दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )

सोंची कइसन गाँव रहे

कविता

अनिरुद्ध कुमार सिंह

12/14/20251 min read

सोंची कइसन गाँव रहे

बड़का बरगद के छाँव रहे,

सुख दुख बाँटें के ठांव रहे ।

बाबा चाचा के पाँव रहे,

बबुआ सुनला के चाव रहे ।

सुंदर कोमल स्वभाव रहे,

सब केहू के परभाव रहे ।

कनिया, दुलहिन बोलाव रहे,

भौजी से बहुत लगाव रहे ।

सोंची कइसन गाँव रहे‌ ।।

घर से हट दूर बथान रहे,

सटले बड़का खलिहान रहे ।

पुअरा मानी सुख खान रहे,

सूतल बैठल मुस्कान रहे ।

आई पंडी जी मान रहे,

हर पूजा नेग बिधान रहे‌ ।

पंडी जी के जजमान रहे,

बोलस जय हो कल्याण रहे ।

सोंची कइसन गाँव रहे ।।

मीठा चूड़ा जलपान रहे,

दूधे सानी नेवान रहे ।

लड्डु बतासा मिष्ठान रहे ।

भोज भात परधान रहे ।

डेहरी में भरल धान रहे,

दउरा में चाउर खान रहे ।

दउरी पीसल पीसान रहे,

डलिया, मौनी, सामान रहे ।

सोंची कइसन गाँव रहे ।।

पाहुन के कतना मान रहे,

बाहर भीतर गुनगुना रहे ।

ससुरारी मानी धाम रहे,

आते जाते परनाम रहे ।

का आन रहे, का शान रहे,

सगरे लागे की जान रहे ।

मिश्री से मीठ जुबान रहे,

जीवन में सदा उड़ान रहे ।

सोंची कइसन गाँव रहे ।।

अनिरुद्ध कुमार सिंह

धनबाद, झारखंड