दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )
भोला नाथ गहमरी : एगो व्यक्ति ना एगो विचार आ एगो युगबोध
स्मृति शेष
राम पुकार सिंह ( पुकार गाजीपुरी )
12/8/20251 min read


भोला नाथ गहमरी : एगो व्यक्ति ना एगो विचार आ एगो युगबोध
प्रकृति कs अलगे - अलगे रूप में अनुभूति भइल, ओकरा के मिठास भरल भासा में बखान कइल अइसन पेंच वाला काम हs कि एकरा के उहे करि सकेला जेकरा के प्रकृति के विशेष वरदान मिलल होई । भोजपुरी गीतन कs सम्राट के रूप में मशहूर भोला नाथ "गहमरी" जी के सभे लोक धुन के बारे में पूरा - पूरा जानकारी रहे । इहे कारन रहे कि उहाँके लुप्त हो रहल भोजपुरी गीतन के धुनन के नया - नया गीत रचके फेर से जीवित करे कs भगीरथ प्रयास कइलन । उनकरा गीतन में जवन प्रवाह, बोधगम्यता आ अभिव्यक्ति लउकेला उ आउर केहूँ के गीत में शायद ही नजर आ सकेला ।भोजपुरी साहित्य में गहमरी जी कs समय के "गहमरी युग" निर्विवाद रूप से मानल जा सकेला । उनकर गीत पढ़ के आ सुन के सभई के महसूस हो जाला कि उनकर लिखल गीत भोजपुरी दुनिया कs तहे दिल से निकले वाली सभे भावना के अभिव्यक्ति हs । ई पूरा भरोसा से कहल जा सकेला कि स्व. महेन्दर मीसिर जी के बाद वाली पीढ़ी में भोला नाथ जी आपन अलगे पहिचान बनावे में कामयाब हो गइली जेकरे चलते उनकर गीत आम मनइ कs गीत हो गइल । उनकर गीत कs एगो बड़हन खासमखास बात रहल कि उनकर हर गीत बोधगम्यता के संगे - संगे रिदम से भी जुडल बा । एकरे चलते कवनों गवइया बिना बतवले आ बिना समझवले उनकरे गीत के आसानी से स्वर दे देत रह जा । इहे कारन रहे कि इनकर गीत गा - गा के बहुते लोग के रोजी रोटी चलत रहे ।पटना, गोरखपुर, लखनउ, इलाहाबाद वाराणसी आ अउर रीवाँ तक के आकाशवाणी कलाकार के माध्यम से कम से कम तीन सौ गीतन कs लुत्फ आम श्रोता उठवले । उनकरे कलम से पूरबी, कहँरवा, झूमर, खेमटा, बिदेसिया, होली, चैता, कजरी, जंतसार, बियाह गीत आ सोहर के संगे देवी - गीत तक निकलल जेवन मोटा मोटी सभे हिट गीत हो गइल ।
कवि के साथे साथ उहाँ के कला के भी पारखी रहली । उहाँ के कबो एह बात से परहेज ना मनली कि उनकर गीत के उँचाई तक पहुँचावे में गायक लोगन क भी हाथ रहे । स्व. मोहम्मद खलील, ललन सिंह "गहमरी", ठाकुर चन्द्र मोहन सिंह, इलाहाबाद क उमेश चन्द कनौजिया, पूर्वान्चल कs पुरुषोत्तम सिंह, कामेश्वर सिंह, आनन्द सिंह, सरोज बाला, संज्ञा तिवारी, सरिता शिवम, निशा श्रीवास्तव, अर्चना श्रीवास्तव, गायत्री पाण्डेय, कनकलता अउर मधुबाला जइसन गवैया लोगन के अपने गीतन के सुरीली आवाज से सजावें सवारें खातिर गहमरी जी सब समय खुले मन से आभार मानत रहलीं । भोजपुरी गीत सम्राट गहमरी जी कs जीवन में संघर्ष के सामना सब समय करें पड़ल । बिना संघर्ष के केहूँ कs व्यक्तित्व में निखार आ चमक आई ना सके । उनकर इहें संघर्ष ताउम्र उनका में शक्ति के संचार कइलस । उन्नीस बरस क उमिर में उनके माई बाबू जी से हजारों मील दूरे नौकरी करे पड़़ल । विषम परिस्थित में भी छल कपट से दूर रहिके केहूँ के भी मोह लेबे वाला गुन उनके पास रहे ।लोक जीवन वाली संस्कृति उनका रोम - रोम में रचल बसल रहे । इहो उनकर खास गुन रहे जवना कारन कवनों कवि सम्मेलन उनका बिना अधूरा लागे । कुछ समय बदे सिनेमा कs रंगीन दुनिया से जुड़े के मौका मिलल रहे । अपने गीतन में चटपटा रंग दिहले के बावजूद भी साहित्य के दामन से हरमेश जुड़ल रह गइले ।भोजपुरी भासा में उनकरा नियर शायद ही केहूँ गीत संकलन दे पावल । भोजपुरी साहित्य कs श्रीवृद्धि में उनकर सबसे बड़हन योगदान रहे जेकरा कारन उनके सब समय इयाद कइल जाई । भोजपुरी कs महापंडित डा. कृष्णदेव उपायाय आ भोजपुरी कs मशहूर रचनाकार एवम् छंद विद्या कs मर्मज्ञ कविवर चन्द्र शेखर जी कs सलाह आ सहयोग खातिर उहाँ के तहे दिल से आभार प्रकट कइले बानी ।
वैसे गीतकार भोला नाथ "गहमरी" जी प्रकृति श्रृंगार आ विरह क मूल रचनाकार कs रूप में अपना के स्थापित करे में सफल भइल बानी । श्रृंगारिक गीत में उनकर आध्यात्म असीमित उँचाई तक झंडा फहरावे में सफल भइल बा ।
"कवने सुगना पर गोरी तू लुभा गइलू हो ।"
गहमरी जी कs गीत में कही फाँक ना मिले जे केहूँ कवनो मशविरा देबे के सोच सके । उनकर एगो विरह के गीत बतौर नमूना देखि जा :--
मोरा बिहरेला जीया, पिया तोहरे बिना ।
जबसे बंधी तोसे नेहिया के डोरी,
बिरहा जगावे दरद चोरी - चोरी,
जियरा जरेला जइसे जरेला जिया ।
मोरा बिहरेला .........................।
गहमरी जी कs लिखल बिरह गीत में उहाँ कs विशेष प्रतिभा कs साफ झलक मिलेला । प्रेयसी कs आपन प्रेमी के नेह के बारे में जवन ख्याल उपजेला ओकर साफ झलक गहमरी जी कs गीत में लउकेला -
महुआ के फूल झरे पलकन के छहिया,
सारी रात महके बलमू तोहरी नेहिया ।
गहमरी जी कs लिखल एगो खेमटा में खेत में रोपनी करे वाली मजदूरिन जे आपन गोदी के बचवाँ के घरे छोड़ के रोपनी करत रहे ओकर कतना नीमन बखान करत गीत लिखलेन । ओके पढ़ले पे केहूँ महसूस क सकेला ।
बदरा बरिसे त भीजे मोरी धानी चुनरी
हलर - हलर डोले दूधवां के काँटी ,
बूने - बूने अंगिया में चूवे सगरी ।
गहमरी जी कs गीत में यथार्थवाद कs चित्रण जेतना सुघर तरीका से भइल बा उनकरे बेमिसाल लेखनी के कमाल कहाई -
पात - पात दुअरे के महुआ फुलाई गइल
अँगना फूलेला कचनार ।
कि हो मोरे अँगना फूलेला कचनार ।
गहमरी जी कs भोजपुरी गीत विशेष रूप से प्रकृति श्रृंगार से प्रभावित रहल । उहाँ के सब समय एगो बात पर धेयान दिहली कि पारम्परिक धुनन के दीवार कबो मत ढ़हे । ऐही से उहाँ के प्रचलित आ लोक प्रिय रागन पर ही सब समय आपन गीत के रचना कइली । भोजपुरी फिल्म बदे आपन गीतन के भी उहाँ के कभी साहित्य से दूर ना रखली । गहमरी जी आपन लिखल गीत से भोजपुरी साहित्य में अमर हो गइले । उहाँ के एगो व्यक्ति ना एगो "विचार" के रूप में मशहूर हो गइली । उनकर लिखल गीत उनकरा के संबोधन करी तs उनके पे खरा उतरत लउकत बा -
" कवना खोतवा में लुकइलू ,
आहि रे बालम चिरई "
राम पुकार सिंह ( पुकार गाजीपुरी )
गाज़ीपुर
पूर्व प्रधानाध्यापक
साहागंज डनलप हिन्दी हाईस्कूल
रिसड़ा, कोलकाता
