दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )

घीव घोसल रोटी

कहानी

देवकुमार सिंह

12/7/20251 min read

घीव घोसल रोटी

घूरा हाई स्कूल बोर्ड परीक्षा के परिणाम देखे परधान जी के घरे जात रहले, उनका दुआर पर रिजल्ट वाला अखबार आइल रहे । छोट लड़का सब गाना गावत रहले स ।

के केतना कईले बा पढ़ाई‌ ।

बीस मई के बुझाई ।।

केहू रोई केहू गाई ।

केहू रेल से कटाई ।।

उहां बड़ा भीड़ लागल रहे । एगो लड़का फर्स्ट डिवीजन से पास रहे, ओकरा घरे बाधाव बाजत रहे आ लड्डू बटात रहे । ऊहो आपन रोल नम्बर बतवले । पहिले थर्ड डिवीजन वाला लाईन में देखाईल, ना रहे । फेर, सेकंड डिवीजन वाला लाईन में देखाईल, ओहु में ना रहे‌ । फेर, मन मारि के कहले अब उम्मीद नईखे बाकीर फर्स्ट डिवीजन वाला लाईन में देखीं, ओहू में ना रहे । लोग डांटल कि घूरा, गनौरा भी पास होखे के आस लगवले बाड़े, जो ससुरा, मजूरी कर आ दु पईसा कमो कि घर के खर्ची चली । घूरा मन मसोस के अपना झोपड़ी में आ गईले ।

दस दिन के बाद स्कूल में अंकपत्र आईल, त आस लगवले स्कूल में गईले । क्रॉस लिस्ट में उनकर शिक्षक देखले, ऊ कूल्ह विषय में फेल रहले । उनकर बड़ भाई उनकर पढ़ाई छोड़ा दे ले । उनकर माई, बाप त तीन साल पहिलहीं मर गईल रहे । उनकर बड़ भाई एगो स्कूल में चपरासी रहले । ऊ सोचले कि ना पढ़ी तबहूं सिफारिश कई के कहीं नोकरी लगवा दिआई । बड़ भाई के बियाह हो गईल रहे ।

अब घूरा केहू के घरे, खेत, खलिहान में मजूरी करस । मजूरी ना मिले त दिनभर अपना उमर के लइकन संगे तास खेलस । एक दिन ऊ तास प से उठले त अपना झोपड़ी में अईले, भौजाई पानी भरे कुंआ पर गईल रहली । रसोई घर से हाथ में ही पांच गो रोटी ले ले आ एक कल्छूल तरकारी लेके खाए लगले । अतने में भौजाई आ के देखली कि ई हाबूर हाबूर रोटी भकोसत बाड़े । ऊ रोटी के डबरा उघार के देखली आ आग बबूला होके बोले लगली,"घीव घोसल रोटी रावा भईया खातिर रखले रहनी ह, ऊ दिन भर के थकल हाँफल अईहे त सूखल रोटी कईसे घोंटिहें । तनिकी सा भी समझदारी नईखे।"

घूरा के खीस बरि गईल, एगो रोटी अभी खा ना पवले रहले, झट से फेंक दे ले आ घर से निकल गईले ।

ऊ सीधे गंगाजी के किनारे आ गईले । कुर्ता, पजामा खोल के किनारे ध देले आ गमछा लपेट के पानी में कूद गईले । किनारे डुबाव ना रहे, कुछ दूर नदी में गईला प पानी अथाह रहे । ऊ डूबे लगले, बाकीर ऊ पंवरे जानत रहले, जब प्राण उभ चुभ करे लागल त हाथ पैर चला के पंवरे लगलेे । हांफत - हांफत थाह पानी में आके खड़ा हो गईले आ सोचले कि हम बहुते गलत काम करे जात रहनी ह । गंगा मईया बचा ले ली, बाकीर अब हम घर ना लौटब । नदी से बाहर निकल के धीरे - धीरे भींजले गमछा पहिनले एगो पगडंडी पकड़ के चले लगले । गरमी के दिन रहे, गमछा सूख गईल । ऊ एगो रेलवे स्टेशन पर आ गईले । एगो ट्रेन खड़ा रहे, ऊ एगो डिब्बा में घुस गईले । ऊ केहू से पूछबो ना कईले कि ट्रेन काहां जाई ।

ट्रेन के बोगी ठसाठस यात्री से भरल रहे । ऊ निचही बईठ गईले । रात भईल त कुछ लोग खाना खाए लागल, इनको भूख बेजोड़ लगल रहे बाकिर केकरा से मांगस ? मांगे के लूर ना रहे । उनका घर के सब बात इयाद आवत रहे, सोचते - सोचते ऊ सूत गईले । सवेरे नींद खुलल त देखले कि कुछ लोग एगो स्टेशन पर उतरत रहे, त उहो उतर गईले । ई गोरखपुर रेलवे स्टेशन रहे । बाहर निकलले त मालकिन होटल के देख के भूख औरी बेजोड़ हो गईल । होटल के मालकिन से कहले,"हम बर्तन मांज देत बानी, आसी बासी कुछुओ होखे त खाए के द।" ऊ एगो नौकर से कहली कि ये लड़का के खिआव । ऊ रात के बांचल बासी रोटी आ सब्जी एगो प्लेट में देलस । ऊ खाई के बेकहले होटल के बर्तन मांजे लगले । होटल मालकिन उनका के काम प रख ले ली । लगभग बीस दिन ये ही तरह बीत गईल । एक दिन एगो शिक्षक होटल में खाना खाए अईले । ऊ उनका से पूछले कि होटल में तन्खाह केतना मिलेला । ऊ आपन मुड़ी हिलवले आ कहले कि तय कुछुओ नईखे । ऊ पूछले कि हमरा घरे काम करब ? ऊ मुड़ी हिलवले कि ह । मास्टर साहब कहले कि हम खा लेत बानी त हमरा पीछे चल दीह । मालकिन से पूछीह मत ना त तोहरा के ऊ जाए ना दी । ऊ मास्टर साहब के पीछे लाग गईले ।

मास्टर साहब के घर पे ऊ आ गईले । उनकर परिवार बहुते छोट रहे । मरद, मेहरारू आ एगो उनका से दू तीन साल छोट लइका रहे । बरामदा में एगो लगहर गाय रहे । मास्टर साहब घर पहुंचते अपना पत्नी से कहले कि ई लइका के कुछ खिआव, हम होटल में खाना खा लेले बानी । मास्टर साहब के पत्नी एक प्लेट गरम - गरम हलुआ उनका आगा ध दे ली । हलुआ बहुते स्वादिष्ट रहे । बरामदा में एगो चौकी रहे, ओही पर एगो दरी बिछा के मास्टर साहब के पत्नी कहली कि तोहार इहवे आसन रही, दुनो बेरा गाय के चारा, भूसा गोते के बा । ऊ मास्टर साहब के एगो पुरान धोती आ गमछा दे के कहली कि सटले बाथरूम बा नहा धो ल‌। इनका नहइला बीस, बाईस दिन भईल रहे । नहईले त मन फ्रेश हो गईल ।

मास्टर साहब के लइका के नाम प्रणव रहे । कुछुए दिन में उनका से घुलमिल गईले । उनका संगे खेलस आ ऊ पढ़े बइठस त संगे बईठस । घूरा के पढ़ाई में रुचि देखि के मास्टर साहब अपना स्कूल से प्राईवेट हाई स्कूल के फॉर्म भरवा दे ले ।

घूरा के घर से भगला के बाद उनकर भाई उनका के आस पास, हितई नतई खोजले । गंगा जी के किनारे उनकर कपड़ा देखि के ऊ समझ गईले कि ई डूब गईल‌ ।

हाई स्कूल के रिजल्ट आईल त घूरा सेकंड डिवीजन से पास हो गईल रहले । मास्टर साहब घूरा के नाम ओंकार लिखवले रहले । ऊ अपने स्कूल में नियमित छात्र के रूप में इंटर में नाम लिखवा दे ले । गाय के खिया के ऊ स्कूल भी जाए लगले ।

घूरा के जीवन के गाड़ी सरपट दौड़त रहे । ऊ इंटरमीडिएट के परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण कर ले ले । मास्टर साहब एगो डिग्री कॉलेज में बी ए में एडमिशन करा दे ले । मास्टर साहब के लड़का प्रणव सी पी एम टी परीक्षा में अच्छा रैंक ले अईले आ सरकारी मेडिकल कॉलेज में उनकर एडमिशन हो गईल । कुछ बहुत नजदीकी लोग के छोड़ के सब लोग जाने कि घूरा मास्टर साहब के ही बेटा हवे । घूरा मन से पढ़स आ गाय के भी सेवा करस । इनकरा रहला से मास्टर साहब के भी बहुते आराम आ सुख मिले ।

एक दिन मास्टर साहब आई ए एस प्रारंभिक परीक्षा के फॉर्म ले अईले आ कहले,"ओंकार जी, फॉर्म भर के रजिस्ट्री जल्दीये कर दीह ।" घूरा कहले कि बाबूजी ई बड़ा कठिन परीक्षा ह, हमार सकान के नईखे । हम क्लर्क ग्रेड के परीक्षा के तैयारी करत बानी । मास्टर साहब डांट दे ले,"चुप रह, हीनता के भाव कभी भी मन में ना राखे के चाहीं । आपन लक्ष्य हमेशा ऊंचा राखल जाला।"

ऊ फॉर्म भर के रजिस्ट्री कर दे ले आ जी जान से तैयारी करे लगले । संयोग कहीं, चाहे भाग्य, चाहे घूरा के अथक परिश्रम ऊ प्री परीक्षा, मेन परीक्षा आ इंटरव्यू तीनों स्टेप लांघ के आई ए एस में सलेक्ट हो गईले ।

जांच करे खातिर स्थानीय पुलिस घूरा के गांव गईल आ पुछलस कि ओंकार पुत्र फलाना के कवन घर ह ? गांव के लोग बतावल कि एह नाम के हमरा गांव में केहू हईये नईखे। बाप के नाम पूछत - पूछत पुलिस घूरा के भाई के घर पर पहुंचल । घूरा के भाई फोटो देखि के पहचनले कि ई फोटो त हमरा भाई के बुझाता बाकिर उनकर नाम घूरा रहे आ ऊ गंगाजी में बहुत पहिले डूब के मर गईल बाड़े । पुलिस बतवलस कि उ जीयत बाड़े आ उनकर नाम ओंकार ह । कुछ देर के बाद ओंकार उर्फ घूरा के संगे मास्टर साहब उनका घर पहुंच गईले । घूरा के भाई, भौजाई मास्टर साहब के पैर छू के परनाम कईल लोग । पूरा गांव के खुशी के ठिकाना ना रहे । सब लोग घूरा के घर पे आ गईल आ चर्चा करे लागल "आरे, घूरवा जीयत बा आ कलेक्टर हो गईल बा । मास्टर साहब ओंकार के सफलता के पूरा कहानी सुनवले । घूरा के भौजाई मास्टर साहब आ घूरा के घीव घोसल रोटी आ तीन चार किसीम के सब्जी, खीर खीअवली, बेना हांक के । हालांकि बिजली गांव में आ गईल रहे आ पंखा चलत रहे । घूरा घीव घोसल एगो रोटी अपना बगली में ध लेले आ रोवत रोवत मुस्काए लगले ।

देवकुमार सिंह, पूर्व प्रधानाचार्य,

कात्यायनी कॉलोनी, परिखरा,

तीखमपुर, बलिया, उत्तरप्रदेश