दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )
तब देखावटी ना, दिल के रिश्ता होखे
कहानी
राजेश श्रेयस
12/28/20251 min read


तब देखावटी ना, दिल के रिश्ता होखे
जाड़ा रजाई में घुसे के खूबे कोशिश करत रहे । रजेसर जाड़ा के रोके खातिर कुल्हि जतन करत रहलन । रजाई के ठेहुना तक ले जाइ के खींच - खींच के लपेट - लपेट के जाड़ा के भगावे के उपाय करत रहलन ।
आसमान के सगरी तरई मैदान छोड़ के भाग गइली स । खाली शुकउआ भोर होखे के इंतजार करत रहे ।
भोरे भोरे चररर मररर के आवाज से रजेसर के ओहाँई खुल गईल । इ उँखी के कोल्हू से निकलल आवाज रोज भोरे - भोरे रजेसर के जगा दे । जगनू काका, अउरी माही बो काकी उँखी पेरे खातिर रोज भोरे - भोरे देवनंदन बाबू के कोल्हाडे़ आ जाए लोग । रजेसर के दुनो बैल कोल्हू के चारों ओर घोरियावे लागे । करीब एक कराह उँखी के रस आधा माधा ख़ौल के खदकही वाला रहल, कराहा के बरद माहिया छाँनत माही बो काकी के देखि के रजेसर बाबू, अनासे पूछी लिहले कि -
सुगनी के का हाल बा हो काकी ?
ठीके बे...बाबू ! कल्हिये ससुरा से आइल बिया ।
इतने बात कहिके, माही बो काकी अपना अंचरा से अपना आँखि के लोर पोछे लगली ।
रजेसर के लाग गईल कि कउनो न कउन बात त बा ।
जब उ खोदि - खोदि पूछे लगन त माही बो काकी सब कुछ बता देहली ।
सुगनिया के शादी लरकइये में हो गइल रहे । ब्याह के दिन बड़ा मुश्किल से माड़ो में बैइठ पवले रहे । ब्याह के दो - तीन गो रस्म पूरा भईल तबले उ सूत गईल रहे ।
ब्याह के बारह बरिस बाद गवना भइल त ससुरा गइल ।
बड़ी मुश्किल से छः सात महीना ससुरा में रहल होई, ओकर पहुनवा कल्हिये के ले के आइल बाड़़ ।
ए बाबू... सुगनी कहत रहे कि चले के बेरी ससुर जी कहले ह कि अगली बेर जे साइकिल लेके ना अइबू त घर में घुसे ना देब ।
रजेसर देवनंदन बाबू के अकेले लइका रहन । गांव के जमींदार के बेटा होइले के बावजूद उनका करेजा में मजदूर, मेहनतकस लोगन के खातिर बहुते जगह रहे । इहे कारण रहे कि बड़ से छोट ले पूरा गांव उनके बेटा जइसन जाने ।
दूसरे दिन सुबहे - सुबहे रजेसर बाबू, एगो नया हरक्यूलिस साइकिल लेके माही बो काकी के दुवरा पहुँच गइले । रजेसर बाबू के अपना दुवारा देख के सब केहू भौचकिया गइल । माही बो काकी बड़ा दुलार से रजेसर बाबु के बसखट पर बइठवली । डालिये में भेली के एगो टुकड़ा अउर एक गिलास पानी दे के अपना अंचरा से उनकर लीलार सोघरा के, दुलार करे लगली ।
उनके आंखि के सोझा लरिकाइ वाला देवनंदन बाबू के बबुआ लउकत रहले, जेके सरसों के तेल से माही बो काकी रोज - रोज मीस - मीस दुलारे ।
माही बो काकी रजेसर बाबू से पूछली कि, "ए बबुआ भोरे - भोरे एने कइसे आवे के भइल ह ?"
जबाब में रजेसर बाबू अतने कहले कि ए काकी पाहुन से मिले चलि अइनी ह । सोचनी ह कि सुगनीयो के देख लेब, अ पहुंनो से मिलि लेब ।
माही बो काकी बोलवली त, सुगनी के पहुँनवो आके उनके जरि बइठले ।
कुछ देर रुकले के बाद रजेसर बाबू पैदले अपना घर की ओर जाए लगन त, सुगनी बोल परल ।
ए माई..! रजेसर भईया से बोल द कि सइकिलिया ले ले जाए । बुझा ता कि सइकिलिया ले गइल भुला गइले ।
रजेसर इ कुल बात सुनत रहले । पांछे मुड़ के रजेसर बाबू जानबूझ के जोर से बोलले कि सुगनी के पहुँनवो सुन ले - ए काकी ! पाहुन से बोल दिह कि ये सइकिलिया के उ लेहले जईहे । लेकिन आज के बाद सुघरी से केहू ई बात ना बोली कि बिना साइकिल लेहले अईलू, त ससुरा ना अइबू ।
राजेश श्रेयस
