दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )

इंसाफ के असरा

कहानी

सुरेश कांटक

12/12/20251 min read

इंसाफ के असरा

"अब का करीं !" नन्हकू कपारे हाथ ध के बइठि गइलन । आ सोचे लगलन ।

गधबेर के बेरा रहे । चारों ओर गते गते करिखाही चदरा तनाये लागल रहे । माल मवेशी बने बधारी से चरि चूरि के अपना मालिक मुखर का ढाबा ओसारा में लवटि के पंखुरी करें लागल रहन । नन्हकू के मेहरारू रामपियारी नन्हकू के असरा में बइठल रही कि ऊ आवसु त मन अहथिर होंखो । अगल बगल सभ मुद्दइये मोखालिफ बाड़ें स, का पता कब कवना के कपार प कवन पाप सवार हो जाय !

अठारह बीस बरिस बीत गइल, थाना कचहरी दउरत दउरत । आजु ले इंसाफ ना मिलल । अब कइसे केहू जीही ! एही सभ सोच में पड़ल रामपियारी अपना मरद नन्हकू के राह देखत रही । तबले नन्हकू आ गइलन आ उदास सूखल झुराइल मुंह लिहले अंगना में धइल झलंगी बंसखट प पसरि गइलन ।

"का भइल हां ?" राम परियारी उनुकर बुताइल रोखी देखि के पूछली ।

"कुछ ना भइल हा ।"

"तब काहें के बोलवले रहल हा मुअना मटिलगना ?" काहें धवावत बा ? काम धंधा आ रोजी रोजगार छोड़ि के हरदम जाए के पड़त बा । आजुओ के दिन बेकार गइल नू ? ओकरा का पता बा कि इहंवा रोज कुआं खोदे के बा आ रोज पानी पीएं के बा ।"

"हमरा बुझात नइखे रामचनर के माई, अब हम का करीं ! कहिया ले दउरीं ! द एक लोटा पानी । बड़ा जोर पिआस लागल बा ।"

रामपियारी पानी ले आवे चल ग इली । नन्हकू डूबि गइलन पिछिला खोह में ।

"ल रामचनर के माई । मिल गइल । अहथिर धरs !"

"का ह ?"

"जमीन के परचा !"

"कइसन परचा ?"

"पागले रहि गइलू का ? सरकार का ओर से भूमिहीन गरीब के जमीन बंटाता । हमनियो के पन्द्रह काठा मिलल हा !"

"हे भगवान ! हे काली माई ! धनि भाग, हमनी के दुख देखलस सरकार । रहे के सरन दे लेलस ।" रामप्यारी के आंखि चमकि उठली स । बिजुरी पइसि गइल अंगे अंग ! "अब हमनियो के हो गइनी जा पंच बरोबर ।"

"हं हो, हमनी के किस्मत जागि गइल । ना त एगो मड़ई में कइसे गूजर होइत ! बाल बाचा सेयान होत बाड़ें स । मेहनत मजदूरी के बल पर जमीन लियाइत ना । मालिक लोग के बेगारी करत जिनगी खपित । ना कइला प मड़ई उजारि दिहित लोग । भा आगि लगा दिहित लोग । फेनु कहंवा जइतीं जा !"

"अब त अपना जमीन में झोपड़ियों डालि के रही नू अदिमी ।‌ परबस ना नू रही । ओहू लोगन के नजर हमरे प गड़ल रहेगा । बुढ़वो भउजी कहेलन स । जवनका त ललचले रहेलन स । कबो कबो बोलियों टिबोली बोल देलन स ।

"अइसन बात मत निकाल मुंह से । ना त सुनिहें स त ओदबाद करें लगिहन स । हम कुल्हि जानत बानी । हमरा ना रहला प का गुजरेला तहरा प ! बाकिर खून के घूंट पी के रहि जाइला । अब त आपन जमीन हो गइल । केहू आंखि ना देखा सकी । काल्हुए से अपना जमीन में मड़ई लगावे के जोगाड़ करत बानी ।"

ल, पी ल पानी ।" रामप्यारी मरद के पानी के लोटा धरावत कहली । बाकिर नन्हकू त डूडल रहन अठारह बीस पहिले के चकोह में । उनुकर बात सुनलन ना ।

"सुनत नइखs, करना खोह में अझुराइल बाड़s ? सोचत सोचत त सउसे देहि सुखवा लिहल । जवानिये में बुढ़ारी आ गइल । आंखिन प चश्मा चढ़ि गइल ।" रामप्यारी फेनु टोकली त नन्हकू के धेयान टूटल । रामप्यारी का ओर देखते लोटा के पानी लेबे खातिर हाथ बढ़ा देलन ।

"काहें अन्हार भइल बा ?" पानी पी के मेहरारू से पुछलन ।

"सांझि हो गइल त अन्हार ना होई !"

"सांझि हो गइल !" सोच के समुंदर में डूबल नन्हकू के होस ना रहल कि कब बिहान भइल ,कब दुपहरिया आ कब सुरुज डूबि ग इलें ! काम के झोंक में दउरत धूपत इयादों ससुरी धोखा दे देले रहे ।

"अब दियवा बारि द ।"

"का दीया बारीं हो । कहंवा कहंवा दीया बारीं ? संउसे जिनिगिए जब अन्हारे में सउनाइल बा ।"

नन्हकू सोचे लगलन, बाबू कुछ ना कइलन हमरा खातिर । ज़िन्दगी भर दोहरा के बेगारी कइलन आ मूए के बेर हमरो प लादि गइलन । कवना दो भागे जमीन के परचा मिलल त एहू प ससुरन के नजर लागि गइल । अबर दूबर जानि के चारों ओर से हंथवसि लिहलन स । पन्द्रह काटा में मुश्किल से दूं तीन काटा जमीन हके लागल । तू जा, पहिले दीया जरावs । चारों ओर भकसावन लागत बा । चूल्हा ना धरी का आज ?"

"ना, दिने के भात बांचल बा । हरियर मरीचा भुंजले बानी । उन्हें खा के रात्रि काटि लिहल जाई । पतोहिया आई नइहर से तब दूऩो बेरा चूल्हा जरी । लवनो के दुखे नू बा ।" रामप्यारी चल गइली दीया बारे । नन्हकू कपारे हाथ दिहले सोचे लगलन ।

"का रे नन्हकुआ, अब मरदाहि भुला गइल ? कवनों बड़ आदमी कब्जा कइले रहित त संउसे नान्ह रेयान एकवटि के जिंदाबाद मुर्दाबाद कइले रहितs स नू ?" बहुत दिन पहिले के एगो बात सट् सट् सोंटा मरलस नन्हकू के दिमाग में ।

"बुरड़क के भ़इसि बिआइल त संउसे गांव घूंचा ले के दउरल । उहे हाल हो गइल नन्हकू के जमीन का साथे । जमीन दखलिआवे के सावंग ना रहे । मालिक के मड़ई छोड़ि के आ गइलें अपना जमीन प । ऊंखि के पतई आ पतलो के इंतजाम कइलें । गांव घर से बांस फांस आ फूस फांस जोगाड़ कइलें आ दू गो मड़ई खाड़ के लिहलें अपना हाथे। बांचल जमीन में अधिया बंटइया ले के दूं गो पाड़ी पोसि लिहलें । लइका पाड़ी चरावें लागल । घुमला छिछिअइला से जान बांचल । निफिकिर हो के मेहनत मजदूरी करें लगलन । मेहरारू आपन भनसार बना लिहली । बगइचा से आम महुआ के पतई बहारि के ले अइली आ भुजुना अनाज भूंजे लगली गांव घर के ।

महिनों ना बीतल, लूटन जादो उनुका घर के सोझा आपन भंइस बान्हि दिहलें ।

"ई का हो, ई का करत बाड़s ?" नन्हकू मुन्हारही पूछलें ।

"तहरा लउकत नइखे कि भंइस बन्हनी हा !"

"हमरे जमीन में तोहार भंइस बन्हाई ? अपना जमीन में काहें नइखs बान्हत ?"

"फेनु हटा लेब । रहे द दूं चार दिन । हमार भंइसिया तोहार जमीनिया ना नू खा जाई !"

नन्हकू चुपा गइलन । पास पड़ोस के बात बा । अन्हारे अंजोरे सबसे काम पड़ेगा । गांव घर में धतूरों रहेला त कवनो कामे आ जाला । हमरा त मेहनत मजदूरी पर जिये के बा । खेत-बधार त बा ना । पुंजी पाटा दोसर हइए नइखे । भर दिन जांगर ठेठावs त दूं गो रोटी पावs ।

बाकिर सोझिया के मुंह कुकुर चाटेला । कुछ दिन का बाद देखत बाड़ें कि लूटन के भाइयों लोग आपन आपन खूंटा गाड़ि के उनुका मड़ई के आगा पाछा, बातें दायें, भंइस पाड़ी बान्हि दिहल लोग ।

उठिये सुती ऊ अपना मेहरारू से कहलें, हई देखs हो, ई त चारों ओर से घेर दिहलन स ।"

"तू टोकत काहें नइखs ? चुपाइल काहें बाड़s ? हाथ धरत धरत पाहुंच पकड़ि लीहें स । मना क द । आपन माल गरू अपना घरे बान्हस लोग ।"

"हमरा ना रहला प सबके सभ खूंटा गड़ले हां स । देखतीं त टोकबे करितीं । तू त घरहीं रहत बाड़ू । तहरा ना टोके के चाहीं ?"

"हमरा टोकरा से मनिहें स ! हमहूं चौबीसों घंटा मड़ई अगोरले रहत बानी का ! अपना दुखड़ा धंधा में रहत बानी, तबे सांझि बिहान दूं कवर भेंटा जाता । जा अबहिए, हटवाव सभन के भंइस खूंटा ।"

नन्हकू बारी बारी से गइलन सबके दुआरी प । चिचिअइलन दुआरी प से । केहू बोलल, केहू ना बोलल । केहू लइकन से बहाना करवा दिहल । "घरे नइखन ।"

गरीब गुरबा के बात के सुनेला ? सुनियो के अंठिया देला । लूटन सुनलें त निकललें घर से ।

"क ह हो नन्हकू ?"

"देखत नइखs , सबके भइस हमरे जमीन में बन्हइहें स ?"

"त का हो गइल ? परतिये नू बा ! घेरे लगबs त हटा दीही लोग ।"

"ना भाई, ई काम ठीक नइखे । आपन भंइस हटावs. लोग । खाड़ होत होत बइठे सूते लगबs लोग । हम अकेला आदमी केकरा के करा से मारा मारी करब ?"

"हम बानी नू, तू काहें चिंता करत बाड़s ? हम हटाइब सबका के । घेरे लगिहs त कहिहs ।"

"हमरा घेरे के सावंग बा अबहीं कि घेरब ? मेहनत मजूरी क के दूनों बेरा लेवन लाग जाता, इहे काफी बा ।"

"त काहें के अतना जमीन रखले बाड़s ? अपना कामे भर राखs ना ! जोरू जमीन जोर के, ना त केहू और के ! जनता बाड़s नू ?"

"देखs भाई, अइसे मत बतिआवs । तहरा के कहि दिहनी बान्हें के त देखा देखी सभलोग बान्हे लागल । हमरा भीरी लाठी के जोर नइखे नू कि तहरा लोग से लाठी खटखटाइब !"

"एही से नू कहत बानी, कि जा आपन रोजी मजूरी करs । जरूरत लागी त हमरा से कहिहs । हम बानी नू ! हमरा प बिस्वास नइखे ? गाढ़े सकेते के कामे आई ?"

"ठीके बा, तहरे बिस्वास प जात बानी ।"

"ठीक बा । जा । चिंता मत करs । तोहार बाबू हमनी के संघतिया रहन । बबुअनवा जब सतावत रहन स त हमनिये से आपन दुख सितम कहत रहन । हमनी के तोहार भलाइये करब जा । बुराई ना ।"

लूटन समुझा देलन । नन्हकू लवटि अइलन ।

"का भइल हा ?" मेहरारू आवते पुछली ।

"लूटन कहले हा कि हम बानी नू । तहरा जब जरूरत पड़ी हम सबके भंइस हटवा देब । बाबू के संघतिया हवन, हमरा साथे गलत बेवहार ना करिहें ।"

"केहू के भरोसा न इखे आज के जमाना में । मुंह में राम बगल में छूरी रहत बा । कब केकर ईमान डोल जाई, केहू नाइखे जानत । भाई भाई के न इखे छोड़त त हमरा तहरा के छोड़ीं ! आगे तू जनिहs ।" मेहरारू कहि के चुपा गईली ।

नन्हकू लूटन के भरोसा क लिहलें । अपना मेहनत मजूरी में लाग गइलें । सुबहे जासु त सांझे आवसु । आवते परि जासु बंसखट प । दिन भर के मेहनत से रग रग टूटत रहे । हाड़ चटके । दु कवर खासु आ नीन के झंकोरा में परि जासु ।

कुछ दिन का बाद देखत बाड़े कि उनुका मड़ई ई का पीछे एगो दोसर मड़ई लागल बा ।

देखते देहि के खून सुखा गइल । तितकी लेस देलस । अइसन बिस्वास घात ! आंखिन से लुतुकी फेंके लागल । अकबका के बोललें, "अरे हई देखs हो ! कवना के दो मड़ई खाड़ हो गइल हमरा जमीन में !"

रामप्यारी निकलि अइली अपना मड़ई से बहरी । पिछूती देखली त आगि लागि गइल देहि में । लगली नतिया भतीजवा गरियावे । कवना नतियां के मड़ई है रे ! अबरा के मउगी गांव भर के भउजी बनल बिया ! अइसन कन्हेर होला भला ! जेकरें मन होता उहे दखल जमावे आ जाता ! कहंवा बाड़े लूटन ? का कहले रहन ? उनुका लउकत नइखे !

रामप्यारी के नकवाहिन गारी सुनि के मोहल्ला भर के लइका मेहरारू जूटि ग इलें । सबके सभ नयकी मड़ई का ओर अचरज से देखें लागल । रामप्यारी अपना मरद नन्हकू के चिचिअइली कहंवा बाड़s हो , जा लूटन केहें । पूछs उनुका से, इस सभ का होता !"

नन्हकू दुलुकी नधले गइलन लूटन केहें । लूटन एनहीं आवत रहन । राहें में भेंटा गइलन । उनुका पीछे पीछे उनुकर भाइयों गोतिया लोग आवत रहे ।

"का काका, इसे सभ होई ?" नन्हकू उनुका के रोकि के पुछलें ।

"का भइल ?" उ अइसे पुछलें जइसे कुछ जानते ना होखसु ।

"हमरा जमीन में केकर मड़ई खाड़ हो गइल ?"

"केहू के होखबे करी !" उनुकर भासा बदलल रहे ।

संभलोग आ गइल ओह मड़ई भीरी ।

"मड़इये नू ह । महल नइखे नू उठल ? जब तहरा जरूरत लागी, हटि जाई ।" लूटन बेलस के बोललें ।

"एंकर मतलब इहे ह ? हम तहरा जमीन में लगाइब त लगावे देबs ?"

"काहें लगावे देब ?"

"तू काहें लगइब?"

"ई सरकारी जमीन ह । तोहार कीनल ना ह ।"

"हमरा सरकारी परचा मिलल बा । हम एंकर रसीद कटवले बानी । तू लोग आपन माल गरू हठाव लोग । अब केहू के माल गरू ना रही इहंवा ।"

"तोहार रहिहें स ? अवरू लोग के ना ?"

"ना । जमीन हमार ह । अउरी लोग के ना ।"

बकझक बढ़ि गइल । लूटन के भासा, नीयत, ईमान सभ बदलल रहे । ऊ आंखि तरेर के बोललें, "नन्हकुआ, तें हमरा के अबहिन चीन्हत नइखस । चलि जइबे एह दुनिया से ।"

"चीन्हत बानी । खूब बढ़िया से चीन्हत बानी । बिस्वास घाती आदमी हवs । ओह दिन कइसे बोलत रह । आज कइसे बोलत बाड़s ! चोरी आ सीनाजोरी दूनों ! सेन्हीं प बिरहा गइबs "

नन्हकू के बात लागि गइल लूटन के । उनुका पीछे उनुकर भाई बंद रहे लोग । ओहू लोग के खईक गड़ गइल ।

"मार रे, मार साला के ! एकर मन बढ़ि गइल बा ।अंजु बनिया काल्हु सेठ !" पीछे से एगो ललकरलस । आ तड़के लाठी गिरल कपार प नन्हकू के । बहि चलल खून के धार !

"जो, अब जहंवा जाये के होखे, जो । भंइसिन के खूंटा छुअले, आ मड़ई भीरी गइले त रोवनीहारो ना जूरी !"

नन्हकू अकेल ! करसु का ! ना धन, ना बल, ना सवांग !

खून के धार बहत देख, रामप्यारी से बरदास ना भइल । लगली भांड़े । सात पुहुत के उद्धार करे । दोसर बल बउसाय त रहे ना, दूनों बेकत चल दिहलें पुरनका मालिक के दुआर प । संकट के घरी में दोसर केहू ना लउकल । थाना कचहरी प जाये के बेंवत रहे ना ।

लूटन अपना भाई बंद के साथे उनुका के जात देखत रहन, ठठा के हंसलें, "जो, ऊ मरले रहे त हमरा भीरी आइल रहस । अब जो फेरु ओकरे भीरी । देखीं ऊ का उखाड़ लेता "!

नन्हकू चल गइलें पसपत सिंह के दुआर प । पसपत सिंह अपना दुआर प बइठल रहन । नन्हकू के देखते बोललन, "का रे नन्हकुआ, का हाल बा ? केने चलले हा ?"

"रउवे भीरी चलनी हा मालिक ।"

"का बात बा रे ?"

"लूटन हमरा जमीन पर कब्जा करत बाड़न । खूंटा गाड़ि दिहलें । भंइसि बान्हि दिहलें । अब मड़ इयो डालि दिहलें । चारों ओर से उनुकर भाई गोतिया हमार जमीन कब्जिया लिहलें । बोलला प लाठियों चला दिहलें हां । पनरह काठा में खाली दूं काटा हमरा कब्जा में रहि गइल । बाकी सभी हथिया लीहल लोग । हम अकसरुआ आदमी, लइका अबहिन नबोजे बाड़ें स । रउवा हमार मदद करीं मालिक, ना त हमार गांव छूटि जाई !"

"हम कइसे मदद करीं तोर रे ? ते हमार के हवे ?"

"काहें अइसे कहत बानी, मालिक ! हम राउर परजा पवनी हईं मालिक !"

"अब परजा पवनी वाला जमाना नइखे रे ! अब सभे राजा बा ! महीना में क दिन आवेलस हमरा दुआर प ? क दिन करेलस हमार बेगारी ? तोर मेहरियों अंइठत चलत बिया । क दिन आवेले हमरा घरे ?"

"गरीब आदमी चंडाल बरोबर, मालिक ! मेहनत मजूरी से सांवस नइखे मिलत । दू गो बाल बुतरू बाड़े स, ओकनिये के जियावे खियावे में दिन गुदस्त हो जाता । हमार तीन पीढ़ी राउर सेवा कइले बा । रउवा जमीन में रहल बा । आखिर में उ जमीनियो छोड़ दिहनी ।"

"तोर बालो बाचा त नइखन स आवत । उहो अइतें स त जीयत खात रहितन स । ओकनी भर त रोज जूठन फेंका जाला । कुकुर बिलाई खा जालन स ।"

"ऊहो भंइसि चरावें में बाझल बाड़ें स मालिक ।"

"त जो अपना मुखिया भीरी । सामाजिक न्याय के सरकार बिया, ओकरा भीरी जो । हमरा भीरी का अइले हा ? तोहनी के त अपने अंखफोर हो गइल बाड़s स ।"

"रउवा ना कुछ करब ?"

"ना, उहे तोहनी के मददगार हवन स ।"

"रक्षके नू भक्षक भइल बा, मालिक । गरीब आदमी त चारों ओर से मारल जाता ।"

"हमनी के अइसे कइले रहितीं जा त संउसे गांव एकवटि जइतs स । झंडा पताका उड़ावें लगितs स । अब कहंवा गइल तोहनी के झंडा पताका ?"

"ठीके बा मालिक, जात बानी मुखिये भीरी । ऊ त कुछ करबे नू करिहें ।"

"हं हं,जल्दी जो । कपार कइसे फूटल हा ?"

"कहनी हा नू, टोकला खातिर लाठी चला देलस हा, लूटना ।"

"इहे कहाला सेन्ही प बिरहा गावल । मरबो करब आ रोवहूं ना देब । जइसने करनी ओइसने भरनी !"

नन्हकू निराश हो के उनुका ऊंचा चउतरा से नीचे उतरलें आ मुखिया जी का ओर राह धइलें । गली मोहाला में उनुका कपार के खून देखि के लोग बाग पूछल - "ई कइसे भइल हा नन्हकू ?"

"लूटन के करसाजी ह भइया । अबरा के केहू मददगार नइखे गांव में । हमार जमीनों दखल करत बा लोग आ मारतो बा लोग !"

ईहां से ऊंहां तक सभे सुनल उनुकर बात बाकिर केहू लूटन से पूछे के तेयार ना भइल कि काहें अइसे करत बाड़s लोग । काहें एह गरीब के दबावत बाड़s लोग ? तीन पुहुत के बाद त बेचारा बाघ के मुंह से निकलल हा, अब तू लोग काहें एकरा के तबाह करत बाड़s लोग !"

नन्हकू पहुंच गइलें मुखिया जी के दुआर प । मुखिया जी अपना अमला फैला का साथे मजलिस जमवले रहन । उनुका नयका दुमंजिला मकान में काम लागल रहे । मिस्त्री मजूरा भीरल रहन । नन्हकू के देखते पुछलन मुखिया जी, "आवs आवs नन्हकू, कहs केने चललs हा ?"

"रउसे भीरी चलनी हा मुखिया जी ।"

"का समाचार हो ?"

"रउवे भाई गोतिया लोग हमार जमीन कब्जियावत बा । माना कइला प मारतो बा लोग । देखीं, लाठी से मारि के कपार फोरि देले बा लोग ।"

"लूटन भाई अइसे करत बाड़न ! हमरा त बिस्वास नइखे होत कि ऊ अइसन काम कर सकत बाड़न !" मुखिया जी चिहा के बोललन ।

"हं जी, आंखीं देखीं आ साखी पूछीं ! हमरो बहुत भरोसा रहे उनुका प । दागा दे दिहलें । पीठ में छूरा घोंप दिहलें । अब रउवे इंसाफ करीं । कतना दिन दउरला का बाद सरकार जमीन के पर्ची देले रहे । रसीदों कटा लेले बानी पनरह काठा के । तबो जीये नइखे देत लोग ।"

"आछा ठीक बा । तें जो , हम उनुका से भेंट करके पूछब, काहें अइसे करत बाड़न !" मुखिया जी नन्हकू के टरकावे खातिर कह दिहलें ।

"ना मुखिया जी, घरी में घर छूटे, नव घरी भद्रा मत लगाईं । अबहीं चलीं हमरा साथे, देख लीहीं, ओह लोग के ज्यादती, करनी करतूत !"

"अबहिन त बहुते काम में फंसल बानी, नन्हकू । देखते बाड़s, मिस्त्री मजूरा काम में लागल बाड़ें । तूहूं लोग जा अपना काम में । जल्दिये ओरिया के आवs । एने मंगरू भाई के मेहरारू मूअल बिया । मजली जाये के बा । दू एक दिन दम धरs ।"

"हम एको मिनट दम ना धरब मुखिया जी । हम जीयत ज़िन्दगी में नईखीं ।"

"त एगो काम करs । ग्राम कचहरी में चल जा । केस क दs । अइसे हमहूं जात भाई के ममिला में पड़ल ना चाहीं ला ।"

"तू इसे बतिया कहीं ना, कि भोट कटे के डर बा । नाज़ नखड़ा काहें करत बानी ? हम त जानते बानी कि जात भाई के पछ में जादा रहींला रउवा । अबरूआ के पंचायत में अगहर हो जाईंला ।"

"जब जानते रहs, त का करें अइलs हा ? हमहूं जानत बानी कि तू पसपत सिंह के आदमी हवs । तीन पीढ़ी के खून पीयलन स । बेगारी आ टहलदारी करववलें सs । आ अन्त में अपना जमीन में से हटाइओ देलन स । चल जा फेर ओहिजे । उहे नीमन इंसाफ करिहें ।"

"अइसे काहें कहत बानी मुखिया जी । भोट हम रउआ के देले बानी । उनुका के नइखीं दिहले । इहे लूटन हमार कान भरले रहन । आज हमरा के लूटे खातिर तेयार बाड़न । काल्ह तक जे अत्याचार के विरोध करत रहे, आज उहे अत्याचार करें लागल बा । "

"नन्हकुआ, तेहूं बहुत बोले लगले । जल्दी भाग जो इहंवा से । ना त मारत मारत चाम छिल देबि देह के ।" मुखिया जी अपना असलियत प आ गइलें

"हमार त चाम छिलिए देब, हम त जानते बानी । अपना गोतियवन के चाम काहें नइखीं छीलत ! संउसे गांव में हाला मचवले बाड़न स कि मुखियवा फलनवा बो के रखले बा । रात बिरात अपना दलान में बोला लेला ।"

"अरें सैतान, ते भगबे कि ना इहंवा से ! बढ़ बढ़ के बोलबे ?"

"हम नइखीं बोलत, राउर गोतियवे कहेलन स । गरीब आदमी चंडाल बरोबर होला, मुखिया जी । ना त हइसे ना बोलतीं रावा । सबका खातिर टाइम बा रावा भीरी । हमरा खातिर टाइमें नइखे । काल्ह तक हमरे पाटी में रहीं रावा । आजु पद पा गइनी त हमरे चाम छीले लगनी ! ना त बबुआनन के आगे बकार ना निकलत रहे ।"

"बस बस , बहुते बोल दिहले । जो इहंवा से । ना त कपार प जूता गिरे लागी ।"

नन्हकू बूझि गइलें उनुकर मंशा । जाति भाई के बात बा । ई एह ममिला में कुछ ना करिहें । गंवे से उहंवा से टकसि गइलें ।

घरे गइलें त मेहरारू खटपरू भइल रही । जमीन के चिंता महमंड प संवार रहे । उनुका के देखते उठि के बइठली । "का भइल ?" पुछली ।

"कुछ ना भइल । जात बानी थाना प ।" नन्हकू मुरझाइले बोललें ।

"हं जा, नतियां धमकी देके गइले हां स कि ढेर फुटुर फुटुर करबे त गांव छोड़ा देब जा ।"

"ओकनिये के माई बिआइल बिया गांव छोड़ावे खातिर ? ओकनी के बाप के गांव ह ! हम जात नू बानी थाना प । गांव घर से कहि के देख लिहनी नू । गांव हमरा के दोस ना नू दीही ।"

"हमहूं चलीं का ?"

"तू का करें जइबू ? घरवा के देखीं ? दू गो नबोज लइका बाड़न स । भंइस पाड़ी बाड़ी स । चारो ओर मुद्दई मोखलिफ बाड़न स । हम अकेलहीं जाईब । कुछ पइसा कउड़ी होखे त दे द । थाना पुलिस बिना पइसा के एको डेग ना हिले ।"

अब तक के पेट काटि के पांच स रुपिया ले के नन्हकू थाना प चल दिहलें ।

आजु से पहिले ऊ कबो थाना प गइल ना रहन । जीव धुक धुक करत रहे । दरोग़ा सिपाही के देखते देखि में जाड़ हो जात रहे । लोगन से सुनले रहन कि थाना पुलिस केहू के ना होला । कुकुर के जात होला । जेही माल दीही ओकरे पछ लीही । पइसा के जामल होला । दूनो ओर से टानेला । ओहिजा इंसाफ बेचाला । तो मरता का ना करता ! गंवे गंवे पहुचि गइलें । संउसे राह एहीं चिंता में कटि गइल । ना खेत लउकल ना बधार । ना चिरईं, ना चुरूंग । ना सियार, ना घोड़परास । आंखिन में थाना के लाल घर आ लूटन समाइल रहल ।

ई पहिला बेर रहे, जब कवनो गरीब मजूर अकेले थाना प गइल रहे । एकरा पहिले कवनों गंउवा मुख्तार लोग कवनो ममिला के ले के थाना प जात रहे लोग । जेकर ममिला होखे ओकरा से पइसा कउड़ी लेत रहे लोग । आधा तीतर आधा बटेर हो जात रहे । बाकिर अबकी त केहू नावें ना लीहल ।

थाना के ऊंचका ढाबा प चढ़े के पहिले नन्हकू के गोड़ थर् थर् कांपते रहे । हीयरा धक्् धक्् करत रहे । पुरहर हियाव जुटा के, जीव जांति के, ऊ थाना के सीढ़ी पर पहुंचलें त एगो चौकीदार लउकल।

अब नन्हकू के जीव में जीव पड़ल । ऊ दूरे से पुछलस, "का ह हो, टेकरा के खोजत बाड़s ?"

"दरोग़ा जी के ।"

"का बात बा ?"

"केस करें के बा ।"

"केकरा प ?"

"लूटन प ।"

"काहें खातिर ।"

"हमरा जमीन पर बलाते कब्जा कइले बा लोग । हमरा परिवार के तंगो करत बा लोग । हरदम संड़सिअवले रहत बा लोग ।"

"माल पानी बा चेट में ?"

"काहें खातिर ?"

"बिना माल पानी के केस होला भकचोन्हर दास ?"

"पांच सइ बा ।"

"पांच सइ में केस होला चोन्हर दास ?"

"तब कतना में होला ?"

"पांच हजार चाहीं, पांच हजार !"

"पहिले दरोग़ा जी से भेंट करावs ना । हम आपन अर्जी मिनती करब नू ! पहिले तू हीं मुंह बा दिहलs !"

तबले दरोग़ा जी आ गइलें । कुरसी पर बइठते पुछलें, "का बात बा ?"

नन्हकू आपन सभ दुख सुना दिहलें । आंखिन में लोर भर आइल ।

दरोग़ा जी बूझि गइलें सभ बात । इहो बूझि गइलें कि एह तीसी तेल नइखे । नन्हकू के डांटिए के बोललें, "गांव में मुखिया सरपंच नइखन, जायज नजायज देखेवाला ? जा, ओहीं लोग से कहs ।"

"केहू नइखे सुनत, सरकार ! सबका से कहि चुकनी । मुंहदेखल बात करत बा लोग । जहां रस, तहां बस, वाली बात बा । गरीब आदमी के सुनवइया केहू नइखे । रउवे हमार माई बाप बानी ।"

नन्हकू खूब रोवलें गिड़गिड़इलें । बाकिर पत्थर पर दूब ना जामल । अंत में दरोग़ा जी पुछलें,"कतना पइसा ले आइल बाड़s?"

"पांच सइ बा सरकार ।"

"पांच सइ में पनरह काठा कब्जा होई मुरुखदास ! मुफुत में जमीन मिल गइल त मुफुते में कब्जों हो जाई ! जा, घरे जा !" जतना प कब्जा बा ओतने प संतोष करs । ढेर लालच ना करे के । लालच बुरी बलाय ह !"

नन्हकू बहुत देर ले दरोग़ा जी के मुंह देखत रहि गइलें ।बाकिर उनुकर करेजा ना पिघलल । निराश मन घरे लवटि अइलें नन्हकू ।

जब लूटन के पता चलल कि नन्हकुआ थाना प गइल रहल हा, ऊ दोसरे दिन थाना प पहुंच गइलें आ दरोग़ा जी के पुरहर सेवा क अइलें ।

अब का करसु नन्हकू ! चारों ओर अन्हरिया घेर लेलस । कहीं से कवनो सहारा ना लउके । मानो कवनो बड़का पहाड़ से जंताइल होखस । जीव ऊब चुभ में पड़ल रहे । का करीं छोड़ दीहीं आपन जमीन ! संउसे ज़िन्दगी चलिए गइल एही जमीन के चलते । काल्हु आ के हमार मड़इयो हथिया लीहें स । तब का करब ? कहियो हमरा मेहरारुओ के कब्जा में क लीहें स, त चुपचाप बइठि जाईब ! दरोगे सबसे बड़ा अफसर होला ! एकरा ऊपर कवनो अफसर ना होला ? अइसे हार गइला से क दिन जीयब ? ऊंहूं, हम आगे जाईब । चाहे कुछों होखे । केहू त सुनी हमार दुख दरद !

मंगर का दिने नन्हकू गमछी में चार गो फुटेहरी बन्हलें आ भोरहीं निकलि गइलें घर से । फुटेहरी बसिअउरा रहे । उहे दिन भर के भोजन रहे । मेहरारू से कहि के रातिये में बनवा लेले रहन । जाये के बा जिला प । एस पी साहेब केहें । बड़का साहेब हवें । जरूर दुख सुनिहें । बाल बाचा के देखिहs । माल गरू के सम्हरिह । लवटे में रात हो जाई । घबड़इह मत। ।

गाड़ी एक घंटा लेट रहे तबो ऊ समय से साहेब के दरबार में पहुंचि गइलें ।

पहिले त ऊंहवा के रोब दाब देखि के ऊ घबड़इलें संकुचलें बाकी फेनु सोचलें, का करिहें ! कवनों कोंका हवें कि लील जइहें । अदिमिये नू हवें । कुछ करिहें ना, त बान्हि ना नू दीहें । अनेरे हम डेराइल बानी । बड़का बड़का चोर डाकू आ हतेयारा त डेराते नइखन स । सोचते चलि गइवेंट साहेब के चेंबर तक ।

एगो सिपाही उहंवे रोकि दिहलस । "का बात बा ?"

"साहेब से उजुर लगावे के बा । गरीब आदमी हई। राघोपुर घर ह । साहेब बानी नू ?" नन्हकू डेराते डेराते पुछलें ।

"हं बाड़न । आधा घंटा बाद मिलिहें । अबहीं मिटिंग में बाड़न । बइठs बहरी बेंच प।"

नन्हकू बइठ गइलें, बहरी लागल बेंच प । देखें लगें चारों ओर । खूब सुंदर सुंदर फूल फुलाइल रहे । नीमन सुगंध गमकत रहे । अचके दिमाग चल गइल गांव घर का ओर । आपन जमीन । मड़ई । भंइस गरू । मेहरारू । नबोज लइका बुतरू । लूटन के पहिलकी बात । दुसरकी बात । फेनु लाठी पटकल कपार प । उनुकर बिस्वास घात । बलजोरी । सभ लउके लागल बइठले बइठल । एक दिन के मजूरी गइल मुफुते में आज । अइसन अइसन कतने दिन के मजूरी चल गइल । बंटइया के खेती बारी छूटिए गइल एही चक्कर में ।

तबहीं सिपाही कहलस, "जा जा, मिल ल । ना त साहेब चल जइहें कतहीं अउर ।"

नन्हकू हहुआइले उठलें आ साहेब के कोठरी में ढुकि गइलें । साहेब से सभ बात रो रो के कहि दिहलें । भोंकार पार के रोवहूं लगलें ।

साहेब के बिस्वास हो गइल । सही आ इमानदार आदमी बा । आगे के कारवाई करें के दिलासा दिहलें । "ठीक बा, तू जा, हम दरोग़ा से बात करत बानी । तहरा इंसाफ जरूर मिली ।"

नन्हकू के मन अहथिर हो गइल । बहरी आके फुटेहरी खइलें । चापाकल प चुरुआ से पानी पियलें । आ गावें लवटि अइलें ।

बीस बरिस बीत गइल । एह बीचे चार हाली भोट भइल । चार हाली सरकार बनल । एक दू हाली पलटा पलटी भइल । बाल बाचा सेयान हो गइलें । मेहनत मजूरी करें लगलें। मेहरारू बुढ़ा गइल । उहो बुढ़ा गइलें । अब इंसाफ मिली। तब इंसाफ मिली । एसी असरा में कलट्टर साहेब, एस पी साहेब, बी डी ओ साहेब, सी ओ साहेब सबके दुआर खटखटा अइलें । बाकिर ना जाने कवना गली में भुला गइल बा इंसाफ । इंसाफ के खोज में ऊ हरदम लागल रहलें । पेट काटि के अपना मेहनत मजदूरी के पइसा में से ओह लोग के सेवो सुसुरसा कइलें बाकिर आन्हीं के आगे बेना के बतास कवनो कामे ना आइल ।

थहरा गइलें नन्हकू । लइका फइका अनपढ़ रहि गइलें स । भागि गइलन स गांव छोड़ि के ।

बाकिर नन्हकू अबहियों बाड़न इंसाफ के असरा में । उनुका भीरी अब एकही विकल्प बा 'लड़ि मरे कि परि मरे !' बइठल बा इहे बात उनुका मन में । कपारे हाथ ध के सोचता बाड़न । अन्हरिया रात बा । सगरो उरुवन के बोली सुनात बा । कुछ देर पहिले लोग बाग के बोली सुनाते रहे । महुआ के नाशा में बड़बड़ात लोगन के बोली आ डंकरल सुनात रहे । अबहीं ढेर रात ना बीतल रहे । तबहूं पसरल रहे करिया कमरी ओढ़ ले रात के सन्नाटा ।

नन्हकू अचके उठलें । मेहरारू से कहलें , "घबड़इह मत , हम आवत बानी । एगो जरूरी काम क के ।" जबले मेहरारू कुछ पुछती, तब ले ऊ सरसरइले निकलि गइलें गांव के दखिन टोला का ओर, जेने रहेलन स बड़का बड़का खूंखार जीव ।

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सुरेश कांटक

सम्पर्क - कांट, ( ब्रह्मपुर ) बक्सर 802112 (बिहार )