के दाँव - पेंच आ अंदाज में । छोटकी बड़की से चार चावाँ आगहीं रहत रहे । सर अपना लइकियन के लेके निश्चिंत रहीं । अंगरेजी वालू प्रोफेसर साहेब एक दिन क्लासे में बकबकाये लगले – ‘जो लोग अपनी बच्चियों की गतिविधियों से अनजान रहते हुए दिन - रात बस दाम कमाने के चक्कर में लगे रहते हैं उनका बंटाधार होना तय है ।’ एक दिन अचके कमेस्ट्री वालू सर के तबीयत गड़बड़ा गइल । ऊ पटना के एगो प्राइवेट नर्सिंग होम में भर्ती हो गइले । ओने डाक्टर लोग प्रोफेसर साहेब के इलाज करत रहे एने उनकर बड़की बबुनी अपना ड्राइबरे संगे फुर्र… ! अँगरेजी वालू सर कहले – ‘देखो, कहता था न !’
यूनिवर्सिटी तक हल्ला हो गइल । सऽइ आदमी सऽइ बात । प्रोफेसर साहेब के दाम कामे ना आइल । बुचिया के काम, दाम पर भारी पर गइल । एक रात सुतले त फेर फजिरे सूरुज भगवान के गुलाब देखे खातिर नीन ना टूटल । अँगरेजी वालू सर कहले – डेंगू के मच्छर से डेंगू वाला आदमी खतरनाक होला ।’
– कइसे ?-- केहू पूछल ।
– ऊ छल में जामेला, नमकहरामी में पोसाला आ संवेदनहीनता के टूँड़ से ओकरे खून चूस के मुआ घालेला जे ओकरा के रोटी खियवले रहेला ।
– तब ?
– तब का ? एक जानी बांँचल बाड़ी । उहो केहू संगे उड़ जइहें ।
हमरा मन में रह - रह के एगो बात सोचा जाय – भागेला डरपोक । दम नइखे त प्रेम में परहीं के का बा ? मये घर के अधसँसू कऽ दऽ आ समाज के मुँह में सात गो जीभ उगा द । ई ठीक नइखे ।… आ कहीं जो गलत आदमी गलत नीयत से गलत कऽ दिहल त ? इज्जत त गइबे कइल सतरह टुकी के पावोरोटी बने में देरी ना लागी ।
पिताजी से कम्मो के घर के हाल सुनवलीं त ऊ मुसकाये लगले । कहले – ‘कम्मो के पापा तनी कम सुनेले ।’
हमरा अचरज भइल– एँ !
– हँ ।
– आ ऊ दोकानदार ?
– पागल ह ।
– पागल ???
– हँ । ओकरा मेहरारू के अपहरन क लियाइल रहे । नेताजी के आदमी लोग फिरौती माँगल । ऊ बेचारा पइसा लेके ओजग गइल जहाँ मँगले रहले स । मेहरारू त ना, ओकर रउँदल देंह मिलल । पइसा लेके बगेद दिहलें स पापी । नेताजी ओही पाटी के रहले जवना पाटी के ऊ वोट देले रहे । गरीब आदमी पुलिस से लेके कोर्ट - कचहरी– जहाँ ले पाराकाबू रहे, दउरल । कुछ ना होखल । लोग बोली बोले अलगा से । गँवे - गँवे ओकर हालत खराब होखे लागल ।… पहिले त ओकरा बेवकुफई से लोग खिसिआइ भा हरान होखे । अब दया देखावेला ।
– बाकिर हमरा त एकदम इहे लागत रहे कि कम्मो के पापा उधार लेके अब टरकाबाजी क रहल बाड़े ।
– एकदम ना ।
– कमाल बा !
दुसरा दिने कालेज बंद रहे । साँझ के फेर मन कइलस कि कम्मो देने जाईं । पिताजी मना त ना कइले बाकिर मन तनी दोसरा अस कइले लगले । हम पुछलीं – ना जाईं का ?’
– काहें ! हम मना नइखीं करत ।
– तबो राउर मन बेदिल लागत बा ।
– अइसन कुछ नइखे । कालिंदी के मम्मी के नाँव से तनी… ।
– मतलब ?
– कुछ ना । तोहार मन करत होखे त जा । जब एही दुनिया में जिये के बा त कबले डेराई भा लजाई आदमी ।’– पिताजी ढेरे गंभीर हो गइल रहले । जइसे देवाल प जोड़िआइल बिच्छी लउक गइल होखऽ स, तनिकी चिहुँकले फेर अहथिर होत कहले – ‘सबितरा के बियाह पहिले हमरे से होत रहे । बाद में तोहरा बाबा के मालूम भइल कि उनुकर जनम ओही खानदान में भइल बा जे अँगरेजन के पोंछ सुहुरा के मोंछ अइँठत रहे ।
– माने सुमित्रा आंटी के बाबा भा उनका परिवार के केहू अउर अँगरेज बहादुर के नोकर रहे ?
– ना, ना, नोकर से का मतलब ? चमचा रहे लोग जे अँगरेजन संगे मिल के भारत के लोगन प जुलुम करसु ।
– माने जातिद्रोही कि धर्मद्रोही कि देशद्रोही ?
– पता ना ! ई तूँ सोचऽ । बाबूजी कहलन कि ओहिजा बिआह तीन काले ना होई ।
– त रउआ का कहनीं ?
– हम का कहलीं ? हमनी के कहाँ कुछ कहे - सुने के रहत रहे ओ घरी ! जवन गार्जियन कहले, उहे वेदवाक्य ।
– यदि रउआ कहे के रहित त का कहितीं ?
– हम बिआह करे के कहितीं । एक पीढ़ी से दोसरका पीढ़ी के गुन, सोभाव आ कर्म में जरूरी नइखे कि मेल होखे । का सोचत होइहन सुमितरा ?
हमरा नाक में गंगाघाट के भभका आइल । मन ओकाये - ओकाये अस हो गइल । पुछलीं से– रउआ का बुझाता का सोचत होइहें ऊ ?’
– इहे कि तोहरा माई के जिअता में त ई लस - तागा ना लागल । उनका मुअते कइसे सेंहुड़ कदंब हो गइल !
ओकरा बाद हम कम्मो के मम्मी किहांँ कबो ना गइलीं । बेर - बेर बोलावसु लोग । हम बेर - बेर महटिया जाईं । माई मन पर जाइ । बाबा मन पर जासु – बड़े - बड़े मोंछ, लिलार पर चन्नन टीका, मुँह में पान आ बतीसो दाँत साबूत । बोलसु त जनाई ब्रह्मा जी बोलत होखसु ।
सेकरा बाद हम कम्मो से कालेजो में ना बोललीं ।
विष्णुदेव तिवारी
बक्सर, बिहार
