दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )

अन्हरिया में अंँजोरिया

कहानी

डॉ शिप्रा मिश्रा

12/11/20251 min read

अन्हरिया में अंँजोरिया

केतना दिन जमाना के बाद आज ए पेड़ा से सुरसती के जाए के म‌उका मिलल बा । बग‌इचा के झिहिर - झिहिर बेयार बड़ा सोहावन लागत रहे । बरियारी गड़िवान के रोकवाए के मन रहे । बाकिर अन्हार हो जाइत त बाटे ना बुझाइत । ल‌इकाई के सगरी बात मन परे लागल । अमवारी के झुलुआ, भ‌ईंस के सवारी, पतहर झोंक के मछरी पकावल, डडे़र पर के द‌उराई, गड़ही में गर‌ई मछरी के पकड़ाई, पुअरा के पूंँज पर के चढ़ाई, फेन धब - धब गिराई - लरिकाईं के एकहगो बात मन पर धुआँ लेखा छापे लागल । उहो का दिन रहे ! मन के राजा रहनी सन ।

ज‌इसहीं बैलगाड़ी सतरोहन भ‌ईया के दुआरी पर चहुंँपल रोअना - पिटना सुरु हो ग‌इल । भ‌उजी के मुंँह पर के त रोहानिये ओरा ग‌इल रहे । केतना सुन्नर रहली भउजी जवना बेरा उतरल रहली तब‌ । सुरसती से तनिके उमिरगर होखिहें । भ‌उजी दोंगा क के अइली आ सुरसती के बियाह - गौना भ‌इल । एक लेखा से सखियारो रहे दुनू जाने में । ना भ‌उजी पढ़़ल-लिखल रहली ना सुरसती । बाकिर सनेह एतना रहे कि बेकहले एक दोसरा के मन के बात बूझ लेत रहे लोगिन ।

सुरसती के उतरते भ‌उजी भर - पांजा अंकवारी में ध लेहली । "बबी हो बबी आ भ‌उजी हो भ‌उजी" कुछ देर तक गांव - जवार के लोगिन के लोर से भेवें लागल । जब हिक भर लोर उझिल ग‌ईल त भ‌उजी बड़की पतोह से कठरा में पानी मंगवईली आ सुरसती के गोड़ धोए लगली । सुरसती के बेर - बेर मने क‌ईला पर भी भ‌उजी ना मानस -"बड़ा भाग से नु बहिन - बेटी के,भगिना - बाभन के गोंड़ धोए के म‌उका मिलेला ।" अंचरा से गोड़ पोंछाईल..भहरा के गोड़ लगली । तब जा के सानत भ‌ईली ।

पतोहिया से मिसरी पानी मंगव‌ईली । गांव - जवार के बात बिखिन चले लागल । सतरोहन भ‌ईया के मरला के हुको रहे । बाकिर सुरसती जानत रहली कि भ‌ईया के तीसरको मेहरारू ई भ‌ऊजी रहली ।पहिलका देह से त बाले - बच्चा ना रहे । दोसरको से एगो बेटी रहे । दुनू जाने मर - बिला ग‌ईल लोग त ई भ‌उजी उतरली । गांव - जवार टोन मारे - क‌ईसन अभागल कुटुम के बाडी़.. अईसन बूढ़ मरद से बियहले बाड़न स ।

मने सुरसती निमन से जानतारी कि भ‌ऊजी के पैरा परल केतना सुभ रहे । 13 - 14 बरस के लुकझुक कनिया केतना महीनी से सबकर निरवाह क‌ई देहली । जे घरी ऊ नया नया आईल रहली, ई घर लोगिन से भरल रहत रहे । किरिन उगला से पहिलहीं भ‌ऊजी के छम - छम सुरु हो जात रहे । बड़का - बड़का फुलहा बटुलोही उतारत देरिये ना लागे । धान उसीनला से लेके पनपियाव बन‌ईला ले - सब भ‌ऊजी के कपारे । दुअरा पर गाय - गोहार अलगे..माल - जाल के पखेव बनाव..दूध औंट..।जेठ - ब‌ईसाख..भरल भादो भ‌ऊजी के कपारे कबहूं रेघारी ना आईल ।

ढेर दिन पर भेंट भ‌ईल रहे । राति बतियावते बीत ग‌ईल । भोरे नहा सोना के घामा में तर‌ई बिछल ।सुरसती के तनी फिकिर भ‌ईल - एगो पतोहिया त आगु - पाछू लागल बिया बाकिर छोटकी त ल‌उकबे ना क‌ईल -"का हो भ‌ऊजी !! तोहार छोटकी पतोहिया न‌ईखे ल‌उकत ?"

"अरे का कहबू बबी ! अठान - कठान लगवले बीया। तोहार भ‌ईया पढ़ल - लिखल पतोह उतरलें । कहलें - पढ़निहार पतोह निमन होली सन ।बाकिर सबमें बहेंगवा उहे बीया..बड़का अंगरेजी छांटेले । ठठा के भ‌ऊजी हंसे लगली । नन्हका के सुरसती पेठवली - जो रे छवडा़ !!छोटकी के बोला ले आव त । कह फुआ बोलावतारी ।

तनिका देरी के बाद रमत - झमत पढ़लको पतोह उतरतारी - "परनाम फुआ ! क‌एसी ह‌एं फुआ ?ईहां गांव - देहात में हमरा मन नहीं लगता है । हम सहर के ह‌एं । हम पढ़ल - लिखल ह‌एं । ई लोग के कुछु बुझाता ह‌ए ? कहते ह‌एं हमको अलगा क दीजिए । हमरा से ई चूल्हा नहीं झोंकाएगा । हम माटी - झेंटी का कार नहीं नूं किये ह‌एं । ईंहां तो कोई बुझबे नहीं करता ह‌ए । आप आईं ह‌ए तो आपही समझाईए ना ।"

सुरसती के त काठी मार देहलस । का हो भ‌ईया क‌ईसन पतोह उतरले बाड़ ! एकरा त देह के सहूरे न‌ईखे । ना मुडी़ पर आंचर, ना कवनो अदब, ई त सलवार - फराक पहिन के नचनिया बनल बीया । अईसन धीर - गंभीर भ‌ऊजी के अईसन बेलूरा पतोह ।बड़का हूक के बात बा ।

पनरह दिन क‌ईसे बीत ग‌ईल, पते ना चलल । सभे से मेलजोल, सबका ईंहां पुरनका लोग जे रहे बड़ा मान - आदर क‌ईल । सुरसती के करेजा जुड़ा ग‌ईल । अब बेर - बेर बेटवा के फोन आवे लागल ।

बडा़ निहोरा - पाती पर भ‌ऊजीओ चले के त‌ईयार भ‌ईली ।सुरसती केतना समझवली - बडा़ देह खट‌व‌लू.. तोहरा अब आराम के जरुरत बा.. अब ई जाल छोड़.. धन - बीत रहे चाहे बिलाए.. ई लोग बूझे.. जिनगी भर तूहीं देखबू.. राखी लोग त भोगी लोग.. ना राखी लोग त भीख मांगी लोग.. तू अब च‌एन से जीय ।

एही बीच छोटको बेटा - पतोह अलगा हो ग‌ईल लोग । भ‌ऊजी खातिर निमने भ‌ईल । दिन भर उनकर चूल्हे तर बीत जात रहे । बड़की होसियार रहे । संघे लाग के करवावत रहे । ओकरे के समझा - बुझा के भ‌ऊजी चले के त‌ईयार भ‌ईली । खोईंछा भराईल.. दुआरी पर कलसा रखाईल.. गांव - जवार के पुरनका लोग सुरसती के अंकवारी भर - भर के बिदा क‌ईल लोग । भ‌ऊजी जेतरे - जेतरे समझवली बड़की पतोहिया सब क‌ईलस । बड़की पतोहिया ओतना पढ़ल ना रहे बाकिर अछर चिन्हत रहे ।

रस्ता - पेडा़ में बरहम बाबा, सीतला मा‌ई के अंचरा उठा - उठा के ननद - भ‌ऊजाई गोहरवलस लोग । सुरसती के समझ में ना आईल कि लोग पढ़ - लिख के होसियार होला आकि बेपढ़ले । आ अगर निरछरे ढेर होसियार होला त फेर पढ़ला के का जरुरत । बैलगाड़ी के हेव - हेव में सुरसती के बातो भोर पर ग‌ईल ।

डॉ शिप्रा मिश्रा

बेतिया - कोलकाता