दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )
चिन्ता
गीत
अनिल ओझा 'नीरद'
7/22/20251 min read


गीत
1. चिन्ता
चिन्ता में, दुख में जो कबहीं, हंसी फूटि जाइत ।
छन भरि खातिर सही, तबो ई लड़ी टूटि जाइत ।।
बरखा वाला बादरि, रेगिस्तान में जो छाइत ।
मृग छौना कुलांच भरिते, आखेट ना हो पाइत ।।
भगजोगनी आपन अन्हार, अपने बनाइ लेइत ।
कबो भुलाइयो के लोग मुंह से, सांच बोलि देइत ।।
पानी परित, मोर मन माटी नियर, महकि जाइत ।
जगह-जगह के धूरि, भींजि के, सोन्ह गमकि जाइत ।।
सिकड़ी के खड़-खड़ सुनि के, दरवाजा अगराइत ।
काश ! कि आपन बनि के केहू, हमरा घर आइत ।।
इन्द्रधनुष के सातो रंग, अंखियनि में करित किलोल ।
मन, भंवरा अस गाइत बगिया, कली-कली पर डोल ।।
काश ! कि दुख में केहू आपन, अइसे आ जाइत ।
बिना खेल में जितले, मन ई, पदक पाइ जाइत ।।
काश ! कि जिनिगी में दुख के, दुपहरिया ना आइत ।
काश ! कि दुखवो में मन, चुनरी अइसन लहराइत ।।
घर, दरवाजा, खिरिकी, चिरई जइसन बतिअइते ।
दुनिया के हर रिश्ता, फेंड़-गिलहरी बनि जइते ।।
नदिया के कल-कल धारा, संगीत सुना जाइत ।
घाही मन, पहाड़ से गीरत, झरना बनि जाइत ।।
चिन्ता में, दुख में जो कबहीं, हंसी फूटि जाइत ।
छन भरि खातिर सही, तबो ई लड़ी टूटि जाइत ।।
2. कहां कहां ना रहेलू तूं ??
हे जन जन के पीरा बोल, कहां कहां ना रहेलू तूं ?
दर्द तोहार जे सहचर हउवे ।
रिश्ता ओह से लमहर हउवे ।।
कुंठा, घुटन दबा के भीतर --
नयनन से बस बहेलू तूं ।।
कहां कहां ना रहेलू तूं ?
इन्तजार के बोझिल छन में ।
अउर मिलन के मातल मन में ।।
आतुर अतना अधर हो जाला--
पीरा भरि बस कहेलू तूं ।।
कहां कहां ना रहेलू तूं ?
मुंह ना खुले, नयन खुलि जाला ।
लोर, नदी निर्झर बनि जाला ।।
दुइ-दुइ पाटन के बंधन में --
कसमसाइ कुल्हि सहेलू तूं ।।
कहां कहां ना रहेलू तूं ?
कबो-कबो त बोझ उतार ।
जीनिगी बा अनमोल संवार ।।
पीरा के मुस्कान बना के --
काहें कबो ना हंसेलू तूं ।।
कहां कहां ना रहेलू तूं ?
हे जन जन के पीरा बोल, कहां कहां ना रहेलू तूं ??
अनिल ओझा 'नीरद'
28/4 भैरवदत्ता लेन,
नंदीबगान, सलकिया, हावड़ा.
सचल दूरभाष - 9830057686
