दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )
बहारन मरि गइलें
कहानी
विंध्याचल सिंह
7/8/20251 min read


बहारन मरि गइलें
सबेरे ही सबेर हवा उठल जे बहारन मरि गइलें। ई खबरि कुछहुवें देरी में गाँव के एहि माथे से ओहि माथे ले पाटिगइल । गाँव में अइसन कुली खबरि पाटे में अचिको देरी ना लागे, काहें कि गाँव अइसने नू होलनद्य जे भी खबरि सुनले,ऊ ऊ बहारन के घर की ओरि चलि जात रहे आ थोरिये देर में उनकर घरदुआर मनई- मानुस से भरि गइल । अइसना में ऊ हो चलि जाला, जे कबो केहू के दुआरे ना जात होखे, अब ई के ना जाने कि मरे के त एकदिन सभकरा बा। हवा सिरिफ हवा ना रहे। बहारन सहिये में मरि गइल रहलें।घर में लइका बाचा रोइ रोइ के कुहराम मचवले रहलें। उनुका मेहरारू के त दांते प दांत लागे आ पास पड़ोस के मेहरारू लोगिन समझावे में लागल रहलीं, 'ई सब आइल गइल आदिमी के बस में कहाँ होला, ई सब त बिधना के हाथ में होला। अब रोइ रोइ के जनवों दे दिहल जाव त कुछु लवटि के ना नु आई।' रमन काका बहारन के बड़का से धीरे से पूछलन,' का भइल रहल ह हो, अभी त परसउवें बाति भउवे, कहत रहुवन कि तनि खोखी हो गइल बा।' 'आरे कुछ ना भइल रहल ह काका! चारि- पांचि दिन से तनि अनमनाह रहलें आ दवाइयो दियाते रहल ह, अब का बताई एतना कहते ऊ फफकि पड़लें। बहारन के दुआरे अब तिलियो धरे के जगहा ना रहे। केतने लोग आवत जाउ, चलत जाउ बाकी भीड़ त कम होखे के नावे न लेउ। गाँव छोड़ि बाहरियो जवार से बहुते मनई आइल रहें। गाँव में अइसना में मनइन के जुटान कवनो अचरज के बाति ना होला बाकि हेतना आदिमी देखिके केहू- केह के मुंह से निकल जात रहे 'ई कतना आदिमी चलि आइल बा हो ?'
जियला घरि बहारन केहू के बाति के अनमख ना मानसुद्यकवनो गुमान गरूर त तनिको ना रहे। सबसे हंसिये के बोलसुद्दलइको सन से रे कहि के ना बोलसुद्यनीमन सरकारी नोकरियो रहे। कबो कबो कहाँ दू शहरे जासु, त राति ले आवसुद्य आ अइसनो ना रहे कि उनकर नाम बहारने रहे। ई बहारन नाव त हंसिये हंसिये में धरा गइल ।
ऊ अइसन मनई रहलें, जे फजीरहीं उठि के दुआर झारि- बहारि के घूरा प फेंकि आवसु एकदिन मलिकाइन घर में से कूड़ा- बहारन लेआइ के उनका खांची में धइके कहनीं, तनि हइहो फेंकि देइब, हमनीका नहा लेले बानी जा।' ऊहे फेंकत उनकर संघतिया लोग देखि के मजाक कइलें, अब तोहार ईहे काम रहि गइलबा,तूं अब बहारने हो गइल ।'
आ तबसे उनकर नाव बहारन पडि गइल । बहारन अपना के बहारन कहलइला से ना तनिको चिढ़सु ना बुरा मानसु । ऊ त कहसु कि ए देहि के खटवला से केहू के खुशी आ आराम मिल जाउ त एह में खराबे का बा? आखिर ई देहि त एकदिन माटिये नु होइ जाई। ' ई सब गहीर बाति उनुका घर के मेहरारुवो लोगिन के का बुझाउ ? ई त बड़- बड़ जाना के ना बुझाला आ एगो बाति ना कहल जाला, जे एकबेर कवनो सुविधा मिल गइला प ई सवारथी जीव छोड़ल ना चाहे। अब बहारन ऊ मनई त रहले ना कि दुआरे गोड़ के आवाजे सुनिके घर के तिरिया लोगिन के डरन सिट्टी- पिट्टी गुम हो जावु । केहू कुछु कहे, ऊ अइसने रहलें। मन में भलहीं खारि होवे बाकी शिउवो काका बहारन के दुअरे आइल रहें। गाँव में रहेके होला त दूशुमनों के घरे अइसना में जाइल जाला। कुछु एइसन ना करके चाहीं,जे लोगन के बीच इज्जत बढ़ावे के जगहा अउरी घटाइ देव । ऊ पाता ना कवन बाति रहे, कि शिऊ काका बहारन से बहुते दिन से खुन्नस राखसु । हमेश उनुका के नीचा देखावे के बहाना खोजत रहसु । सवांगी आ खेत बारी में तनि बीसे रहले लेकिन ना पाता कइसे बहारन के आगा हरमेश फीके पड़ि जासु । ई बाति भीतरे- भीतर उनुके खूबे कचोटे। छोट प लइकन के ओहि ईस्कूल में नाव लिखवलन जेवना में बहारन के लइका जासन। लइकन सोझा घर में माहोल बनावे बदे पानी के वाटर, अच्छा के गुड आ कुकुर के डागी कहसु । कापी किताबि कुछऊ के कमी ना कइलन। अब केहू के भागि ना नु बदलल जाई ! लइका ओह लायक ना भइलन त जनि होखसु ! बहारन के ढंग सिखावे बदे कई बेर अपना मजूरहा से कहिके एक फरुहा धइके डंडवो कटवा लेसु त कबो पाटल गहूं के खेत में अपना डांड़े से नहरि वाला पानी खुलवा देसु आ ताकसु जे देखल जाउ अब का होला ?
लेकिन जब भी बहारन उनुका से मिलसु त हंसिये के बोलसु। गजबे बा! अब केहू से बरियाइन झगड़ा भी कइल जाउ त कइसे ? उलुटे शिऊ काका अइसन लजा जासु, जइसे केहू उनुका पर घइली के पानी फेंकि देहले होखे । शिऊ काका बहारन के दुअरे बइठल बइडल सब पुरनकी बाति सोचि गइलें । अब त जेकरा से बरोबरी के लड़ाई करत रहनीं,ऊहे चलि गइल । अब केकरा से बरोबरी कइल जाई ? पाता ना का सोचत उनुकर आंखि कुछु गीला होति जा रहली सन। एहि समय बहारन के कहल एगो बाति उनका बड़ा इयाद आवत रहुवे, ' केहू से अनासों खुन्नस कइके केहू आगा ना बढ़े पीछहीं जाला।' ईहे सब सोचत ऊ अपना दुअरे चलि अइलें। बहारन के मरले शुके शुके आठ दिन हो गइल रहे। शिऊ काका अपने दुआरे पकड़ी के छांव में बइठल रहलें। तपेसर,तिरलोकी आ भूलोटन के तिकड़ी भी चउकी प जमल रहे। खड्नी मलात रहे। ई तिकड़ी अइसन बेमिसाल लालबुझक्कड़ आ खुराफाती रहे, कि का मजाल जे गाँव में कवनो पतई हिलि जाउ, आ इनका लोग के पाता ना रहे।
बहारन के संगे शिऊ काका के खुन्नस के हवा देबे में इहाँ सभके बड़ा जोगदान रहे। तबहियें आठ दस मोटरसाइकिल से पनरहियन गो मनई आइल आ शिऊ काका से बहारन के घर के पाता पूछलें। शिऊ काका के घर ओहि मोड़ प रहे, जे केहूभी आवे त ओइजे आ उनहीं से बहारन के घर के पाता पूछे के पड़े। तपेसर खड्नी ठोकत कहलें, 'काका देखत बाड़, आजु आठ दिन हो गइल बा बहारन के मरले, ई सब कइसन आदमी ह हो, चिउंटी के बिली जइसे भर भर्र लइनिये नइखे टूटत ? ' काका कुछवू ना बोललें। काका के कुछवूना बोलत देखि तिरलोकी कहलें, 'आरे ईबिना काम काज के अन्हेरिया लोग ह। सबका एतना घूमे के कहाँ टएम बा।' अबकी काका बोललें आ डपटला लेखा बोललें, 'अइसन ना कहल जाला तिरलोकी ! बहारन सरगे गइलन आ हमनीका अभी नरके बानी जा।
ई केहू अन्हेरिया लोग ना हवे। ई सब लोग बहारन के परेम आ लगाव में आ रहल बा। ई सब बहारन के जस के परभाव ह।' तीनों लोग एकटक शिऊ काका के ताकत रहलन, कि आजु सूरज पूरुब के बदले पच्छिम से कइसे उगि गइल बा? काका ऊपरताकत फेरु बोललें, 'जिनिगी भर बहारन से अनसहूं राढ़ि रखलीं। ऊ हमार कुछऊ ना लेले रहलें। ऊ जियतो पर चमकते रहलें आ मरलो पर चमकते बाड़न । सही कहाला जे लगे से चलि गइला पर ही कवनो चीज के मोल बुझाला। पहिले मछरी मारल गड़हा जइसे हमरा मन में ना जाने का घोराई गइल रहे, जे कुछु साफ ना लउके लेकिन अब जइसे जइसे मन थिराइल ह त साफ बुझा गइल बा। गलती पर त हमहीं रहनीं। सांच बाति त ई बा तिरलोकी, कि हमनीं के बीच से हीरा चलि गइल हो आ हमनीका कहत बानी जा कि बहारन मरि गइलें।
विंध्याचल सिंह
ग्राम - बुदऊं, गड़वार, बलिया
शिक्षक आ साहित्यकार ।
[ दीया बाती के समहुतांक ( जुलाई, 2025 ) के अंक में प्रकाशित रचना । ]
