दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )
काठ बनि गइल बा आदिमी
कविता
कनक किशोर
2/15/20261 min read


काठ बनि गइल बा आदिमी
काठ बनि गइल बा आदिमी
गाँठ बनि गइल बा आदिमी ।
सोरह साठ के अंतर मिटल
साढ़ बनि गइल बा आदिमी ।
जबर अबर केहू ना रहल
गब्बर बनि गइल बा आदिमी ।
घर करजा में डूब गइल बा
लाट बनि गइल बा आदिमी ।
जोड़ल अब त जाने ना ऊ
काट बनि गइल बा आदिमी ।
गुणा - भाग के पढ़े पहाड़ा
चाट बनि गइल बा आदिमी ।
लोक लाज सब पी बइठल बा
राड़ बनि गइल बा आदिमी ।
खुद के सिरिजल बोझा तले
जुआठ बनि गइल बा आदिमी ।
कनक किशोर
रांची, झारखंड
चलभाष - 9279200401
