दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )

प्रबंधन सूत्र

पीएचडी अवार्ड

कनक किशोर

7/8/20251 min read

प्रबंधन सूत्र

संदीप आजु बहुत उदास रहलन । लाख कोशिश के बादो घर में मन ना लागत रहे । मन जवना कारण से बेचैन रहे ऊ अपना पत्नी से ना बतावल चाहत रहलन । उनुकर उदासी के कारण कवनो खुशी के बात त रहे ना । सपना के महल ढह गइल रहे संदीप के ओसहीं जइसे बालू के भीत भहरा जाला । आपन मन के पीड़ा आ बेचैनी के ऊ गाँव में रहत माई-बाबूजी से फोन पर बतिया के हल्का कइल चहलन त उनका भीतर से आवाज आइल आजुले कवन सुख देले बाड़ऽ कि ऊ लोगिन के ई आपन असफलता के समाचार सुनावे जा रहल बाड़ऽ । संदीप रूक गइले ई सोच के कि ना ई उचित ना होई । आपन बेरोजगारी के भार छोड़, का देले बानीं ऊ लोगिन के आजुले ! ऊ सोचलन कि खाली हमरे ना बाबू-माई के सपनो के महल धाराशाई हो गइल बा बेआवाज कइले एह से ई दुखद समाचार ऊ लोगिन ना सुन पइहें !

संदीप एगो खाता-पीता परिवार के डबल एम. ए. पास लइका रहलन जे रोजी रोटी खातिर एगो प्राइवेट स्कूल में अध्यापक के नोकरी क के अपना परिवार के पालन पोषण करत रहलन पटना में रहि के । सपनो ओकर कवनो बड़ ना रहे बस एगो प्राध्यापक बने के सपना रहे । प्राध्यापक खातिर आवश्यक योग्यता रहे पीएचडी कइल । एही खातिर अपना शिक्षण कार्य के साथे पटना विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष अंबुज सिंह के निर्देशन में एगो शोधार्थी के रूप में पीएचडी खातिर निबंधन करा लेले रहलन । हिन्दी आ भोजपुरी साहित्य से उनुकरा जुड़ावे ना रहे, ऊ एगो साहित्य के समर्पित युवा रहन । साहित्यिक लगाव के प्रतिफल रहे पटना साहित्य जगत में उनुकर एगो विशेष पहचान । ई पहचान उनुकरा के रोटी ना दे सकल बाकिर अखिल भारतीय स्तर पर एगो सुपरिचित साहित्यकार बना देले रहे । उनुकर ई शौक उनुकरा रोटी के राहि में कबो-कबो रोड़ा बन जात रहे जे घरो में कलह के कारण बन जात रहे ।

संदीप समय पर आपन शोध पत्र अपना शोध निदेशक सिंह जी आ विश्वविद्यालय में जमा कर देले रहलन । उनुकर शोध पत्र देखि के काफी प्रभावित भइले सिंह जी बाकिर उनुकरा बेर-बेर अनुरोधो पर विभाग के अग्रसारित ना कइले । एही बीच सिंह जी रिटायर हो गइले । सिंह जी संदीप के एक दू बेर डॉक्टर लगाके साहित्यिक बइठकी में संबोधन कर देस आ कहस कि अब संदीप आ डाॅक्टर के बीच दूरी नइखे रह गइल । संदीप आपन अनुरोध के नकारत आ अनदेखा करत देखि संशय में पड़ जात रहलन बाकिर ओकर कारण ऊ ना समझ पावत रहलन । आसे जिनिगी ह एही बिसवास पर अडिग रहि अपना सपना के दिलासा देत बढ़त जात रहलन । संदीप के मेरिट के लोहा साहित्यकार जगत मानत रहे । ऊ समझ ना पइले कि हमार शोध पत्र काहे सिंह जी अपना कांखि त दबा के रखले बाड़े ? जब उनुका से जुनियर आ लेंढ़ छात्र सब के पीएचडी अवार्ड हो गइल आ ओह में से कुछ लोग लेक्चरर बन गइल त उनुकर कान खड़ा भइल । ऊ आपन आका साहित्यकार लोगिन से आपन शोध निदेशक सिंह जी से पैरवी करवले कि सिंह जी, जे एगो नामी साहित्यकारो हवन, आपन साथी लोगिन के बात जरूर सुनिहें ।मबाकिर एहू पर शोध प्रबंध के स्थिति यथावत बनल रहल त संदीप के निराशा अवसाद में बदले लागल ।

संदीप खातिर पीएचडी अवार्ड में विलंब उनुका के भीतरे से तुड़ देलस । कवनो उपाय ना देखि ऊ अपना साथे के पढ़ल सिनियर सहपाठी महेंद्र से मिलले जे पटने के एगो सरकारी कालेज में लेक्चरर रहलन आ आपन समस्या कहले । संदीप के समस्या सुन के महेंद्र बोलले कि जब तू जानत रहलऽ कि सिंह जी सवर्ण आ तू पिछड़ा वर्ग से त काहे उहाँ के अधीन शोध कार्य शुरू कइलऽ । बिहार में मंडल-कमंडल के मेल मिलाप राजनीति में हो सकेला बाकी शिक्षा के क्षेत्र में ना । विश्वविद्यालय जाति के अखाड़ा ह । छात्र संघ में आ अपना विश्वविद्यालय अध्यापन के क्रम में देखियो के तोहार शोध निदेशक के चुनाव देखि हमरा कहे में कवनों दिक्कत नइखे बुझात कि अपने हाथे अपना गोड़ पर कुल्हाड़ी मरले बाड़ऽ । शिक्षा जगत आ परीक्षा में मेरिट के कवनो स्थान नइखे रह गइल । विरेंद्र यादव के जानत बाड़ नू ऊ आजु शिक्षा मंत्री बाड़ें हमनी के बिहार में । हमरे साथे नूं पढ़त रहलन । वीसी के गरदन पर चाकू रखि आपन ग्रेजुएशन में फेल भइल रिजल्ट के पास में बदलवा लेलन आ बाद में ओही वीसी के अंगरक्षक बनि विश्वविद्यालय के बाजार बना आपन खूब रोटी सेंकलन । उनुकर एगो संत्री से विधायक आ मंत्री के यात्रा गाथा से आजु के नइखे परिचित ! आँखि खोलि के देखे आ समझे के कोशिश ना कइलऽ ओकरे नतीजा तोहार हो रहल दुर्गति के कारण बा संदीप ।

महेंद्र आगे कहले कि अर्थ के प्रधानता बा आजु ओकरा के देखते आँखि से खाली गांही छाप दिखाई पड़ेला, जइसे सावन के अंधा के हरियरी । जात-कुजात, धरम-संप्रदाय सब भुला जाला । धर्मनिरपेक्ष, साम्यवाद, वर्ग आ वर्ण विहीन समाज के पोषक आ शोषक दूनों अर्थ के आंगन में एक साथे ठुमका लगावत दिखाई पड़ेला । उहो अर्थ के अभाव रहल बा तोहरा जिनिगी में ऊ हमरा से बेसी के जानेला ? तोहार बाप ना बड़का सेठ रहलन आ ना उनुकर ऊंच राजनीतिक कद बड़ूवे त तूहीं बतावऽ के सुनी तोहार आजु के समय में । पइसा के खेल आ राजनीतिक दबाव से आजु कुछुवो करावल संभव बा । शिक्षा जगत में आदर्शवाद कागज में सिमट के रहि गइल बा । बाहर का हो रहल बा तू खुद देख रहल बाड़ऽ । सिंह जी काहे ना सुननीं आपन साहित्यकार साथी के बात, कहाँ से ना पैरबी करवलऽ, सोच रे भाई सोच । ओहि पैरवी के साथे पहुंचल मिठाई डिब्बा में एगो गान्ही छाप भरल लिफाफा रहित त देखितऽ ओकर फलाफल ।

एगो तीसरो बाति बता दीं ऊ ह प्रबंधन । प्रबंधन के महत्व सब दिन रहल बा । काल्हुओ रहे आजुवो बा । स्वरूप प्रबंधन के बदलल बा समय के साथे । काल्हु समय आ सिद्धांत के पटरी ध प्रबंधन चलत रहे । आजु बाजारवाद में अर्थ आ समय के पटरी धर प्रबंधन चलत बा । समय काॅमन बा दूनों में बाकिर सिद्धांत के जगह अर्थ ले लेले बा आजु । हमहूं एही शिक्षा जगत में बानीं पटने में । हमरा से का छुपल बा कि का हो रहल बा पीएचडी अवार्ड में । हम जानत बानीं तोहरो से नइखे छुपल सत्य । तोहरा भीरी सिंह जी के प्रबंधन के सुत्र पहुंचले ना रहे बलुक सिंह जी खुदो इशारा कइले रहीं बाकिर तोहरा आँखिन प सिद्धांत के परदा पड़ल रहे आ कान में गरम करू तेल डाल सुतल रहलऽ आ अब हमरा से कारण जानल चाहत बाड़ऽ । समय बदलल, पीएचडी के सर्कुलर बदलल तोहार समय अब समाप्त हो गइल । नया सर्कुलर के आलोक में समय समाप्ति के चिट्ठी तइयार बा विभाग से एक - दू दिन में तोहरा मिल जाई । " जाअप्र " - जाति, अर्थ, प्रबंधन - एगो रोगे ना प्रबंधन सूत्र के रूप में विश्वविद्यालय आ शिक्षा जगत में आपन पहचान बना लेले बा जेकर तू अकेले शिकार नइखऽ ढेर लोग बा । संदीप अब जा घरे बइठऽ अगर पीएचडी करे के मन अबहूं होखे त फेरू से नया निबंधन करा " जाअप्र " के नीति के राहि पकड़ बढ़ि चलऽ ।

संदीप घरे लवटले त टेबुल पर एगो बन्द लिफाफा रखल रहे जे विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग से आइल रहे । मन देखि के आशंकित भइल आ खोलले त सर्कुलर बदले आ पीएचडी के उनुकर समय समापन के सूचना रहे। आपन हारल आ मेहरी के मारल त ना केकरो से कहल जाला ई जानत रहन संदीप । अब आपन एह हार के विष्लेषण करस त कब्बो आपन हारल बुझाय त कब्बो " जाअप्र " के वर्तमान प्रबंधन सूत्र के मारल ।कारण जवन होखे एगो युवा साहित्यकार के सपना के महल ढह गइल रहे । संदीप उधेड़बुन में रहन कि कहाँ जाईं तबे उहाँ के साहित्यिक गुरु के फोन आ गइल कि " परख " के नया अंक आ गइल बा आवऽ सभके भेज दियाव । संदीप ' परख ' के कार्यालय के ओरि आपन झोला लेके बढ़ गइले ई सोचत कि पीएचडी परीक्षा में ना सम्मिलित हो पइनीं " जाअप्र ' के प्रबंधन सूत्र के अनुपालन के आभाव में, हम फेल नइखीं भइल । मन कुछ हलुकाह लागल बाकिर सिंह जी के चेहरा आ बाति बेवहार आँखि के सामने से ना जात रहे ।

कनक किशोर

रांची, झारखण्ड

सचल दूरभाष - 9102246536

[ दीया बाती के समहुतांक ( जुलाई, 2025 ) के अंक में प्रकाशित रचना । ]