दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )
चाँन जइसन
कविता
शशिलता पाण्डेय सुभाषिनी
2/22/20261 min read


चाँन जइसन
*******
हमरा मन के आंगन लागत रहे सून - सून,
जिनगी रहे हमार बड़ा उदास अईसन ।
सब कुछ रहे हमरा पास बाकी जिनगी,
रहे बेरौनक सून आसमान जइसन ।
एक दिन पतझड़ में बहार मुस्कुराइल,
चाँन जईसन सुघर फूल नीयर कोमल |
एगो कली, परी अइसन धरती पर आईल,
खिलत फूल नीयर ज़िंनगी मुस्कुराईल |
नन्हकी कली भी हँसल - खिलखिलाईल,
अईसन लागल, बहार गीत गुनगुनाइल |
हमार लइकपन फेरु से लौट आइल,
संगे - संगे हमारा गोदी मे रहे उ खेलत |
कबो फानत - कूदत किलकारी रहे भरत,
कबो छोटी - छोटी हथेली से हमार स्पर्श कइलस |
कबो माथ के बार मुठ्ठी में धई के खिलखिलाइल,
झूठ - मुठ के हम रो देनी, देखावेनी होई के उदास |
हमार मुंह उठा के ऊपर हमार भाव परखेले,
कबो दौरेले कबो दौरावेले उ लुकाइके |
हमारा पीछा आंचर में मुँह तोपी के चिढ़ावेली,
गील माटी में खेल - खेल तनिक माटी चीखी लेली |
फेर हमरा के भी माटी खाएके आमंत्रण देली,
करली कल्लोल कोलाहल अपना भाषा मे गावेली |
हम आंनदित मन से ईश्वर के शुक्र मनावेनी,
एगो चाँन बिहंसता आसमान के ऊपर |
दोसराका चनरमा जमीन पर खिलखिलाता,
खिलल फूल नीयर बाड़ी उ खिलल बाड़ी सुन्नर |
नन्हकी किरिनिया जैसे उगते करेले जग उजियार
हसेली जैसे झंकृत होखे पाँउवा में चांदी के पायेल,
दुनियाँ के सबसे आनंद - सुखद अनुभूति ,
जब पिरितिया लुटाये एक दूजा पर दादी - पोती ।
शशिलता पाण्डेय सुभाषिनी
बलिया ( उत्तर प्रदेश )
