दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )
छठ विशेष
लोकमहापरब के सकारात्मक सोच
भगवती प्रसाद द्विवेदी
12/7/20251 min read


छठ विशेष
लोकमहापरब के सकारात्मक सोच
डूबत सुरुज माने बूढ़-पुरनिया के पूजे के परिपाटी
बिहार-झारखंड से लेके पूरबी उत्तर प्रदेश ले आ देस-विदेस के जवना-जवना कोना-अंँतरा में एह इलाका के मनई चहुंँपल बाड़न, उहवांँ-उहवांँ जन-मन में पइसल लोकपरब छठ के धूम देखते बनेला ।एह लोकपरब के निघिचा आवत कहीं कि सउंँसे वातावरन अपने-आप छूमंतर-अस बदलि जाला ।एकाएक लोगन के बात-बेवहार आ विचार में बदलाव लउके लागेला ।आपुस के बैर-भाव भुलाके, एक-दोसरा से मिलि-जुलिके घर-दुआर से लेके गली-कूचा, सड़क-पगडंडी आउर नदी-पोखरा-कुंड-दरियाव के घाटन के साफ-सफाई में सभे बढ़ि-चढ़िके हिस्सा लेबे लागेला ।सड़क छाप गुंडा-मवाली, लंपट आ शहरी दद्दो लोगन के दिल रातोरात बदलि जाला आ सड़क-गली में रोशनी-पानी ,सफाई-सजावट आउर छठ बरत करेवाला नर-नारी के सहजोग-सेवा में उहो लोग मिशनरी भाव से लवसान हो जाला ।रात-बिरात कतहीं आवे-जाए में कवनो डर-भय भा अहस ना लागे ।गहना-गुरिया से लदाइल मेहरारुन के ना केहू छेड़े के जुर्रत करेला, ना छीने-झपटी के कवनो घटना होला ।जनता-जनार्दन के भीड़ के सैलाब जब उमड़ेला, त पुलिसो-प्रशासन कमर कसिके मुस्तैद हो जाला आ सरकारो के धियान अधिका-से-अधिका सुविधा देके शोहरत बटोरे में लागि जाला ।
छठ एहू माने में लोक के महापरब हऽ कि एह में पंडित-पुजारी आ तंतर-मंतर के कवनो जरूरत ना परे आ सरधाभाव से गावल छठी मइया के गीत आउर मरद -मेहरारू के आंँतर के भाखल भखौटी, दिल से फूटल बानी पूजा-पाठ आ मनौती बनि जाला ।जापर जाकर सत्य सनेहू, सो तेहि मिले, न कछु संदेहू ' के भाव इहांँ हू-ब-हू लागू होला ।उगत सुरुज के त सभे अरघ देला, बाकिर इहे एगो अइसन परब बा, जवना में उगत भगवान भास्कर का पहिले अस्ताचलगामी (डूबत)सुरुज के अरघ देके अन्हरिया से अंँजोरिया का ओर बढ़ेके सबक दियाला ।
दोसरा माने में, सभसे पहिले डूबत माने बूढ़-पुरनिया, दीन-दुखिया के खोज-खबर लेबे, सेवाटहल करे आउर पूजे के परिपाटी बनल रहे के चाहीं ।
का छोट, का बऽड़,का धनी, का गरीब---सभकरा माथ पर दउरा, देह पर पीयर बहतर, बाकिर गोड़ में जूता-चप्पल किछु ना ।केहू डेगरगर बढ़त बा, त केहू भूँइपरी परत जा रहल बा ।सउंँसे माहौल सरधा, बिसवास आ अध्यात्म का रंग में सराबोर बा ।चारू ओर विनयी भाव से गूँजत छठी मइया के गीत -'काँचहिं बाँस के बहँगिया,बहँगी लचकत जाय/ बाट जे पूछेला बटोहिया,बहँगी केकरा के जाय/ तें का आन्हर बाड़े रे बटोहिया, बहँगी छठीय माई के जाय...!' ई आ अइसने पारंपरिक गीतन में छठी माई के महिमा आ सुरुजदेव से विनती। सउँसे संसार में उजियार भरे के निहोरा।
एकरा पहिलहीं नदी से गंगाजल ले आके घर-दुआर के आ तन-मन के कोना-अंँतरा ले पवित्तर कऽ लिहल गइल बा ।नहाय-खाय का दिने नदी में नहाके अरवा चाउर के भात, बूंँट के दाल, लउका के तरकारी खाके, अगिला दिने खरना में रोटी-खीर के
परसादी पाके निरजला छठ भूखेके सात्विकता हासिल कऽ लिहल जाला ।जइसन खइबऽ अन्न, ओइसने होई मन!
इहो बात खास तौर से रेघरिआवे जोग बा कि छठ के मउसम आवते भोजपुरी के फूहर, अश्लील, दुअर्थी गीतन के विदाई हो जाला आ घर-अंँगनई से लेके सड़क पर धमा-चउकड़ी मचावत टेम्पो-ट्रक-बस ले---सभे जगहा खाली छठिए के भक्तिभाव से भरल गीतन के पावन सुर गूंँजे लागेला ।चारू ओर छठी मइया के महिमा आ धरम-करम के अनुगूंँज ।एकरा खातिर केहू के जोर-जबरजस्ती ना होला ।सभ केहू अपना अंतरातमा के पुकार सुनिके अइसन करेला ।भितरे-भीतर एह बात के डरो रहेला कि नियम-कायदा से खेलवाड़ करेवाला के तुरंते एकर खामियाजा भोगे-भुगुते के परि जाला ।सुरुजदेव आ छठी मइया के कोप के भला के शिकार होखल चाही! एही से एह घरी सभे नीमन आ शाकाहारी बनिके सतकरम कइल चाहेला ।जइसन नेति, ओइसन बरक्कत!
जे कवनो कारन से छठ बरत ना करे, ऊहो एह मोका प सेवा आउर सहजोग कइल जरूरी बूझेला ।चउक-चउराहा पर शिविर लगाके ब्रती मेहरारुन में केहू नरियर बांँटेला, त केहू अउर फल-फलहरी भा पूजा-पाठ के सरंजाम - अगरबत्ती, दूध वगैरह ।हरेक जगहा सामूहिकता आउर नीमन काम सतकरम के भाव देखते बनेला ।जाकी रही भावना जैसी,छठ मूरत देखी तिन तैसी!
कोरोनावायरस के जवना घरी परकोप रहे,तबो लोग छठ कइल ना छोड़ल आ मास्क लगा के भा दैहिक दूरी बनाके पूजा कइल,जवना से कि सभका हित में महामारी बिलाउ।बाकिर एने किछु बरिस से कई गो संभ्रांत लोग नदी-दरियाव के तिरवाहीं गइला का जगहा अपना घरे के छत पर अरघ देत आ रहल बा ।एह तरी भलहीं शारीरिक परेशानी से किछु मुकुती मिलत होखे, बाकिर लोक आउर समूह से जुड़ाव के मकसद भला कहवांँ पूरा होत बा? महामारी का चलते एक-दू साल के बात किछु अउर रहे ।ओहू कठिन समय में ई पूजा बन्न ना भइल, इहे बऽड़ बात रहे।भितरी भाव इहे रहे कि आखिर छठिए मइया आ सुरुजदेवे नू एह दुनियावी महामारी से मुकुती दियवइहन ! नहाय-खाय,खरना से लेके डूबत,उगत सुरुज के अरघ दिहला ले - लगातार चार दिन के ई निरजला बरत सभका बस के बात ना होला,बाकिर छठी माई आ सुरुजेदेव के किरिपा-परताप से लरिका से सेयान ले,बूढ़ से जवान ले - सभे केहू नेत-धरम , आस्था-बिसवास आउर हँसी-खुशी से लोक के एह महापरब में आपन-आपन भूमिका निबाहेला। सभकर मनोरथो पूरा होला। जै छठी माई,जै दीनानाथ!
मनोरथ पूरन भइला पर कोसिओ भराला आ छठी मइया के किरिपा बरिसवला खातिर आभार परगट कइल जाला।
अगर हमनीं के सालों भर छठ के मानसिकता बनवले रखितीं जा आ डूबत सुरुज लेखा बूढ़-पुरनिया बाप-महतारी के इज्जत-मान दिहितीं जा, त एक-दोसरा से भाई-चारा-मिल्लत के इंसानी भाव बरक्कत पावत रहित, वातावरन कतना पाक-साफ रहित आ साझा संस्कृति में मए बैर-बुराइयन के समूल नाश हो जाइत ।का एह लोकपरब छठ के सकारात्मक सोच आ पाक-साफ वातावरन खाली छठिए-भर सिमटि के रहि जाई?
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भगवती प्रसाद द्विवेदी
सर्जना, सृजनशील कालोनी, बिस्कुट फैक्ट्री रोड,
निकट मगध आईटीआई, नासरीगंज, दानापुर,
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