दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )

चुप्प बुरबक

कहानी

रिंकी सोनी 'आतिशी'

12/11/20251 min read

चुप्प बुरबक.

छुटन : का रे मंगला ई तोहार सुपुत्र कहां बारे ?

मंगला : (मंगला चुहानी लिपत जवाब देहली) होई एही कहीं, चमकिलिया (बिल्लू की बहिन) जोरे खेलतऽ होई ।

छुटन : का करि हम ई अमानुष के, समझा के थाक गइल बानि, जइसन माई ओहिसन बेटा । दुनो ढ़ीढ़

बलवंत (बिल्लू) के बाबू, खीझते हुए हाट चल गइले ।

बिल्लू : ए माई केने बारू हो...?

मंगला : का रे बबुआ, केने रहलअ हा, बाबूजी खोजत रहले, आखाड़ा जाए खाती ।

बिल्लू : ए माई केतना बेरा कहनी, हमरा से कुश्ती ना होई । हमरा बड़ होके मेकअप आर्टिस्ट बने के बा ।

मंगला : ह बबुआ, जऊन मन होई ऊ बन ।

बिल्लू : ( चहकते हुए रूक के ) पर बाबूजी, माई ?

मंगला : समय आवे पर सब सही होई, जाई, तोहार बहिन केने बिया बबुआ, बाबूजी कहले हा, सिलाई सेंटर में दाखिला करवावे खातिर ।

बिल्लू : हकबकाके बोलले, एनही कहीं होई

मन में सोचत रहले दीदियाँ त कब्बडी प्रैक्टिस खातिर गइल बारी, लेकिन माई - बाबूजी के पता ना चले के चाहीं अभी ।

मंगला : अबकी ओकर दसवीं खत्म होत बा, सिलाई आऊर कामकाज सीख ली, बाबूजी शादी के तैयारी में लाग गइल बारे

बिल्लू : का माई, अभी शादी । दीदियाँ आगे आऊर पढ़ी

मंगला : का होई पढ़ के, आखिर घर बार ही संभाली नू, डिग्री राखल रह जाई, हमहुँ त चीट्ठी भर पढ़ल बानी कऊनो कमी कइनी तोहार दुनो के परवरिश में ।

बिल्लू : ना हो माई, ई हम कहां कहतऽ बानि ।

समझ गइल बहस करला पे माई खिसियाँ जइहें

मन में ढृढ़ता से कहतऽ भले दीदियाँ नौकरी ना करे लेकिन पढ़ाई लिखाई जीवन भर काम आई, आ ऊ त स्कूल में हेतना अच्छा कब्बडी खेले ली, समय आवे पर सब मेडल जऊन दीदियाँ पुआल में लुकववले बारी देखा देहम । लेकिन पढ़ाई ना छोड़े देहम ।

(चमकीली घर में घुसते हुए) : ए माई तनी कुछ खाए के दऽ ।

का बिल्लू हंसते हुए, कुस्ती कइलऽ ?

बिल्लू : का दीदियाँ तुहू

(धीमा आवाज में , बाबूजी आगइलन)

छुटन : मंगला - बलवंत का होता हो ? आज दुकान के प्रचार के बैनर बनवावे गइल रहनी निर्मल के बिटवा चटे ऊ नवका तकनीक लगाके, का तो कहलस रहे ऊ ई आई शायद ।

बिल्लू बीच में बोलते हुए, एआई बाबूजी ।

छुटन : ह ह, ठीक कहले, नया दौर के साथ चलल जरूरी हो गइल बा । (बिल्लू के दिमाग में शादी आऊर मेकअप आर्टिस्ट वाला बात चलतअ रहे)

खाना पीना खइला के बाद सब लोगिन सुते चलल

चमकीली : बिल्लू एगो दिक्कत बा

बिल्लू : ( चिंता के साथ) का भइल दीदी, प्रैक्टिस में कऊनो बात हो गइल या कोई तोहरा परेशान कइलस ?

चमकीली : ऊ आज सर बतवले ह कि कबड्डी के स्टेट लेवल के गेम होखे वाला बा, ओहिजा सलेक्ट होला पर नेशनल लेवल पर । सर के पूरा भरोसा बा कि हम आगे जा सकिला ।

बिल्लू : (हौसला बढ़ावत) ह दीदी तू जरूर सफल होइबु ।

चमकीली : उदास मन से... लेकिन बबुआ !

बिल्लू : तू परेशान मत होखअ, हम बात करब सवेरे ।

बिल्लू: (सुबह सुबह उठ के) ए बाबूजी ! चलि अखाड़ा कुश्ती करे ।

बाबूजी अभी बिस्तर पर ही रहले । बिल्लू के आवाज सुन के, "का हो मंगला ! आज सूरज बाबा पश्चिम से आइल बारे का ? मने - मने खुशो हो रहलन ।बबुआ लाइन पर आ गइल लागत बा । हमार इच्छा रहल कि एक दिन इ बड़का रेसलिंग चैपिंयन बने ।

छुटन : चल बलवंत, आज तोहरा शंभू काका से मिलवाइम बहुत नाम बा उनकर रेसलिंग में

बिल्लू : बाबूजी एकगो बात कहीं, हमरा मेकअप आर्टिस्ट बनेके बा, रेसलर ना ।

छुटन : चुप्प बुरबक, माथा घूम गइल होऊ का रे । इ सब लइकिन वाला काम बा ।

(बातचीत करत अखाड़ा पहुंचलन । फिर घर आ के गाय के चारा पानी के काम में लाग गइलन )

बिल्लू : ए बाबूजी पुआल ले आईं, कुटी काटल जाए ।

छुटन : अच्छा, रूक । अरे ई कऊना के ह रे ।

बिल्लू : उछल कर, का बाबूजी ?अच्छा । ई मेडल दीदी जीतल बिया ।

छुटन : (चौक गइलन) कइसे, कब ?

बिल्लू : दीदी कबड्डी में जीतल बारी, स्कूल में ।

छुटन : कबड्डी ? आऊर लइकी खेलेली ? तू दुनो, हे भगवान ।

चमकीली के आवाज दे के बोलावल गइल ।

चमकीली : का बाबूजी, तू स्कूल पढ़े खातिर जालिस कि हाफ पैंट पहिन कबड्डी खेले, कुछ ऊंच नीच हो गइल त, शादी बियाह में केतना दिक्कत आई, आज काल नवका जुग में सोशल मीडिया पे रोज ऊटपटांग खबर आ तस्वीर फैलत रहेला ।

दोनों भाई बहिन बाबूजी के समुझावे के कोशिश में लाग गइले ।

बाबूजी पहिले के जमाना गइल हइ काम लइका करि, हइ लइकी । आजकल जेकरा में जवन गुण बा ऊ उहे काम करत बा। अपन गाँव में ही केतना लोगिन मिल जाई जे बिना समाज और गलत सही बोले वाले के सोचे, अपन मन के काम करत बा लोगिन, फिर हमनी के काहे ना ?

बिल्लू : ए बाबूजी, रऊआ त एआई के तारीफ करत रही ऊहू त नवका दौर के चीज बा ।

छुटन : तू त चुप्प रह बुरबक, ढेर दिमाग मत लगाउ ।

( बहुते देरी ले अइसही तीनों के बीच खूब बात भइल )

आखिर में बाबूजी के दुनो भाई बहिन मना लिहले ।

आगे बलवंत मेकअप आर्टिस्ट बनेके और चमकीली नेशनल चैंपियन बनके आपन परिवार के नाम गौरवान्वित कइलस लोग ।

(रूचि के काम अगर करे दिहल जाए त हर बच्चा अपन जीवन में बेहतर कर सकेला)

रिंकी सोनी 'आतिशी'

आरा, बिहार