दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )
फगुआ पर खास
निबंध
भगवती प्रसाद द्विवेदी
2/15/20261 min read


फगुआ पर खास
रीत गइल मन के फिचुकारी
रस - रंग कहवांँ पाईं ?
अलमस्त फागुनी महीना । सरसों आ टेसू के फूलन से सजल - संँवरल, बसंती चुनरी झमकावत, लहरात - बलखात प्रकृति रानी । धूरि - गरदा के गुबार लेले छेड़छाड़ करत उतपाती पवन के झकोरा । लखरांँव में आम के मोजर से टपकत मद - पराग । रस भरल महुआ के उज्जर - उज्जर मादक फूल । नयना में नेह जगावत पलाश, सेमर आ कचनार । कोइलर के 'कुहू - कुहू' के कूक । आलस के आलम । मन में फूटत बसंती कोंपड़ । का सचहूंँ फागुन आ गइल ?
बाकिर आजु काहें नइखे लउकत ऊ फागुनी नजारा ? आखिर कहवांँ हेरा गइल कन्हैया के इंद्रधनुषी रंग से लबालब भरल फिचुकारी ? काहें नइखी नजर आवत भींजल चुनरी में सकुचात - लजात राधा ? रंग - रंगीली फुहार का जगहा ई सुखार काहें ? एक - दोसरा से चुहलबाजी आ मीठ छेड़खानी ! भादों के भींजल तन - मन के सुखावे खातिर आंँचर के खोलि देबे के सलाह अब काहें नइखे देत कवनो रसिया ?
खोलि दऽ अंँचरवा, लागे घाम
भादों के भींजल बा जोबनवा !
बसंत पंचमिए से त समहुत हो जात रहे फगुआ गावे के । बिरज, बरसाना आ वृंदावन से अलगा हटिके भोजपुरिया होरी के आपन खासियत रहल बा । छकिके एक - दोसरा से रंग - गुलाल, अबीर खेले आ बहुरंगी फगुआ गावे के खासियत । फागुनी पुरनवासी आ चइत के पहिलके दिन ले ना,
बुढ़वा मंगर ले फगुआ - जोगीरा के सरसता परवान चढ़ेला । गवैया गोल के गोल ढोलक, झाल, झाझ आ डफ लेले निकलि परेलन । एक - दोसरा से चुहलबाजी करत, रंग - अबीर खेलत फाग राग अलापे में मस्त नर - नारी।
अइसना में केकरा फिकिर बा राह - कुराह के ! जदी जाने - अनजाने लौंग के कांँट गड़िओ गइल, त देवर आखिर कवना दिन - रात खातिर बाड़न ? ऊ त निकलबे करिहन । फेरु दरद के छूमंतर - अस भगावे वाला प्रियतमो त बाड़न -
चले के रहिया त चललीं कुरहिया से
गड़ि गइले ना,
लवंगिया के कंँटवा से गड़ि गइले ना !
देवरा ऊ कंँटवा निकलिहें ननदिया
से पिया मोरे ना,
से हरिहें दरदिया से पिया मोरे ना !...
सम्मत जरावे माने होलिका दहन के नायाब प्रतीकात्मक परिपाटी । माघ सुदी पंचमी का दिनहीं से बांँस - बल्ला, लकड़ी, गोइंँठा, फेंड़ - खूंँट के डाढ़, तेलहन के तिलाठी, खर - पतवार वगैरा
तय चौक चौराहा पर जमा करेके होड़ । चोरा - चोरा के जुटावल लकड़ी के ढेरी से शुभ मुहूरत पर अगजा जरावे के रसम । हवन सामग्री का संगहीं नवान्न - बूंँट के झेंगरी, गहूंँ के बाली, नीम के पतई आ लरिकन के उबटन लगवला से निकलल मइल के सम्मत में डालिके उठत धुआंँ के दिशा से नया सम्मत के शुभ - अशुभ के अंदाज । सरसों के तिलाठी बान्हिके मशाल जुलूस के शकल में जरत लुकाठी भांँजत गांँव के सिवान का बहरा फेंकि आइल आ सम्मत का बगल में बइठिके झलकूटन करत फगुआ गावे के मस्ती के का कहे के ! सम्मत जराके रोग - बियाध का संगहीं बैरभाव, मन के मइल, ईर्ष्या - द्वेष जइसन तमाम बुराई जरा दिहल गइली स । फेरु त मन चंगा हो गइल । दिल के कोना - अंतरा में लुकाइल काम - प्रवृत्ति मुखर हो उठल । आजु कवनो पाबंदी ना रहल । 'अररर भइया - सुनि लऽ मोर कबीर !' जोगीरा भा कबीर का जरिए अगर गारिओ दे देबऽ, त केहू अमनख थोरहीं मानी -
गारी के भइया हो, बुरा न मनिहऽ
होरी हऽ भई होरी हऽ !
धूरखेली आ रंगन के छटा का संगहीं कीच - कादो, धूरि - गोबर आ गारी - गलौज । बूढ़ का संगें जवान मेहरारू के देवर - भउजाई के नेह - नाता ।सूतल मनोभाव के जगावे आ उगिले के होड़ । दोसरा ओरि राधा - किसुन के परेम में पगल निश्छल होरी -
इत से निकली नवल राधिका
उत से कुंँवर कन्हाई,
खेलत फाग परस्पर हिलि - मिलि
सोभा बरनि न जाई
घरे - घरे बाजे बधाई
ब्रज में हरि होरी मचाई !
खाली अतने ना, खेलत किस्ना जी के गेना जमुना में गिर गइल ।
फेरु त ऊ जमुना में कूदि गइलन आ नदी में नहात राधिका के अँगिया में हाथ डालिके गेना खोजे लगलन आ खुश हो गइलन कि एगो गेना भुलाइल, बाकिर दूगो भेंटा गइल ! एने राधा परेशान कि उन्हुका पर चोरी के इल्जाम !
खेलत गेंद गिरे जमुना में
के मोरा गेंद चोराई,
हाथ डालि अँगिया बीचे ढूँढ़त
एक गयो दुई पाई
लाल मो पे चोरी लगाई,
ब्रज में हरि होरी मचाई !
रस भरल होरी में रसलोलुप पाखियन के उड़ान आसमान छूवेला । अगर सोझ - सपाट मरद घोड़ा बेचिके सूतल रही आ कवनो रसिया कागा यौवन - रस लुटला का संगहीं नकबेसरो लेके उड़न - छू हो जाई, त मेहरारू बेचारी का करी ! अइसन अभागा पियक्कड़ पति के नींन के अइसन - तइसन !
नकबेसर कागा ले भागा
सइयांँ अभागा ना जागा
उड़ि -उड़ि कागा कदम पर बैठा
जोबन का रस ले भागा
सइयांँ अभागा ना जागा !
मुंँह, आंँख, चुनरी - किछऊ त बाकी ना रहल । बसंती हवा के छुअन अंग - प्रत्यंग सिहरा देत बा राधिका के । ओहू पर श्याम के फिचुकारी के धार । राधा के हाल बेहाल ।
ऊ मने - मन निहाल होत कहत बाड़ी -'मत मारो श्याम पिचकारी !' जदी एहू प कान्हा नइखन मानत, त माई जसोदा से शिकायत करहीं के परी ।
बाकिर आजु ई कइसन बदलाव ? फागुन आके चुपचाप चलल जा रहल बा । एक ओरि किसिम - किसिम के आफत - बिपत, दोसरा ओरि आम अदिमी के तंगी - तबाही । सुरसा - अस मुंँह बवले महंँगी के मार आ दिमागी तनाव से त्रस्त समाज । तबे नू आजु नइखे फूटत आनंद के रससिक्त कऽ देबे वाला उद्गार - निश्छल भाव से फागुनी शुभकामना-
सदा आनंद रहे एहि द्वारे
मोहन खेले होरी !
कतहीं होलिका - दहने में हमनीं के हर्षोल्लास, उत्साह आ सांस्कृतिक चेतना के त ना जरा दिहलीं जा ? तबे नू नइखे फूटत सांँच मन से सिंगार के होली - गीत !
साइत हिरदया के फिचुकारी में अब रंगे नइखे बांँचल । दिल रसहीन हो गइल बा ।
फेरु का सिंगार, का हास, का हर्षोल्लास आ का होरी !
रीत गइल मन के फिचुकारी,
रस - रंग कहवांँ पाईं ?
आखिर कब तक हमनीं के नशा में धुत्त होके, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आयातित अपसंस्कृति में आपन सुध - बुध खो के गौरवान्वित होत रहबि जा ? कब लवटबि जा कुदरत आ कृत्रिमता से सहजता का ओरि ? आखिर कब मन परी जिनिगी से गहिरे जुड़ल आपन सांस्कृतिक धरोहर - होरी ?
तनी मुड़िके देखीं, जिनिगी में हर्षोल्लास, उमंग के इंद्रधनुषी रंग भरे खातिर होरी - फगुआ के मदमस्त चितवन राउर पीछा करत बा । तनी सम्हरि के - फागुन महिनवा आइल सुदिनवा -- !
भगवती प्रसाद द्विवेदी
सर्जना, सृजनशील कालोनी, बिस्कुट फैक्ट्री रोड,
निकट मगध आईटीआई, नासरीगंज, दानापुर,
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