दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )
बे - मौसम बरखा
कविता
तौसीफ़ अहमद
12/14/20251 min read


बे - मौसम बरखा
छप्पर टपके, घर बह जाला,
किस्मत लिखे बेमेल सब ।
बरखा अब आशीष ना लागे,
डरे किसान मजूर वोहसे अब ।
कहले साहब “विकास करब हम”,
कटले पहाड़, पेड़ चबाइले सब ।
धरती माई पुकारत, चीखत रहली,
पर साहब के कान बहिराइल अब ।
शहर में एसी चल रहल बा,
रस्ता सूखल, ड्रेनेज बढ़िया सब ।
गांव में बालू ओढ़ल खेत,
नरक बनल सागरो जिनगिया अब ।
अमीर के छाता रंगीन बा,
भींजत भाग्य लेके गरीब सब ।
मजूर किसान के हड्डी गल गइल,
धान वान बहा गइल नीर लेके सब ।
लाट साहेब पोस्ट करेलन "रेन वाइब्स !”,
कप में कॉफी, शीशा घर में बैठ के सब ।
गरीब कहेला “भगवान, रुक जा”,
टूटल छप्पर, बाढ़ आइल खेत में अब ।
बेमौसम बरखा अब गीत ना,
एगो चेतावनी बन गइल,
छत के ऊपर मॉल चमकल ।
नीचे किसान के खेत डूब गइल अब ।
साहब बनवनी कारखाना, टावर,
पर भूलनी धरती भी जिंदा हs सब ।
प्रकृति अब बदला लिहे वाली,
हर बूँद में दिखाइले गुस्सा बाड़ी अब ।
ई विकास नाहीं विनाश के लहर,
जवन बहावेला रस्ता सुखी वुखी सब ।
लाट साहेब अबहियो ना समझबs ,
त बेमौसम बरखा सबके ले डूबी अब ।
छप्पर टपके, घर बह जाला,
किस्मत लिखे बेमेल सब ।
बरखा अब आशीष ना लागे,
डरे किसान मजूर वोहसे अब ।
तौसीफ़ अहमद,
ब्रह्मपुर, बक्सर, बिहार
