दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )

चाँन जइसन

कविता

शशिलता पाण्डेय सुभाषिनी

2/22/20261 min read

चाँन जइसन

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हमरा मन के आंगन लागत रहे सून - सून,

जिनगी रहे हमार बड़ा उदास अईसन ।

सब कुछ रहे हमरा पास बाकी जिनगी,

रहे बेरौनक सून आसमान जइसन ।

एक दिन पतझड़ में बहार मुस्कुराइल,

चाँन जईसन सुघर फूल नीयर कोमल |

एगो कली, परी अइसन धरती पर आईल,

खिलत फूल नीयर ज़िंनगी मुस्कुराईल |

नन्हकी कली भी हँसल - खिलखिलाईल,

अईसन लागल, बहार गीत गुनगुनाइल |

हमार लइकपन फेरु से लौट आइल,

संगे - संगे हमारा गोदी मे रहे उ खेलत |

कबो फानत - कूदत किलकारी रहे भरत,

कबो छोटी - छोटी हथेली से हमार स्पर्श कइलस |

कबो माथ के बार मुठ्ठी में धई के खिलखिलाइल,

झूठ - मुठ के हम रो देनी, देखावेनी होई के उदास |

हमार मुंह उठा के ऊपर हमार भाव परखेले,

कबो दौरेले कबो दौरावेले उ लुकाइके |

हमारा पीछा आंचर में मुँह तोपी के चिढ़ावेली,

गील माटी में खेल - खेल तनिक माटी चीखी लेली |

फेर हमरा के भी माटी खाएके आमंत्रण देली,

करली कल्लोल कोलाहल अपना भाषा मे गावेली |

हम आंनदित मन से ईश्वर के शुक्र मनावेनी,

एगो चाँन बिहंसता आसमान के ऊपर |

दोसराका चनरमा जमीन पर खिलखिलाता,

खिलल फूल नीयर बाड़ी उ खिलल बाड़ी सुन्नर |

नन्हकी किरिनिया जैसे उगते करेले जग उजियार

हसेली जैसे झंकृत होखे पाँउवा में चांदी के पायेल,

दुनियाँ के सबसे आनंद - सुखद अनुभूति ,

जब पिरितिया लुटाये एक दूजा पर दादी - पोती ।

शशिलता पाण्डेय सुभाषिनी

बलिया ( उत्तर प्रदेश )