दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )
बसंत पंचमी
परब
जय प्रकाश तिवारी
2/14/20261 min read


बसंत पंचमी परब
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“बसंत पंचमी परब” सनातन धर्म के एगो उल्लास से भरल परब ह । ई “ऋतुराज बसंत” के आगमन प ओकर स्वागत में दिल खोल के मनावल जाला । मानव जीवन में उमंग आ खुशी तबे आवेला जब पेट अन्न से भरल होखे, देह निरोग होखे आ मौसम भी उत्साह देखावे लायक होखे, जेकरा में आदमी आपन ज्ञान, कला, सुर, लय आ ताल के धुन प थिरक सके, नाच सके, कुछ गा सके । आम के बागन में बौर के सुगंध से भरल मादकता के माहौल होखे, धरती मइया भी सौम्य ना रहके जब चंचला हो जाली, आपन रूप सुशीला वसुंधरा बन के जब आपन हरियर, पियर आ नीला... रंगीन चुनरी ओढ़ के सज-धज जाली, तब स्वस्थ तन-मन कब ले अपने आप के रोक पाई ? उहो मादक खुशबू में मस्त होके थिरकही लागेला । अइसन लोक - उल्लास से भरल ऋतुराज बसंत के स्वागत के परब ह ई “बसंत पंचमी”। ई परब माघ महीना में ऋतुअन के संधिकाल में मनावल जाला, जब जाड़ा के विदाई आ गरमी के आगमन के संधि बेला रहेला ।
बसंत पंचमी परब आ विज्ञान
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“बसंत पंचमी परब” खगोल विज्ञान ( ऋतु परिवर्तन ) आ स्वास्थ्य विज्ञान दुनों से बहुत करीब से जुड़ल बा । जाड़ा के बाद बसंत ऋतु के आगमन, सरसों, अलसी, गेहूं, चना आदि के फसल के बहार आ प्रकृति के नवीनीकरण के प्रतीक ह ई परब । यदि भौतिक विज्ञान के नजर से देखल जाव त एह दिन सूरज के किरिन मन - मस्तिष्क प बहुत सकारात्मक असर डालेला; पियर रंग एकाग्रता आ आत्मविश्वास दुनों बढ़ावेला । स्वास्थ्य विज्ञान के हिसाब से एह समय वनस्पतियन आ औषधियन में स्वास्थ्यवर्धक बदलाव आवेला । खगोलीय विज्ञान के दृष्टि से ई परब माघ मास के पाँचवाँ दिन आवेला, जब प्राकृतिक जीवन में नया उल्लास पैदा होला । ई परब ठीक उहे समय आवेला जब शीत ऋतु खत्म हो जाले आ बसंत ऋतु के शुरुआत होखेला । एह परब के महत्व के अनेक शीर्षक के अंतर्गत देखल जा सकेला ।
(क) बसंत पंचमी आ सरस्वती माई
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एह परब में उपासक के रूप में ज्ञान, कला आ संगीत के अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती के पूजा - आराधना अनिवार्य रूप से कइल जाला । बसंत ऋतु पूरा - पूरा माई सरस्वती के ही समर्पित ह, आ होली, लोहणी जइसन परब पर नया फसल आ नववर्ष के स्वागत क के साधक समाज आपन पूर्णता पावेला । बसंत पंचमी के दिन पियर पियर कपड़ा, रंगीन चुनरी धारण कइले से शुरुआत होखेला; ई कपड़ा तन - मन दूनो के गुलाल, अबीर आ होली गीत में झूमे के मौका देला । नया - नया मीठा व्यंजन आ पकवान खाके - खिआके, एक - दूसरा से गले मिलके, परिवार आ समाज के बड़ - बूढ़न से आशीर्वाद लिहल जाला । आ ई सब कुछ तबे पूरा मानल जाला जब समाज "माई सरस्वती" के पूजा - आराधना क लेला ।
(ख) सरस्वती पूजा ही काहे ?
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“बसंत पंचमी परब” बसंत ऋतु के आगमन के उत्सव ह । जब प्रकृति में नया फूल खिलेला, सरसों के खेत पियर, अलसी नीला आ आम बौर से लद जाला, तब खास क के माई सरस्वती के ही पूजा काहे ? ई सवाल बुद्धिजीवी मन के बार - बार मथेला । एह सवाल के जवाब खातिर हमनी के सनातन संस्कृति के शरण लेवे के पड़ी । सनातन संस्कृति में “सरस्वती” शब्द के कई संकल्पना, अलग - अलग अर्थ आ भावार्थ मिलेला, जे सरस्वती के भौतिक, दैविक आ आध्यात्मिक रूप में प्रस्तुत करेला । आमतौर पर “बसंत पंचमी” के माई सरस्वती के जन्मोत्सव दिवस मानल जाला । ज्ञान, बुद्धि, कला, संगीत आ वाणी के अधिष्ठात्री देवी होखे के कारण एह गुणन के प्राप्ति खातिर सरस्वती के आराधना कइल जाला । बाकिर सरस्वती के परिचय एतने तक सीमित नइखे; शास्त्रन में उनका कहीं अधिक अधिक व्यापक रूप बतावल गइल बा ।
(ग) वेद में सरस्वती महिमा
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दुनिया के सबसे पुरान ग्रंथ ऋग्वेद के तिसरका सूक्त के मंत्र संख्या 10, 11 आ 12 में सरस्वती के देवता रूप में वर्णन मिलेला । यजुर्वेद आ अथर्ववेद में भी सरस्वती के व्यापक चर्चा बा, जहाँ उनका भारती, वाणी, श्रद्धा आ इड़ा के रूप में पहिचानल गइल बा -
“सरस्वत्यश्विना भारतीडा ...” ( यजु. 20. 63 ) ।
सरस्वती के पहचान एगो सर्वोपयोगी औषधि के रूप में भी मिलेला -
“भेषजं नः सरस्वती” ( यजु. 20.63 )।
सरस्वती के पंच ज्ञानेंद्रियन के ज्ञान प्रवाही नदियन के रूप में भी बतावल गइल बा —
“पंचनद्यः सरस्वतीमपि यंति...” ( यजु. 34.11 )।
सरस्वती के ज्ञान नदी कहल गइल बा, जे हर व्यक्ति के निर्मल, निष्कलुष आ निर्वैर बनावेली ।
यजुर्वेद आ अथर्ववेद में सरस्वती के वाणी आ मातृभाषा के अर्थ में भी चिन्हित कइल गइल बा — “तिस्त्रो देवी इड़ा सरस्वती मही भारती ..."
( अथर्व. 7.10.11 )।
(घ) उपनिषद ग्रंथन में सरस्वती
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"देवी उपनिषद" में सरस्वती के वैष्णवी आ स्कंदमाता पार्वती के साथ देवी त्रयी के रूप में गिनती कइल गइल बा — “कालरात्रि ब्रह्मा स्तुताम वैष्णवी स्कन्दमातरम् ।
सरस्वतीं अदिति दुहितरं नमामः पावनाम शिवाम् ॥” ( देवी उप. 6 )
"सरस्वती रहस्योपनिषद" में उनका के “यज्ञं दधे सरस्वती” कह के उपासक, यजमान के भीतर यज्ञ के धारण करे वाली शक्ति बतावल गइल बा । एह के अलावा “निर्विकल्पात्मना व्यक्ता सा मा सरस्वती” जइसन उपयोगी कथन भी मिलेला । एह श्लोकन में देवी सरस्वती के स्वरूप के वर्णन करत उनका नमस्कार कइल गइल बा —
“चतुर्मुखंभोजवन हंसव धूर्मम् । मानसे रमतां नित्यं सर्व शुक्ल सरस्वती ॥
नमस्ते शारदे देवि काश्मीरपुर वासिनी ।
त्वमहं प्रार्थये नित्यं विद्यादानं च देहि में ॥” ( 1, 2 )
एह के अलावा भी “एं अंबितमे नदीतमे देवित मे सरस्वती” कह के उनका नदी, देवी आ सरस्वती देवी — तीनों रूप में पुकारल गइल बा ।
अउरी कहीं त —
“अश्रुते बुध्यते ग्रंथः प्रायः सारस्वतः कविः।
इत्येवं निश्चयं विप्राः सा हो वाच सरस्वती ॥” ( सरस्वती रहस्योपनिषद 10, 11 )
(ड.) पुराण ग्रंथन में सरस्वती
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वेद और ब्राह्मण ग्रंथन में सरस्वती के वर्णन ज्ञान, बुद्धि, संगीत आ वाणी के देवी के रूप में, नदी आ ज्ञान बहावे वाली नदी के रूप में मिलेला, जे कुछ अमूर्त जइसन लागेला । बाकिर पुराणन में अइला के बाद उनकर वर्णन सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी के पत्नी, अर्धांगिनी के रूप में कइल गइल बा । सरस्वती जी ब्रह्मा जी के ज्ञान आ वाक् शक्ति बाड़ी ।
ऊ देवी कमल के फूल पर विराजमान, श्वेत वस्त्र धारण कइले, वीणा वादिनी, माला आ पुस्तक धारण कइले मूर्त रूप में विराजमान बाड़ी । अक्सर उनका वीणा, पुस्तक, माला आ जलपात्र धारण कइले देखावल जाला, जे विद्या, कला आ सृजन के प्रतीक हवे आ वेदन के रचना से जुड़ल मानल जाला । उनका के “नदीतमा” ( नदियन में श्रेष्ठ ) भी कहल जाला ।
बसंत पंचमी परब के दिन माई सरस्वती के एह मूर्त रूप के देवी के रूप में प्रतिष्ठापित कइल जाला आ इनकर पूजा - आराधना कइल जाला । उनका पूजा के मुख्य उद्देश्य अज्ञान से ज्ञान क ओर यात्रा ह — मति के सुमति आ बुद्धि के सद्बुद्धि बनावे के सम्यक विकास ह ।
(च). दुर्गा सप्तशती में सरस्वती
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दुर्गा सप्तशती के पाँचवाँ से दसवाँ अध्याय ले देवी महासरस्वती के सात्विक रूप के वर्णन मिलेला, जहवाँ ऊ ब्रह्मा जी के शक्ति के रूप में प्रकट होखेली । ऊ आठ भुजा से युक्त बाड़ी आ शंख, चक्र, हल, त्रिशूल, धनुष, बाण जइसन अस्त्र-शस्त्र धारण कइले बाड़ी । ऊ शुंभ – निशुंभ जइसन दैत्यों के मर्दन करेली आ ब्रह्मा, विष्णु, महेश तक के शक्ति प्रदान करेली । उहवाँ ऊ ज्ञान, बुद्धि आ आत्मज्ञान के अधिष्ठात्री देवी कहल गईल बाड़ी ।
सरस्वती जी के उत्पत्ति आ स्वरूप प चर्चा करत महासरस्वती जी के गौरी ( दुर्गा ) के शरीर से उत्पन्न बतावल गइल बा । ऊ अस्त्र - शस्त्र धारण करे वाली बाड़ी आ शुंभ–निशुंभ जइसन दैत्यन के संहार में उनकर प्रमुख भूमिका बतावल गइल बा । सप्तशती के पाँचवाँ अध्याय देवी सरस्वती के समर्पित बा, जहवाँ ऊ ज्ञान आ शक्ति देली आ राक्षसन के वध करेली ।
बाद के कालखंड में रचल गइल कई गो पौराणिक ग्रंथन में देवी सरस्वती के जगन्नियंता ब्रह्मा जी के अर्धांगिनी देवी के रूप में विस्तृत वर्णन मिलेला, जेकर साहित्य जगत में भी खूब प्रयोग भइल बा । एह तरह सनातन संस्कृति में देवी सरस्वती के ज्ञान, कला, संगीत, विद्या, शांति आ सद्गुणन के देवी के रूप में दृढ़ मान्यता बा । ई सब सद्गुण अइसन हवे जेकर जरूरत बच्चा से लेके बूढ़ा तक, कलाकार से अभियंता तक, विद्यार्थी से प्रोफेसर तक, संगीतज्ञ से वैज्ञानिक तक —सबके पड़ेला । एह से जनमानस बसंत पंचमी परब के दिन एह सद्गुणन के प्राप्ति खातिर माई सरस्वती के उपासना करेला ।
प्राचीन उपासना के श्लोक, स्तुति आ प्रार्थना के शब्द आज भले कुछ बदल गइल होखस, बाकिर भाव ना बदलल । महाप्राण निराला जी के रचना — “वर दे ! वीणावादिनी वर दे !”
जइसन कईगो प्रार्थना जनम लिहलस, स्वीकृत भइलीं आ गायन के माध्यम बन गइलीं; बाकिर इनकर मूल स्वर उहे बा जवन प्राचीन ग्रंथन में मिलेला, जइसे —
“अध्यात्ममधिदैवं च देवानां सम्यगीश्वरी ।
प्रत्यगास्ते वदन्ती या सा मां पातु सरस्वती ॥”
एह मंत्र के भावार्थ ई ह कि जे हमरा भीतर, देवता लोग में, देवाधिपतियन में, भीतर - बाहर बसल दैवीय कल्याणकारी चेतन शक्ति बाड़ी; ऊ माई सरस्वती हमार रक्षा करसु, हमार समाज के कल्याण करसु -
“या वेदान्तार्थतत्त्वैकस्वरूपा परमार्थतः ।
नामरूपात्मना व्यक्ता सा मां पातु सरस्वति ॥”
अर्थात् जिनकर स्वभाव ही वेदान्त के सार तत्त्व ह, जे परमतत्त्व ( आध्यात्मिक तत्त्व ) हईं, जे परमार्थ रूप ( भौतिक तत्त्व ) हईं, आ जे नाम - रूप में प्रकट भइलीं ( जागतिक तत्त्व ) — ऊ करुणामयी माई सरस्वती हमार रक्षा करसु । इनका के सर्वांग पुष्टि कारक भी कहल गइल बा— “ॐ प्रणो देवि सरस्वती वाजेभिर्वाजेनीवती ।
धीनामवित्र्यवतु ॥”
अर्थात ॐकार स्वरूपा माई सरस्वती, पुष्टिकारक पदार्थ देवे वाली, विचार क पोषिका, उनका रक्षिका आ संवर्धिका हई हमनी के हरमेसा रक्षा करसु आ निरंतर कल्याण करत रहसु ।
एह तरह बसंत पंचमी परब के साथ देवी सरस्वती के आराधना अनिवार्य रूप से जुड़ गइल । पौराणिक मान्यतानुसार बसंत पंचमी के माई सरस्वती के प्राकट्य दिवस मानल जाला, एह से एह परंपरा के अउरी बल मिलल । जइसे धार्मिक अनुष्ठान में प्रथम पूज्य विघ्नेश्वर गणेश जी मानल जालें, ओही तरीका से साहित्यिक आ संगीत के अनुष्ठान में माई सरस्वती ही प्रथम पूज्य आ उपास्य बाड़ी ।
गोस्वामी जी रामचरितमानस वंदना में “वंदे वाणी विनायकौ” लिखके भले सरस्वती आ गणेश दुनो के एक साथ रखलें हवे, बाकिर वाणी ( सरस्वती ) के गणेश से पहिले रखलें — काहेंकि ऊ जानत रहलें कि माई शारदे ही कवि के हृदय में विराजमान होके कवित्व कार्य संपन्न करावेली —
“कवि उर अजिर नचावहि वाणी ।” कवित्व एगो कार्य ह आ ई हर सामाजिक कार्य के प्रतिनिधित्व करेला ।
बसंत पंचमी उल्लास, उमंग आ संगीत प्रधान — लगभग एक महीना, होली तक चलने वाला माधुर्य परब ह । एह परब में हृदय पक्ष के प्रधानता देखे के मिलेला, बाकिर ऊ बुद्धि के अतिक्रमण ना करे; कर्म के विभत्स आ विकृत ना बनावे । उत्तर भारत में लोहणी परब भी उत्साह, उमंग, माधुर्य आ कृषि उत्पादन — अन्न के महत्व से जुड़ल उल्लास परब ह । लोहणी भी ऋतु परब ही ह ।
अंत में अब ई बात साफ हो गइल कि “बसंत पंचमी” परब में भले कई देवी - देवता आ अलग - अलग मान्यता होखें, तबहूं माई सरस्वती ही बसंत पंचमी के प्रमुख उपास्य आ आराध्य देवी काहे बाड़ी ! भोजपुरी गीतन के शुरुआत अक्सर अइसे होला —
“सुमिरी ले शारदा भवानी, अब पति राख महारानी ।”
फगुआ, चैती, चैता गीतन में भी “आहे सुरसती मइया…
कीर्तन में… भजन में… होखि ना सहाय… हे रामा…” जइसन पंक्ति मिलेली ।
पुरान होखे चाहे नया लोकगीत—लोक संगीत आ लोक परंपरा में देवी माई सरस्वती के मान्यता अडिग बा आ वैदिक काल से ई निरंतर चलत आ रहल बा ।
सब देशवासियन आ सनातन प्रेमियन के बसंत पंचमी परब के हार्दिक बधाई आ ढेर सारी शुभकामना बा ।
जय प्रकाश तिवारी
बलिया / लखनऊ
चलभाष : 94533 91020
