दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )

जिउतिया

निबन्ध

रामसागर सिंह

12/7/20251 min read

जिउतिया

आसमान से हल्का बुंदाबुंदी, चौपाई बयार के संगे पुस के महीना अंतिम चरण में रहे ! लगभग दस दिन से सुरुज महाराज कबहूँ कुहासा त कबहूँ बदरी से तोपाइल, धरती पर आपन नजर ना फेरले रहले ! हाड़ कंपावे वाला ठंड़ी के असर नवका लोग के भी जेकर खून अभीन गरम बा, रजाई में लुकाये के मजबूर कर देला तऽ सोचीं जे पुरान हो गइल बा ओकर का हाल होई ?

नटवर के माई घर के ओसारा में एगो कोना पलास्टिक के चटाई पर बिछावल दोहरा बिछावन पर बइठ के थर - थर कांपत रहली ! ओढ़े के तऽ उ विदेश से आइल अरबियन कामरा ओढ़ले रहली, बाकिर पुरनिया देह खातिर उहो कामरा साइत कम पड़त रहे ! उ मने मन इहे सोचते रहली कि पलानी, से खपरैल ले, फेरु जब खपरैल से छत वाला मकान भइल तबहुं जिनगी में अइसन ठंढी कबहूँ ना आइल रहे ! का जाने इ हमरा उमिर के दोस बा कि सांचो एतना हाड़ कंपावे वाला ठंढी आइल बा !

पहिले के समय में गाँव आजु के जइसन ना रहे ! गाँव - गाँव में जाड़ा के दिन में सभका दुअरा पर घुर, आउर बहिन महतारी खातिर आंगन में बोरसी के जरुर बेवस्था रहे ! आपन छोटा मोटा काम ओरवाई के सभे घुर चाहे बोरसी के चारो ओर गोलाईं में बइठ के ठंढी भगावे ! ओढ़ना के नाम पर पुरान धोती साड़ी के तहिया के, मोटका डोरा से सीयल गुदरी ही ओह समय के रजाई रहे! असली रजाई त केहुवे केहुवे के घरे रहे‌ !

केहु - केहु के घरे पिटुआ कामरा (कंबल) भी रहे जवन भेड़िहार भाई लोग भेंड़ी से उन काट के बनावे लोग ! ठ़ंढ़ी भगावे खातिर घर के कवनो कोना में जमीन पर बिछल पुअरा पेठारी आउर ओही प बिछावन के नाम पर कलकतिया जूट के बोरा, जवन कवनो पुरान धोती चाहे लुगा से ढंकाइल रहे ! कुस चाहे पेठारी से बनल चटाई भी ठंढी में बिछावना के काम करे ! बाकिर जवन भी साधन रहे ओहीसे लोग आपन ठंढी जइसे तइसे काट लेव !

अब त गांव पहिले के गांव से बहुत आगे निकल गइल ! अब मड़ई, पलानी त खतम होखे के किनारा बा ! गांवे गांव बहुते लोग के पक्का मकान, रजवाड़ी गेट, बिजली, पंखा, फ्रीज, हिटर, टी. वी. सब लाग गइल ! घर के फर्श पहिले माटी से पलास्तर आउर अब मार्बल, टाइल्स आउर महंगा पत्थर के जुग ले आ गइल !

नटवर भी जब से सउदी कमाये लगले पुरान घर तुड़वा के चकाचक नवका स्टाइल के घर बनवा लिहले ! घर में मए सहुलियत के सामान लाग गइल !

घर में चूना के जगह व्हाइट पुटी आउर सिमेन्ट और ओकरा उपर पसंद के रंग के पेन्ट पोताइल ! फर्श पर टाइल्स के जगहा सफेद संगमरमर के पत्थर लागल ! कुल मिलाके उनकर घर कवनो शहर के बंगला से कवनो कोना से कम ना रहे ! कमी रहे त इ रहे कि ओ घर में माई खातिर कवनो जगहा ना रहे ! गिन गुंथ के ज गो घर बनल रहे नटवर, आउर उनका बेटन के हिसाब से बनल रहे ! घर के घरभोज होते ही सभे आपन आपन कोठरी छेंक लिहले ! ना नटवर इ सोचले कि माई कहाँ रहीहें ना उनका लरिकन के आपना इया के कवनो फिकिर रहे !

पुस के ओह ठंड़ी में नटवर के माई के बिछावना बहरी ओसारा में हो गइल ! संगमरमर के पत्थर के फर्श पर पलास्टिक के चटाई के उपर एगो दरी नियन मेंही गुदरी बिछा के सउदी से आइल कामरा दे के माई के सुता दियाइल ! जवन संगमरमर के सफेद पत्थर घाम में भी ठंढ़े रहेला उ पुस के ठंढ़ी रात में का रंग देखावत होई ? सुतते फर्श आपन रंग देखावे लागल ! जइसे तइसे आँख लागल बाकिर अधरतिया के पहिलहीं आँख खुल गइल ! नीचे से चटाई गुदरी सब पाला हो गइल रहे ! उ सउदी वाला कामरा के बगल वाला भाग करवट ले के नीचे दबवली ! कुछ आराम मिलल बाकिर तनिक देर बाद फेरु उहो पाला लागे लागल ! रात भर जइसे तइसे उखी - बिखी में बितल ! भोर होते - होते फर्श के बिछावन त बिछावन ह सउदी वाला कामरा भी बुझाव की बरफ हो गइल बा ! उ उठ के बइठ गइली ! बिछावन पर एगो कोना गुटियाके देह गरम करे के कोशिश में लाग गइली ! बाकिर ना उनके देह के दलदली कम होखे ना उनकर दाँत कटकटाइल !

सुबह नटवर जब अंदर से बाहर अइले, माई के दशा देखके फटाफट घर से एगो आउर कामरा लियाके

निमन से ओढ़ा दिहले ! देह के आराम मिलल ! जइसे तइसे दिन बितल, गदबेर हो गइल ! नटवर के माई के आपन रात वाला दुरदासा बिसरत ना रहे ! उ आपना बेटा नटवर के बोला के कहली....

"ए बाबु, निचवा बड़ी पाला लागत बा, ना होखे त एह कोनवा तनी पेठारी बिछवा के खटियवा से आड़ कर दिहतऽ ! नीचे से हई पत्थरवा पाला लागत बा आउर उपर से सुपुहा मार के इ कामरा पाला क देता ! "

" का माई ? तुहुं अजबे बात करेलु ! अतना मँहगा पत्थर फर्श पर पुअरा पेठारी बिछावे के लागल बा ! जब पुअरे पेठारी बिछावे के रहीत त इ बनवावला के का फायदा ! तनी तुहीं बतावऽ, लाखो रुपिया लगवाके इ पत्थर लगवअले बानी, खटिया खड़ा कर के इहाँ आड़ कइल जाई, जब खटिया एने ओने खिंचाई त एतना महँगा पत्थर खराब ना होई ?"

नटवर के माई के तब बुझाइल कि उ केतना कम किमती बाड़ी ! नव महिना पेट में ढो के, सगरी दरद पीरा सह के वंश जनमावल जाला ! ना जाने कवन - कवन सपना मार के लरिकन के पोसल जाता, बाकिर उहे लरिका जवान होके सब निक लिप देत बाड़े सन ! बाप महतारी के बुढ़ारी बोझा लागे लागता ! नटवर के माई के बुझा गइल कि लरिकाईं में खिंच खिंच के आंचर ओढ़े वाला नटवर खातिर अब उ काम के चीज नइखी रह गइल !

"ना ए बाबु.. हम त एही से कहनी ह कि पछुआ हलकोरा मारत बा, लागत बा कि लाद में ठंढ़ा मार दी ।"

" ना माई ! पत्थर पर पुअरा थोड़े बिछी ! एगो कामरा अउरी ले लिह, ठंढ़ी ना लागी !

नटवर के माई "ठीक बा" कह के चुप हो गइली ! रात के खाना खइला के बाद सभे अपना अपना घर में सुते चल गइल ! नटवर के माई के एगो अउरी कामरा दिया गइल ! उ तीन तीन गो कामरा ओढ़ के सुत गइली ! पछुआ आपना पुरा रंग में रहे ! ओढ़ना आउर पछुआ में वर्चस्व के लड़ाई होत रहे ! आखिर ओढ़ना पर पछुआ भारी परे लागल ! पछुआ अब कामरा के महीन छेदानी से पार होके नटवर के माई के शरीर छेदे लागल ! उ उठ के बइठ गइली ! ठंढी छाती में समा गइल रहे ! देह काँपे लागल, पेट दलदलाए लागल, दाँत कटकटाये लागल ! उ केतने बार कोशिश कइली कि देह ना हिलो, दाँत जनि कटकटाव, बाकिर बार - बार के कोशिश नाकाम भइल ! उ एक बेरी फेरु से तीनों कामरा देह में लपेट के ओठंग गइली !

पछुआ आउर ओढ़ना के लड़ाई अब ठंढ़ी आउर नटवर के माई के लड़ाई में बदल गइल रहे ! ठंढ़ी उनके हिलावे कंपकंपावे के फेर में रहे, उ अपना के ना हिले देवे के लड़ाई लड़त रहली ! आखिर धीरे - धीरे उ आपन गोड़ लंबा कर के कामरा में गुटिया के सुत गइली !

बिहान होते नटवर घर से बाहर निकलले ! देखले के माई आराम से गोड़ लंबा कर के सुतल बाड़ी ! नटवर ओसारा से बाहर निकल के गांव के गुमटी पर कुछ लेवे चल गइले ! लगभग एक घंटा बाद उ घरे पहुंचले त माई ओसहीं टंगरी लंबा क के सुतल रहली ! मने मन उ सोंचले कि माई तीन गो कामरा पाके आज आराम से सुतल बिया‌ ! उ आवाज दिहले...

"माई...! ए माई, उठऽ बिहान हो गइल !"

माई कुछउ ना बोलली ! उ फेरु आवाज दिहले...

" ए माई, उठऽ ना... आजु तिन गो कामरा मिलल बा त आराम से सुतल बाड़ु ! कहुवीं नु कि एगो अउरी कामरा ले ल.. ठंढी ना लागी !"

माई फेरु कुछउ ना बोलली !

नटवर आगे बढ़ के माई के जगावे खातिर कामरा खिंचले ! " माई उठऽ... "

एगो कामरा उनका हाथ में आ गइल ! माई ना हिलली ! उ घबरा के फेरु ओढ़ना जोर से पकड़ के खिंच ले... "ए माई.. उठऽ ना.. "

पुरा ओढ़ना उनका हाथ में आ गइल ! माई ना हिलली ! अब जवन सोझा रहे उ देख के नटवर अवाक रह गइले ! माई के दाँत पर दाँत कसाइल रहे, आँख बन्द रहे, हाथ खुलल रहे, नाक से एक दू बूंद खून चु के जम गइल रहे ! नटवर के माई ठंढ़ी से आपन लड़ाई हार गइल रहली !

नटवर अब दहाड़ मार - मार के माई - माई कह के रोवे लगले ! उनका लरिकाईं से लेके अभिन तक के सब बात इयाद परे लागल ! जिनगी में जवन मिलल माई के आशीर्वाद से मिलल ! बाकिर अफसोस....!

कुछ देर बाद नटवर काँच बाँस से बनल पचाठी प माई के लाश खातिर पुअरा बिछावत रहले ! काश.. इ पुअरा एक दिन पहिले उ संगमरमर के पत्थर पर बिछा देले रहते त एतना जल्दी पचाठी पर ना बिछावे के पड़ीत‌ !

रामसागर सिंह

कोदई, पचरुखी, सिवान (बिहार)

8156077577