दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )
कईसे अइली भारत में लक्ष्मी जी ?
भारत में लक्ष्मी जी
डॉ गणेश पाठक
12/7/20251 min read


कईसे अइली भारत में लक्ष्मी जी ?
भारत में ही ना, एह संसार के कई देशन में धन आ ऐश्वर्य के देवी के रुप में लक्ष्मी जी के पूजा कइल जाला । बाकिर हमनी में बहुते कम लोगन के मालूम बा कि अपना देश में लक्ष्मी जी कब अउरी कहां से अईली ?
भारत में लक्ष्मी जी के अयिला के "ब्रह्मवैवर्त पुराण" में एगो रोचक कथा के वर्णन भईल बा । एह कथा में ई बात कहल बा कि एक बेर सरस्वती जी के मन में ए बात के संका भईल कि विष्णु जी उनकर उपेक्षा कईके गंगा जी के अधिक आदर देत बाड़े । ई बात सोची के गंगा जी खातिर सरस्वती जी के मन में इरिसा जागि गईल ।
एक दिन जब विष्णु जी गंगा जी से प्रेम से बतियावत रहले त इ देखि के सरस्वती जी गंगा जी खातिर अपमान से भरल बात कहि दिहली । ई सब बात लक्ष्मी जी भी सुनत रहली । लक्ष्मी जी सरस्वती जी से कहली कि तोहरा गंगा जी से अइसन बात ना कहल चाहत रहल ह । लक्ष्मी जी के बात सुनि के सरस्वती जी बहुते खिसिया गयिली आ खिसिया के लक्ष्मी जी से कहली कि तुहूं ओहि राह पर चल तारू । आखिर तुहूं त हमार सवतिन ही हऊ । सवतिन से सही बात के उमेदि ना कईल जा सकेला । सवतिन त माटी के भी खराबे होले ।
ई सब बात विष्णु जी भी सुनत रहले । विष्णु जी सरस्वती जी के मन में आइल शक के दूर कइल चाहत रहले । विष्णु जी के बात सुनि के सरस्वती जी के मन ई बात आ गईल कि विष्णु जी जरला पर नमक छिड़कत बाड़े । सरस्वती जी अउरी अधिका खिसिया गईली आ लक्ष्मी जी तथा गंगा जी के सराप देत कहली कि लक्ष्मी तु वृक्ष के रूप में हो जा । तब लक्ष्मी जी गंगा जी के सराप से बचावे खातिर सरस्वती से विनती कयिली । एसे नाराज होके सरस्वती जी दुबारा सराप दे दीहली । इ सराप सुनि के लक्ष्मी जी त चुप हो गयिली, बाकिर गंगा जी सरस्वती के एह सराप के सहि ना पवली अउरी गंगा जी भी सरस्वती के नदी के रूप में हो जाये के सराप दे दीहली आ कहली कि तु मृत्यु लोक में जाके रहीह, जहवां पापी लोग तहरा में नहा के आपन पाप तहरा के देत रहीहें ।
गंगा जी के सराप के सुनि के सरस्वती जी अउरी अधिका खिसिया गईली आ गंगा जी के फेरू से सराप दिहली कि यदि हम मृत्यु लोक में रहब त तु श्री विष्णु के प्रेम अकेले ना पइबु । तुहूं नदी के रूप में ही मृत्यु लोक में जाके बहबू आ पापी लोगन के पाप के अपना में मिला के उनकर उद्धार करबू ।
जब विष्णुजी देखले कि तीनों देवी लोगन के क्रोध कुछ कम हो गइल त विष्णु जी बोलले कि हे देवी लोग ! सुन लोग ! अलग - अलग स्वभाव आ रूचि वाली कई स्त्री लोगन के वेद के मर्यादा के अनुसार कबहूं एक संगे ना रहे के चाहीं । काहें कि यदि कई स्त्री लोग एक साथ रहेला लो त आपस में एक दूसरा के गुण - दोष निकालत रहे ला लो । एही से गंगा शिव जी के पास, सरस्वती ब्रह्मा जी के पास आ लक्ष्मी हमरा पास रहिहें ।
विष्णु जी के ई बात सुनि के सरस्वती जी कहली कि हे भगवान ! लक्ष्मी जी ही रउरा संगे काहें रहिहें । हम आ गंगा जी काहें ना रहिहें । सरस्वती के ई बात सुनि के विष्णु जी कहले कि लक्ष्मी में तनकियो क्रोध नईखे । उनकर स्वभाव एक दम शांत ह । लक्ष्मी हमेशा हमरा सेवा में लागल रहेली आ धरम के आचरण करे वाली पत्नी हई ।
विष्णु जी के ई बात सुनि के तीनों देवियां आपस में लिपटि के रोवे लगली आ अपना कइला व्यवहार पर पछताए लगली । सरस्वती कहली," हे प्रभू ! हमरा जइसन दुष्ट विचार वाली ही अईसन कलह खड़ा कइलस ह । तबो रउंआ हमरा के त्याग मति करीं, ना त रउरा वियोग में हम आपन प्राण त्याग देब । लक्ष्मी भी भावुक होके बोलली कि "हे भगवान ! रउंआ सबके एक निगाह से देखे के चाहीं । रउंआ गंगा के शिव जी के पास आ सरस्वती के ब्रह्मा जी के पास जाए के ना कहे के चाहीं । रउंआ अपना बात पर फेरू से विचार करीं, नात हमहूं अन्न - जल त्यागि के मरे के व्रत ले लेबि ।
जब विष्णुजी देखले कि अब तीनों देवी लोग एकमत हो गईल बा लोग त तीनों देवी लोगन के समझवले कि अब तोंहनलो निश्चिंत हो के जा लो । तोहनलों के आ अपना बचन के लाज राखे खातिर तोंहनलो संगे बराबर के भाव राखबि । एह नया रूप में सरस्वती एक अंश में भारत में ज्ञान, बुद्धि आ विद्या के देवी के रूप में रहिहें, जवन हमरे अंश के रूप में रही आ एक अंश के रूप में ब्रह्मा के पास रहबु । गंगा भी एक अंश के रूप में शिव के पास रहिहें आ नदी रूप के अंश में पापी लोगन के पाप के नाश करिहें । एही तरह लक्ष्मी भी एक अंश के रूप में भारत में रहिहें आ एक अंश के रूप में हमरा पास रहिहें । ए तरह से लक्ष्मी भारत में धन - धान्य आ ऐश्वर्य की देवी के रूप में रहिहें । तबे से लक्ष्मी भारत में धन - धान्य आ ऐश्वर्य के देवी के रूप में रहेली आ धन - धान्य अउरी ऐश्वर्य के देवी के रूप में इनकर पूजा - अर्चना धूम - धाम से कईल जाला । दीपावली के समय त लक्ष्मी पूजा विशेष रूप से कईल जाला ।
डॉ गणेश पाठक
पूर्व प्राचार्य
भूगोलविद, पर्यावरणविद
