दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )

काल्पनिक दुनिया में भटक गइल भोजपुरी सिनेमा के गाड़ी

भोजपुरी सिनेमा

अमित कुमार पाण्डेय

7/31/20251 min read

काल्पनिक दुनिया में भटक गइल भोजपुरी सिनेमा के गाड़ी

भोजपुरी के पहिला फिलिम 'गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो' भोजपुरिया माटी के लाल पहिला राष्ट्रपति राजेन्द्र बाबू के आशीर्वाद और नजीर हुसैन आ विश्वनाथ शाहबादी के भागीरथ प्रयास से 1962में बनल रहे । ओकरा बाद से भोजपुरी सिनेमा उत्तर भारत के बड़हन दर्शक वर्ग खातिर मनोरंजन के प्रमुख स्रोत रहे । आपन प्रामाणिक लोक संस्कृति, सुरीला संगीत आ स्थानीय कहानी के आधार पर ई एगो अनूठा पहचान बनवले रहे । हालांकि पिछला कुछ दशक में भोजपुरी सिनेमा अपना जड़ से भटक गइल बा आ जमीनी हकीकत से परहेज करत देखल जाला, सतही आ निम्न गुणवत्ता वाला मनोरंजन के कारण कबो समाज के दर्पण रहल ई सिनेमा आजु अक्सर वास्तविकता से दूर, काल्पनिक आ तर्कहीन दुनिया में भटकत लउकत बा ।

एगो समय रहे जब भोजपुरी फिल्मन में ग्रामीण जीवन, पारिवारिक संबंधन के जटिलता, सामाजिक बुराई आ आम आदमी के संघर्ष के प्रामाणिकता से चित्रण कइल जात रहे । 'गंगा मईया तोहे पियरी चढ़ईबो', 'बिदेसिया', 'हमार संसार' आ ''गंगा किनारे मोरा गांव' जइसन शुरुआती फिलिम दर्शकन के ना खाली मनोरंजन करत रहे बल्कि समाज के हकीकत के भी देखावत रहे । एह फिलिमन में लोक स ति के जीवंतता, पारंपरिक मूल्यन आ आम आदमी के रोजमर्रा के जिनिगी के झलक मिलत रहे जवना से दर्शक आसानी से जुड़ सकत रहलेय । बाकिर धीरे-धीरे भोजपुरी सिनेमा में गुणात्मक गिरावट आइल बा । कहानी में नवीनता के कमी,तकनीकी पहलू में पिछड़ापन, अश्लीलता के बढ़त प्रभाव आ प्रस्तुति में दोहराव लउके लागल ।

आज के अधिकांश भोजपुरी फिलिम वास्तविकता से दूर, एगो काल्पनिक आ तर्कहीन दुनिया में अझुराइल बाड़ी स,जवन ना त समाज के असली तस्वीर देखावेले, ना आम आदमी के जीवन के कवनो प्रामाणिक झलक देले । भोजपुरी सिनेमा के जमीनी हकीकत से मुँह मोड़े के पीछे कई गो कारण बा, जवन एक दोसरा से जुड़ल बा आ एह इंडस्ट्री के वर्तमान दिशा तय करेला । एकर सबसे बड़ कारण बा फिलिमन के क्वालिटी में भारी गिरावट । अक्सर देखल जाला कि भोजपुरी फिलिम बहुते कम बजट में आ हड़बड़ी में बनेला, जवना में कमजोर पटकथा, खराब संपादन, निम्न स्तर के छायांकन आ खराब वीएफएक्स के इस्तेमाल होला । निर्माता लोग क्वालिटी सिनेमा बनावे से बेसी जल्दी मुनाफा कमाए पर ध्यान देत बा जवना के नतीजा बा कि फिलिमन में रचनात्मकता आ गहराई के कमी होला । आज के अधिकतर भोजपुरी फिलिम फिक्स फार्मूला पर आधारित बाड़ी सन । प्रेम त्रिकोण, पारिवारिक झगड़ा (अक्सर तर्कहीन आ मेलोड्रामा), बदला आ अपराध जइसन विषय के अलग-अलग रूप में बार-बार प्रस्तुत कइल जाला बाकी एकरा में नवीनता, मौलिकता आ सामाजिक प्रासंगिकता के कमी बा। सामाजिक मुद्दा, समकालीन चुनौती आ आम आदमी के असली समस्या पर बहुत कम फिल्म बनल बा । सबसे बड़ा चिंताजनक रुझान भोजपुरी सिनेमा में फूहड़ता आ अश्लीलता के बढ़त प्रभाव बा । कई गो फिलिमन में बेवजह दोहरा मतलब वाला संवाद, फूहड़ गीत आ आपत्तिजनक दृश्य देखावल जाला जवना के दर्शक खास कर के पारिवारिक दर्शक नापसंद करेलें । एहसे सिनेमा के गुणवत्ता त घटते बा बलुक समाज में ओकर छवि भी कलंकित हो जाला । मनोरंजन के नाम पर परोसल ई अश्लीलता वास्तविकता से बहुते दूर होला आ सस्ता लोकप्रियता हासिल करे के कोशिश करत लागेला । भोजपुरी सिनेमा अन्य क्षेत्रीय सिनेमाघरन (जइसे तमिल, तेलुगु, मलयालम) के तुलना में तकनीकी रूप से पिछड़ल बा ।

आधुनिक तकनीक, जइसे कि उच्च गुणवत्ता वाला कैमरा, बेहतर साउंड डिजाइन आ प्रभावी वीएफएक्स, के इस्तेमाल फिलिमन में बहुत कम होला । सीमित बजट आ प्रशिक्षित तकनीशियन के कमी का चलते फिलिमन के तकनीकी पहलू कमजोर बनल बा जवना से दर्शकन के अनुभव पर असर पड़ेला । भोजपुरी फिलिमन के अक्सर बड़का सिनेमाघरन आ मल्टीप्लेक्सन में उचित एक्सपोजर ना मिलेला द्य सीमित वितरण नेटवर्क आ सिंगल स्क्रीन थियेटर पर भारी निर्भरता के कारण ई व्यापक दर्शक वर्ग तक ना पहुँच पावेला । एकरे नतीजा बा कि निर्माता गुणवत्ता सुधारे आ अधिका दर्शकन तक पहुचे खातिर कोशिस भी ना करेले । कलाकारन के दोहराव आ ओवर एक्टिंग भी एमे बड़ कारण बा । भोजपुरी सिनेमा में अक्सर कुछ कलाकारन के बोलबाला होला, जे लगातार एके जइसन भूमिका निभावत देखल जालें । कई बेर कलाकारन के ओवरएक्टिंग भी दर्शकन के निराश कर देला आ सिनेमा के अविश्वसनीय बना देला । नया आ प्रतिभाशाली कलाकारन के मौका ना मिलला का चलते सिनेमा में ताजगी आ नवाचार के कमी बा । एगो जिम्मेदार कला माध्यम होखला के नाते सिनेमा के समाज पर बड़ा असर पड़ेला ।

हालांकि भोजपुरी सिनेमा अक्सर अपना सामाजिक जिम्मेवारी से परहेज करत लउकेला । अंधविश्वास, जातिवाद और महिला के प्रति नकारात्मक रवैया के बढ़ावा देवे वाला सीन फिल्म में भी देखाई देता,जवन कि समाज खाती नुकसानदेह बा । भोजपुरी सिनेमा के जमीनी यथार्थ से दूर रहला से और लोगन के समस्या, आकांक्षा ना दिखाई देला के चलते दर्शकन के जुड़ाव खतम हो जाला । कबो अपना लोक संस्त आ परम्परा के वाहक भोजपुरी सिनेमा अब अक्सर पाश्चात्य आ अउरी क्षेत्रीय सिनेमा के नकल करत देखल जा रहल बा । एकरा चलते एकर अनूठासांस्कृतिक पहचान क्षीणहो रहल बा । हालांकि भोजपुरी सिनेमा के सामने एह घरी बहुते चुनौती बा बाकिर एकरा पुनर्जागरण के संभावना आजुओ मौजूद बा । कुछ निर्माता निर्देशक आ अभिनेता अइसनो बाड़े जे बढ़िया आ क्वालिटी वाला फिलिम बनावे के कोशिश में लागल बाड़े । एह इंडस्ट्री में युवा प्रतिभा भी आ रहल बाड़े जे नया सोच आष्टिकोण से काम कइल चाहत बाड़े। ए फिल्मकारन में नितिन चंद्रा,अवधेश मिश्रा और उज्जवल पांडेय के नाम प्रमुख बा ।

भोजपुरी सिनेमा अपना समृद्ध सारेंतिक धरोहर आ बड़हन दर्शक वर्ग का बावजूद एह घरी जमीनी यथार्थ पर आँख मूद केएगो खोखला मनोरंजन उद्योग बन रहल बा द्य गुणवत्ता के अनदेखी कइल, कहानी के कमी, अश्लीलता के बढ़त प्रभाव आ तकनीकी पिछड़ापन जइसन कारण एह सिनेमा के दर्शकन से दूर कर दिहले बा द्य बाकिर अगर निर्माता, निर्देशक आ अभिनेता अपना गलती से सीख लेत बाड़े आ गुणवत्ता, नवाचार आ सामाजिक जिम्मेदारी पर ध्यान देस त भोजपुरी सिनेमा एक बेर फेर से आपन खोवल पहचान वापस पा सकेला । आज जरूरत बा सिनेमा के वास्तविकता के नजदीक ले आवे आ ओकरा के एगो सार्थक आ मनोरंजक कला माध्यम के रूप में स्थापित करे खातिर सामूहिक प्रयास के । ना त जमीनी यथार्थ से पीठ फेरे वाला ई सिनेमा धीरे-धीरे आपन चमक खो दी आ इतिहास के पन्ना तक सीमित रह जाई !

अमित कुमार पाण्डेय

एम. ए. ( फिल्म एवं थिएटर ) गोल्ड मेडलिस्ट

इलाहाबाद विश्वविद्यालय

नेट ( थिएटर स्टडीज )

सचल दूरभाष - 8738882211