दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )

बूढ़ा बूढ़ी

कविता

कविता

12/13/20251 min read

बूढ़ा बूढ़ी

बसलें बिदेश बेटा, बेटी ससुरारी,

सोच तानी कइसे बीती आपन बुढ़ारी ।

एतना न सोचा धनी, बात ई तिखारी,

मजे - मजे संघे बीती आपन बुढ़ारी ।

बेटा जन्मलें सोचलीं, लाठी बनि के रहियें ।

कब्बो जो गिरब हम ऊ हाथ बढ़ि थमियें ।

बीतल उमरिया दुई जन भईलीं उन पे भारी ।

सोच तानी कईसी बीती आपन बुढ़ारी ।

हंसी बोल बतिआवत बीती ई बुढ़ारी ।

एतना न सोचा धनी, बात तू तिखारी ।

मजे - मजे संघे बीती आपन बुढ़ारी ।

घर में बसा तू रखिहा नेहिया निसनिया ।

रात दिन हम करब खेतिया किसनिया ।

रोटिया बनिईहा तू हम काटब तरकारी ।

ऐहि तरे मजे - मजे बीती ई बुढ़ारी ।

एतना न सोचा धनी, बात तू तिखारी ।

मजे - मजे संघे बीती आपन बुढ़ारी ।

बेटी से सोचलीं सगरी कहीं मन के बतिया ।

नाती नतिनियन ख़ातिर तरसे ला छतिया ।

ऊहो अझुराईल हऊवे ससुरा दुआरी ।

सोच तानी कइसे कटी आपन बुढ़ारी ।

सगरो भुला तू सोचा हऊ महतारी ।

एतना न सोचा धनी बात तू तिखारी ।

मजे - मजे संघे बीती आपन बुढ़ारी ।

आवा लगे हम तोहकें बात समझाईं ।

लोक लाज पूत बेटी जग के कमाई ।

सात जनम के लिखना हवे सब पे भारी ।

आपन त साथे बीती सगरी बुढ़ारी ।

एतना न सोचा धनी, बात तू तिखारी ।

मजे - मजे संघे बीती आपन बुढ़ारी ।

बसलें बिदेश बेटा, बेटी ससुरारी......

श्वेता राय

देवरिया