दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )
बाबा साहेब अंबेडकर: जीवन संग्राम आ विचार के क्रांति
निबंध
डॉ विमल कुमार
4/14/20261 min read


बाबा साहेब अंबेडकर: जीवन संग्राम आ विचार के क्रांति
कवनो आदमी जन्म से महान ना होला, ई महानता ओकरा अपना जीवन में त्याग आ परिश्रम के भारी पूँजी लगा के पावे के पड़ेला। डॉ. अंबेडकर के जीवन के कहानी भी कुछ अइसने बा। विपरीत परिस्थिति में जीवन यात्रा तय करे वाला डॉ. अंबेडकर कइसे एगो बड़ समाज के मुक्तिदाता के रूप में सोझा अइले ? ई जानल बेहद रोचक बा।
जिनगी के कवनो अइसन पहलू नइखे जेवना के डॉ. अंबेडकर के विचार ना छुवले होखे। जेवना तरह एगो वैज्ञानिक प्रयोगशाला में विभिन्न प्रकार के प्रयोग क के अपना निष्कर्ष के प्रतिपादन करेला, ओइसही डॉ. अंबेडकर भी भारतीय समाज रूपी प्रयोगशाला में अनूठा प्रयोग कइले बाड़े आ नया विचारन के प्रतिपादन कइले बाड़े।
जीवन-
डॉ. भीमराव अंबेडकर के जन्म 14 अप्रैल, 1891 के इंदौर के लगे महू नामक छावनी कस्बा में भइल रहे। इनकर पूरा नाम ह भीमराव रामजी अंबेडकर। अंबेडकर जवना महार जाति में पैदा भइले ऊ एगो तथाकथित अछूत जाति रहे। महार दूसरा अछूत समुदायन के मुकाबला अधिका साधनहीन रहलन बाकिर ई लोग सामाजिक रूप से ढेर गतिशील रहे लो। बचपने में अंबेडकर के सामना अस्पृश्यता रूपी कलंक से भइल। अंबेडकर के बालमन प एह बातन के बहुते प्रभाव पड़ल कि आखिर काहें कवनो नाई इनकर बार बनावल नइखे चाहत ? आखिर काहें कवनो गाड़ीवान अपना गाड़ी से ले जाए खातिर तैयार नइखे होत ? काहें उनका के कवनो कुआं से पानी पीए के नइखे मिलत ? डॉ. अंबेडकर क उदय ओह अपमानजनक सामाजिक व्यवस्था में भइल, जहवां आदमी असमानता आ मानसिक जकड़न क बेड़ियन में जकड़ल रहे।
डॉ. अंबेडकर बचपन से ही मेधावी रहले। अंबेडकर क प्राथमिक शिक्षा छावनी के प्राथमिक विद्यालय से भइल आ ऊ सतारा से भी अध्ययन कइले। बाद में उनकर बाबूजी मुंबई आ गइलन त ऊ एलफिंस्टन कॉलेज में दाखिला लिहलन। ऊ न्यूयॉर्क के कोलंबिया विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एम.ए. के डिग्री हासिल कइले आ फेरू 1916 में ऊ लंदन खातिर रवाना हो गइले जहवां उनका के कानून के पढ़ाई खातिर ग्रेज इन में दाखिला मिल गइल। कोलंबिया में ऊ अपना दूगो प्रोफेसरन - जॉन ड्यूवी और आर. ए. सेलीग्मान से खासतौर से प्रभावित भइले। डॉ. अंबेडकर क विचार प गौतम बुद्ध, कबीर आ ज्योतिबा फुले क प्रभाव स्पष्ट रूप से रहल आ ऊ एह बात के हरदम स्वीकार भी करत रहले। कबीर उनका के भक्ति मार्ग देखवलन त ज्योतिबा फुले से उनका के संघर्ष के प्रेरणा मिलल। बुद्ध से उनका के मानसिक शांति आ समता क संदेश मिलल। उनहीं के आदर्श प चल के ऊ सामूहिक धर्म परिवर्तन कइले।
1917 में ऊ लंदन से भारत आ गइले। 1917 में भारत लौटला प उनका के बड़ौदा महाराजा के सैन्य सचिव के रूप में नौकरी मिलल। बड़ौदा में अपना वास्तविक पहचान के आधार प डॉ. अंबेडकर के रहे खातिर एगो जगह तक ना मिल पावल। एह अपमानजनक अनुभव से डॉ. अंबेडकर के अंतरात्मा बहुते भीतर तक प्रभावित भइल। इहवां से अंबेडकर एगो राजनीतिक योद्धा क रूप में नया अवतार ग्रहण कइलें ।
काम - काज -
बरिस 1920 में ऊ कोल्हापुर के महाराजा शाहू महाराज के आर्थिक सहायता से ‛मूकनायक’ नाम से एगो जर्नल के शुरुआत कइले। 1921 में ऊ मास्टर आफ साइंस के डिग्री हासिल कइले आ अगिला साल ‛दि प्रॉब्लम ऑफ रुपी’ शीर्षक के तहत आपन शोध पत्र जारी कइले। एकरा बाद ऊ भारत लवटले आ मुंबई में वकालत के शुरुआत कइले आ एहीजे से सार्वजनिक जीवन में उनकर कड़वाहट भरल दिनन के शुरुआत भइल। डॉ. अंबेडकर के अगुआई में शुरू भइल सामाजिक आंदोलन के सफर बहुत लमहर रहल।
जुलाई 1924 में ऊ ‛बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ के गठन कइले । डॉ. अंबेडकर आत्मसम्मान क रक्षा खातिर पूरा दलित समुदाय से संघर्ष क आह्वान कइले। 20 मार्च 1927 के महाड़ में दलित के विशाल सम्मेलन भइल। एकरा में लगभग दस हजार प्रतिनिधि भाग लिहले। अपना अध्यक्षीय भाषण में डॉ. अंबेडकर दलित चेतना के जगावे के काम कइले। ऊ ऊंच आ नीच के भाव के खतम करेके आह्वान कइले, दलितन से अपना गोड़ प खड़ा होखे आ खुद के चेतना से स्वाभिमान आ स्वआदर पैदा करे के बात कहलन। 29 जून 1928 से डॉ. अंबेडकर के अगुआई आ मार्गदर्शन में ‛समता’ नाम से एगो पाक्षिक शुरू भइल। मई 1930 में डॉ. अंबेडकर नासिक के कालाराम मंदिर में अछूत प्रवेश के आंदोलन खड़ा कइलन। डॉ. अंबेडकर खुद ही सत्याग्रह के अगुवाई कइलन। 1930 के दशक में डॉ. अंबेडकर अंग्रेजन से मांग कइले कि अस्पृश्य लोगन के अलगा से निर्वाचक मंडल के अधिकार दिहल जाव। ब्रिटिश सरकार उनका मांग के आंशिक रूप से सहमति दिहलस बाकिर महात्मा गांधी के अनशन के बाद डॉ. अंबेडकर के अलगा से निर्वाचन मंडल के आपन मांग छोड़े के पड़ल आ 24 सितंबर 1932 के पूना पैक्ट प ऊ साइन कइले।
1936 में अंबेडकर आपन पहिला राजनीतिक पार्टी ‛इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी’ बनवले। 1942 में ऊ ‛शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन’ के नाम से एगो नया संगठन भी बनवले। 1942 में डॉ. अंबेडकर वायसराय के एग्जीक्यूटिव काउंसिल के सदस्य बनले। डॉ. अंबेडकर के अगुआई में नया औद्योगिक संस्कृति आ मजदूरन के हित के सुरक्षा के अभियान के शुरुआत भइल। अप्रैल 1944 में ऊ एगो विधेयक लिअइले। एकरा अनुसार मजदूरन के तनख़ाह सहित छुट्टी देबे के प्रावधान कइल गइल रहे। अगर देखल जाव त एक तरीका से डॉ. अंबेडकर ही भारत में मजदूर आंदोलन के नींव रखले ।
एगो अगुआ के रूप में डॉ. अंबेडकर एक उद्देश्य से दूसरा उद्देश्य क ओर बेहद सधल तरीका से कदम बढ़ावत रहले। सबसे पहिले ऊ अछूत समाज के सुधारे के प्रयास कइले ताकि बहुसंख्यक हिंदू समाज में ओहन लो के भी मान्यता मिल सके। तीस के दशक में ऊ राजनीति में दाखिल होके अगुआ बने के दिशा में प्रयास करत रहलन।
स्वतंत्रता आंदोलन के घरी डॉ आंबेडकर वंचित समूह के नायक के रूप में देश स्तर प उभरलन। 3 अगस्त, 1947 के जवाहरलाल नेहरू उनका के अपना सरकार में विधि मंत्री के रूप में नियुक्त कइलन आ 3 सप्ताह बाद 29 अगस्त के उनका के संविधान के प्रारूप समिति के अध्यक्ष बनवलन। डॉ. अंबेडकर एह तरीका से भारतीय संविधान के निर्माता के रूप में सोझा अइले। डॉ. अंबेडकर संविधान में सामाजिक सुधारन से जुड़ल विशेष प्रावधान कइले जवन भारतीय समाज के बदलाव के वाहक बनल। डॉ. अंबेडकर दीर्घकालिक सुधारन पर बल दिहले आ हिंदू कोड बिल के माध्यम से जरूरी सुधार के कोशिश कइले। अपना मांग प उचित कार्रवाई होत ना देख के सितंबर, 1952 में डॉ. अंबेडकर सरकार से इस्तीफा दे दिहलन। जीवन के अंतिम दिनन में उनकर झुकाव बौद्ध धर्म क ओर हो गइल आ 14 अक्टूबर के दशहरा के महत्वपूर्ण हिंदू पर्व के दिने नागपुर में विशाल जनसमूह के सोझा ऊ बौद्ध धर्म के स्वीकार कर लिहले। 6 दिसंबर 1956 के वंचित समुदाय के एह महानायक के देहांत हो गइल ।
विचार-
डॉ. अंबेडकर अपना समकालीन चिंतकन नियन खाली किताबी ज्ञान प ही आधारित ना रहले । बलुक भारतीय आ विदेशी शिक्षा के उच्च स्तरीय बौद्धिक ज्ञान के अनूठा संगम आ सामाजिक आंदोलन के नेता आ समाज सुधार के भूमिका निभावे के दौरान मिलल व्यवहारिक ज्ञान के देन रहले। एकरा संगे - संगे भारतीय संविधान के रचयिता के रूप में ऊ राष्ट्र सेवा से भी अनुभव ग्रहण कइले। अंत में ऊ एगो धार्मिक सन्यासी बनले आ अपना लाखन अनुयायियन के संगे खुद अपना धर्म बौद्ध में वापस आ गइले। डॉ. अंबेडकर के विचारन के सबसे अहम पहलू ई ह कि ऊ अपना ज्ञान के खाली मौखिक परंपरा के माध्यम से ही ना रचलें बलुक सार्वजनिक रूप से अपना दल के लोगन भा अनुयायियन के भाषण ही ना दिहले बलुक ऊ अनुसंधान कइले आ अपना ज्ञान के लिखित रूप में प्रकाशित कइले।
धर्म-
डॉ. अंबेडकर हिंदू धर्म दर्शन के गहराई से अध्ययन कइले। डॉ. अंबेडकर अपना पुस्तकन आ लेखन में हिंदू धर्म के ऐतिहासिक विश्लेषण कइले आ हिंदू धर्म में व्याप्त कुरीतियन के संदर्भ में साक्ष्य भी प्रस्तुत कइले। डॉ. अंबेडकर धर्म दर्शन के विभिन्न आयामन के विश्लेषण करत हिंदुत्व के दर्शन के व्याख्या कइले। डॉ. अंबेडकर हिंदू धर्म के दर्शन के परीक्षण करे खातिर न्याय के कसौटी आ उपयुक्तता के कसौटी प एकरा के परखलन। ऊ मानत रहले कि न्याय के सिद्धांत एगो सारभूत सिद्धांत ह आ ओकरा में लगभग ओह कुल सिद्धांतन के समावेश बा जवन नैतिक व्यवस्था के आधार बनल बा। न्याय हरदम समानता के सिद्धांत के प्रतिपादन कइले बा आ निष्पक्षता से समानता उभरल बा। डॉ. अंबेडकर हिंदू धर्म के मूल्यांकन करत ई बतावत बाड़े कि जातीय श्रेष्ठता के भाव के वजह से हिंदू धर्म क्षमता आधारित समाज बनावे में असफल रहल बा।
वर्ण, जाति व्यवस्था आ अस्पृश्यता -
अंबेडकर समाज के अस्पृश्य, उपेक्षित आ सदियन से सामाजिक शोषण से त्रस्त दलित वर्ग के राष्ट्र के मुख्यधारा से जोड़े के अभूतपूर्व कार्य ही ना कइले बलुक उनकर पूरा जीवन समाज में व्याप्त रूढ़ियन आ अंधविश्वास प आधारित संकीर्णता आ विकृति के दूर करे प भी केंद्रित रहे। डॉ. अंबेडकर भारत में एगो अइसन वर्गविहीन समाज के संरचना चाहत रहलन जेकरा में जातिवाद, वर्गवाद, संप्रदायवाद आ ऊंच-नीच के भेद ना होखे आ हर आदमी अपना योग्यता के अनुसार सामाजिक दायित्वन के निर्वाहन करत स्वाभिमान आ सम्मानपूर्ण जीवन जी सको।
अस्पृश्यता मिटावे खातिर ऊ ना खाली संघर्ष कइले बलुक संविधान में एकरा निवारण खातिर स्पष्ट प्रावधान भी कइले । ऊ मानव समाज के चुनौती देत कहत बाड़े कि “ई दायित्व एह दुनिया के ह कि ऊ सभ पिछड़ा लोगन के संगे दलितन के जंजीर तूर के ओकरा के आजाद करे।” डॉक्टर अंबेडकर तत्कालीन विचारन के खारिज कर तर्क दिहले कि “टूटल - फूटल मकान के रंगाई पुताई क के ओकर दुर्दशा के छिपावल त जा सकेला बाकिर सुधार ना हो सकेला। अइसन हालत में ओकरा के गिरा के नया मकान बनावल ही उपयुक्त होई।” अंबेडकर के अनुसार अस्पृश्यता के जड़ हिंदू वर्ण व्यवस्था में शामिल बा । एह से ई कुप्रथा के मिटावे खातिर वर्ण व्यवस्था के अंत जरूरी बा। डॉक्टर अंबेडकर शासन के संस्थन में दलित वर्गन के उचित आ पर्याप्त प्रतिनिधित्व प बल दिहले आ सामूहिक भोज औरी अंतरजातीय विवाह के समर्थन कइले।
महिला के स्थिति प विचार-
डॉ. आंबेडकर महिला के उन्नति के प्रबल पक्षधर रहलन। उनकर मानल रहे कि कवनो समाज के मूल्यांकन एह बात से कइल जा सकेला कि ओकरा में महिला के का स्थिति बा ? दुनिया के लगभग आधा आबादी महिला लोगन के बा, एह से जब तक उनकर समुचित विकास नइखे होत तब तक ओह देश के चहुंमुखी विकास ना हो सकेला ।
डॉ. भीमराव अंबेडकर महिला लोगन के स्थिति में सुधार लिआवे खातिर दूगो मुख्य अखबारन के स्थापना भी कइले। 'मूकनायक' आ 'बहिष्कृत भारत' नाम के इ अखबार महिला सशक्तिकरण के मुख्य केंद्र रहल। 18 जुलाई 1927 के करीब तीन हजार महिला लोगन के एगो संगोष्ठि में बाबा साहब कहलन कि रउवां सभे अपना लइकन के स्कूले भेजीं। शिक्षा महिला खातिर ओतने जरूरी बा जेतना पुरूष खातिर। जदि रउवां लिखे -पढ़े आवेला, त समाज में राउर उद्धार संभव बा। 5 फरवरी 1951 के डॉ. भीमराव आंबेडकर संसद में ‘हिंदू कोड बिल’ पेश कइले। एकर मकसद हिंदू औरतन के सामाजिक शोषण से आजाद करावल आ पुरुष के बराबर अधिकार दिआवल रहे।
राज्य के स्वरूप -
राज्य के स्वरूप से संबंधित डॉ. अंबेडकर के विचार उदारवादी आ लोक कल्याणकारी राज्य के अवधारणा से मिलत - जुलत बा। उदारवादी अवधारणा नियन डॉ. अंबेडकर आदमी के गरिमा के महत्व देलन बाकिर राज्य के अहस्तक्षेप के स्वीकार ना करेलन। ऊ समाजवादी राज्य के संरचना के तरह राज्य के एगो आवश्यक संस्था के रूप में देखेलन बाकिर राज्य के असीमित शक्तियन के अस्वीकार भी करेलन। डॉ. अंबेडकर राज्य आ सरकार से संवेदनशीलता के अपेक्षा करेलन, जवन समाज के वंचित समुदाय खातिर सकारात्मक कदम बा आ एगो अइसन सामाजिक व्यवस्था के स्थापना होखे जहवां स्वतंत्रता, समानता आ बंधुत्व के भाव होखे ।
शासन प्रणाली -
डॉ. अंबेडकर संसदीय शासन प्रणाली के समर्थक रहले। ऊ एगो अइसन शासन प्रणाली के पक्ष में रहले जेकरा में कार्यपालिका समर्थ होखला के संगे - संगे उत्तरदायी आ संवेदनशील भी होखे। ई कार्यपालिका व्यवस्थापिका के निर्देशन में काम करे आ ऊ संसदीय व्यवस्था में बहुमत से अल्पमत के हितन के उपेक्षा ना करें।
दलीय प्रणाली के संबंध में डॉ. अंबेडकर द्विदलीय प्रणाली के समर्थक रहले। हालांकि ऊ बहुदलीय प्रणाली के भी स्वीकार कइले।
डॉ. अंबेडकर तटस्थ प्रशासन के समर्थन कइले। उनकर मानल रहे कि प्रशासन के निष्ठा संविधान औरी कानून के प्रति होखे के चाहीं, कवनो विशिष्ट भा सत्तारूढ़ दल के प्रति ना। ऊ तटस्थता खातिर सिविल सेवा के स्थायित्व औरी संवैधानिक संरक्षण दिहला के पक्षधर रहले। बाकिर लालफीताशाही और लूट प्रणाली के ऊ आलोचना कइले।
लोकतंत्र-
डॉ. अम्बेडकर लोकतंत्र के ना खाली सैद्धांतिक पक्ष बलुक व्यावहारिक लोकतंत्र के पैरोकारी करत रहले। उनका अनुसार लोकतंत्र के जड़ समाज में मनुष्य के आपसी संबंध में जा सकेले। उनकर मानल रहे कि भारतीय समाज में व्याप्त निरक्षरता , निर्धनता औरी जातिगत भेदभाव लोकतंत्र खातिर खतरे बा। शासन प्रणाली के स्तर प ऊ संसदीय लोकतंत्र के अपनावे प जोर दिहले। ऊ खाली राजनीतिक जीवन में लोकतंत्र के समर्थन ही ना करसु बलुक उनकर कहल रहे कि जब तक सामाजिक औरी आर्थिक जीवन में लोकतंत्र ना आई तब तक लोकतंत्र के संकल्पना के साकार ना कइल जा सकेला।
राष्ट्रभाषा-
डॉ. अंबेडकर क्षेत्रीय भाषा औरी बोलियन के विकास के पक्षधर रहले बाकिर ऊ राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी के ही प्रतिस्थापित करे प ज्यादा जोर दिहले। ऊ मानत रहले कि हिंदी एगो अइसन भाषा है जवन पूरा राष्ट्र के एकता के सूत्र में बांध सकेले। ऊ भाषाई आधार प प्रांतन के गठन के पक्षधर ना रहले । ऊ भाषावाद के सांप्रदायिकता के ही दूसर रूप मानत रहले ।
राष्ट्रवाद-
वर्तमान में राष्ट्रवाद के विचारधारा वैश्विक स्तर प लोकप्रिय बा जेकरा में संकीर्णताएं औरी सम्प्रदायवाद भी शामिल बा। डॉ अम्बेडकर खातिर राष्ट्रवाद के अर्थ संप्रदायवाद ना रहे। डॉ अम्बेडकर राष्ट्र शब्द के प्रयोग ओह संदर्भ में कइल पसंद करत रहले जेकरा अंतर्गत उनकर आशय राज्य से होके समाज तक जात होख। ऊ राष्ट्रवाद के मानव जीवन में एगो वास्तविक शक्ति के रूप में स्वीकार करत रहले।
निष्कर्ष-
अम्बेडकर के लेखन उनका के एगो अंतरराष्ट्रीय शख्सियत में बदले में महत्वपूर्ण भूमिका निभवलस। दलित समुदाय खातिर डॉ. अम्बेडकर एगो नायक औरी एगो सामाजिक कार्यकर्ता रहले, बाकिर बड़ पैमाना प दुनिया खातिर, अम्बेडकर एगो जागरूक औरी जीवंत विचारक रहले। एगो विचारक के रूप में उनकर साख उनकर लेख, पुस्तक औरी पत्रिका आ उनकर प्रकाशित समाचार पत्रन के माध्यम से स्थापित भइल।
डॉ. अम्बेडकर के विचारधारा एगो नया, जीवंत सामाजिक व्यवस्था के निर्माण खातिर प्रासंगिक बा, जवन कवनो व्यक्ति के गरिमा के बरकरार रख सको, औरी ओकरा के अज्ञानता, शर्म आ अपमान के बंधन से मुक्त कर सको। राष्ट्र - निर्माण के उनकर दृष्टि स्वतंत्रता, समानता औरी बंधुत्व प आधारित बा। ऊ वेदन के अचूकता के त्याग दिहले आ वर्ण व्यवस्था, श्रेणीबद्ध असमानता के खारिज कर दिहले। मानवतावाद और तर्कसंगतता के प्रति उनकर लगाव आ गरीब औरी दलित के प्रति उनकर लगाव एह बात के संकेत देता कि अम्बेडकर एगो महान राष्ट्र निर्माता रहले।
डॉ. अंबेडकर के गिनती भारतीय इतिहास के ओह महान नायकन में होला, जिनकर विचार, दर्शन आ कर्म के असर बहुत बड़ जनसमूह पर तेज आ गहिरा तरीका से पड़ल। डॉ. अंबेडकर वंचित समाज के जिनगी के रूप - रेखा के एकदम बदल के रख दिहलन। “शिक्षित बनऽ, संगठित रहऽ, संघर्ष करऽ” जइसन उनकर मंत्र हाशिया पर रहे वाला समाज में नया चेतना आ जागरूकता के संचार कइलस ।
आज देश - विदेश में डॉ. अंबेडकर के कार्यक्रमन के अलग - अलग तरीका से चलावे वाला संगठन आ संस्था त जरूर बा, बाकिर उनकर समग्र दर्शन पर चले वाला आ एगो मजबूत विचारधारा के ढांचा खड़ा करे वाला राजनीतिक संघर्ष के पूरा रूप अभी लिहल बाकी बा ।
- डॉ विमल कुमार
असिस्टेंट प्रोफेसर ( राजनीति विज्ञान विभाग )
कुंवर सिंह डिग्री कॉलेज
बलिया
