दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )

जाड़ा आइल

कविता

अंकुश्री

12/19/20251 min read

(भोजपुरी कविता)

जाड़ा आइल

अकुलाइल आ भुलाइल

जाने ई कहवाँ से आइल।

बयार का खिलखिलाइल

सभ जनन के देह सिहराइल।

रातो भर केंकुराइल

भोरे-भोर ई कुलबुलाइल।

भर रात ई बढ़िआइल

मगर भर दिन ई बिलबिलाइल।

दिन मुट्ठी में समटाइल

बाकिर काम ढेर निपटाइल।

तनिका दिन जब घमाइल

त मेट गइल सब मिलमिलाइल।

साँझ फेर पिलपिलाइल

रहल रात भर ई खिसिआइल।

सुरुज देखते लजाइल

जाने केने दो घुसिआइल।

डाल-डाल बा फुलाइल

मौसम ई जाड़ा के आइल।

अंकुश्री

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