दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )

चमकत चनरमा के जोती

कहानी

डॉ शिप्रा मिश्रा

2/15/20261 min read

चमकत चनरमा के जोती

आज हम बड़ा खूस बानीं । पूछीं काहें ?

हमरा ग‌ऊंँआ में एगो बियाह बा.. मलिकाइन कीहां । क दिन निमन से ख‌ईला भ‌ईल बा । आजु राति ओही जा जाएम । पहिले से ना जाएम त ओहू जा बड़ा मारामारी बा । अधेसरा, नौलखिया, बटुलिया, सिकनरा.. पहिलही से बोरा - झोरि ले के ब‌ईठल रहेलें सन । सुने में आईल ह कि मछरी के भोज - भात बा । केतना मूड़ा पछिला बेर बिगाईल रहे । दू दिन मतारी बेटा ख‌ईनीं सन । सरधवा त ख‌ईबे ना करेले । लागेले चिघरे - "आई हो दादा ! कांँट गड़ता ।"

काल दोकाने कार करे ना जाएम । तनिको कुछू गबडा़एला त बड़ा मारेलन सेठ‌ऊ । बाकिर उपाए का बा ! हमार बाबू त कहियने ओरा ग‌ईलें । दारू - ताड़ी पीयत पीयत टीबी उपटा लेहले रहलन । माई गहना - बीखो बेंच - बेंच केतना ओझा - गुनी क‌ईलस तबो लिलार के टिकुलिया ना बाचल ।

भोजवा में क गो चीज लोग बीगेला - पूड़ी, तकारी, जुठियावल इमिरती, मछरी । क दिन निर‌ईठ अन ख‌ईले भ‌ईल बा । सगरी जवार गमकता । आजु भोरहीं से जीभ पनियाईल बा । रसवा त सारे बह जाला तबो दू दिन ले खानी सन । ओतनो खतिरा सिपहियन के ख‌ईनी खियावे के परेला । बाकिर क‌वनो उपाए न‌ईखे ।

ओही से आज हम बड़ा खूस बानीं । आजन - बाजन बाजता काले से । मा‌ई ग‌ईल बीया हरदी कूटे । पांँच रोपेया नेछावरो मिलल ह ।

माई दिन - दिन भर ग‌ऊंँआ में फटकल - चालल करेले । कबो - कबो खुद्दी - उद्दी ले आवेले । दू - चार दिन डभका के चल जाला । जहिया दोकनिया प ना जानीं तहिया अईंठा केकड़ा बिन ले आवेनी । कबो - कबो सिधरी, पोठियो भेंटा जाला ।

जानतानीं ! हमरा दोकनिया पर जाएके मन ना करेला । सेठ‌ऊ बड़ा लप्पड़ चलावेलन । कनबजा भड़का देवेलन । क‌ए दिन ले कनवा बिसबिसात रहेला । कहियो कहियो त घरे लेले चल जालन । बरतन मजवावेलन, झाड़ू लगवावेलन । बड़ा बिपत बा । जानतानी हमरो मन करेला पढ़े जाईं, खूबे खेलीं, गाछी पर चढ़ीं । बाकिर का करीं ! हमरा भगिये में जूठ - कांँठ लिखा ग‌ईल बा ।

मा‌ई बड़ा हूक में रहेले । सरधवा के रहे रहे भूत उपट जाला । उखिन - बिखिन करे लागेले । माई कहेले ए मुंँहझ‌ऊंसिन से के बियाह करी ! एक दिन सहरिया से सेठ‌ऊ एगो आमदी लेके आईल रहलन । ऊ अमदिया कहत रहे -"ए बेटी का बियाह हम से करवा दो ! बहुते प‌ईसा देगा ।"

मने माई त ठान देहलस -"हमरा ना धन जुरी त हम ए छ‌ऊडी़ के ईनार में बीग देब बाकिर तोहरा से त कहियो ना बियहेब अभग‌ऊ !"

हम त भकचका के ताकते रह ग‌ईनीं । हमरा त बुझाईल कि माई बियाह करी त प‌ईसा मिली । कुछ दिन तनी हिक भर खाईल पियल जाईत । बाकिर बाद में मतारी बड़ा समझवलस ।

हम आज बड़ा खूस बानीं । दू दिन से दोकनिया पर न‌ईखीं जात । भोजवा में से बड़ा चीज ले आईल बानीं । पत्तल झार - झार के । ओमे एगो बड़ी बड़का आमदी आईल रहे । कहत रहे -"का कचरा बीन रहा है ! स्कूल केओं नहीं जाता ? तुम केतना बसा रहा है ? नहाता नहीं है रे !"

हम का कहें.."द ना सबुनिया किन के ! तबे नु नहाएगा ! पहिले खाएंँ आकि नहाएंँ !"

ऊ आमदी बड़ा निमन रहे । हमरा के घरे बोलवलें । कहलें कि माई के संगे आव बिहान ।

हम आजू बड़ा खूस बानीं । पूछ काहे !

अब हम स्कूल जाएम । माई के ओही स्कूलिया में भात बनाए के कार मिल ग‌ईल बा । आ सरधवो के पढ़े के सुविस्तो हो ग‌ईल बा ।

साचों काका आजू हम बाड़ा खूस बानीं । अब हम लखेरा ना बनेम । अब हम जूठ - कांँठ ना बटोरेम । अब हमार देहियांँ ना बसाई । हमार बहिनियो के भूत अब उतर ग‌ईल बा ।

आजू हम बाड़ा खूस बानीं ।

डॉ शिप्रा मिश्रा